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कविता

बारहमासा
हरेराम द्विवेदी


सूनी लगइ मड़इया सूनी रात
पिउ बिनु सखि मोहिं सासुर नाहिं सुहात
बदरा बरसइ बाढ़इ बिरह कलेस
कउने कारन बिलमे पिउ परदेस
झलुआ झूलैं बिटिहिन गावैं गीत
नाहिं सोहाला तनिको बिनु मन मीत
रइन बिजुरिया चमकै जीव डेराय
लागै जनुक बजरिया पीव हेराय
दिना ओराइल बरखा जनु पतरान
टह टह रइन अजोरिया चमकै चान
भगतिन भोरैं उठिके करैं नहान
गावैं गीत सुहावन छुवइ परान
लवन लागि सब काटैं खेते धान
डुहुकै धिया बिदाई माई फान
कट कट बाजै दाँत कि अइसन ठार
कुहरा घेरै कब्‍बों पड़इ तुषार
रहै रइनियाँ बोरसी सुनुगत आग
अइया चललीं तीरथ करइ प्रयाग
अमराई बउराइल जिउ रहि जाय
महुअरिया उघार अस ना कहि जाय
गोहूँ के बाली लेइ पंछी ठोरि
उड़ि उड़ि जालैं अपने घरवा ओरि
कुआ तरासल गड़ही ताल झुरान
बिरहिनियाँ कै छटपट करइ परान
आगी बरसै दिनवाँ अइसन घाम
लगै कि जरि जरि जाई तन कै चाम
बीतलि गरमी बरखा सीत बसन्‍त
काजनिकाहे ना घर आये कन्‍त
कवन सवतिया लिहलस अस बिलमाय
सिहकत बीतै दिहलन पिउ बिसराय
तड़पत कलपत आपन जीव उदास
वइसैं बीतै बिर‍हिन बारह मास 


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