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कविता

बियाह
हरेराम द्विवेदी


अमवा लगइहा बाबा बारी बगइचा निबिया लगइहा दुआर
पिपरा लगइहा बाबा पोखरा के भिटवाँ गोंइड़े लगइहा बँसवार

अमवा सयान होइ फरिहै ए बाबा निबिया देही जूड़ छाँह
पिपरा के डरिया पर पड़िहैं झलुअवा बँसवा वीरनवाँ के बाँह

अमवा लगइबै बेटी बारी बगइचा निबिया लगइबै दुआर
पिपरा लगइबै बेटी पोखरा के भिटवां नाही लगइबै बँसवार

काहे न बँसवा लगइबा ए बाबा बँसवा सगुनवाँ के खान
सुपली मउनियाँ से ओड़िया चंगेलिया सबही जे करैला बखान

बँसवा से ए बेटी डोलवा फनाला होइ जाला घर सुनसान
बिटिया के बाबा से पूछा न कइसन मड़वा कै होला बिहान 


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