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कविता

चान माँगै ललना
हरेराम द्विवेदी


चान माँगै ललना तरइया माँगै ललना
रोइ रोइ गोलकी जोन्‍हइया माँगै ललना
केहू बतावै कहवाँ जाईं
सरग क तरई कइसे पाईं
कवन खेलौना दे बबुआ के
कउनी जोगिम से चुपवाईं
लोट पोट करै अँगनइया माँगै ललना
चान माँगे ललना

ताल तलइया नरई जामे
बछरू गइया घामे-घामें
कहाँ भेटाई कइसे आई
तरई बाटै केतनी लामे
सूझै नाही कउनो उपइया माँगै ललना
चान माँगै ललना

रोज सबेरे जब पह फाटै
चलै अजोर अन्‍हरिया छाँटै
बिहने बिहने जोति किरन कै
सच्‍चो केतनी बढ़िया बाटै
भोरे-भोरे सोनचिरइया माँगै ललना 


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