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कहानी

पुल
सूरज पालीवाल


गाँव की बहुत बड़ी इच्छा पूरी हुई। पहले चुनावों से तो क्या, जब देश आजाद हुआ था, तभी से लोगों ने मंसूबे बाँध रखे थे कि अब तो अपना राज्य आ गया, निश्चय ही अब हर साल भयावह तबाही मचाने वाले नाले पर पुल बँधेगा। गांधी महात्मा यही तो चाहते थे कि अपने लोग जब सरकार में मंत्री बनेंगे, तब अपनी समस्याओं को स्वयं हल करेंगे। इस गाँव के समस्त जन-मन की एक ही इच्छा है कि नाले पर पुल बँधे। वह अब पूरी होने जा रही है - सैंतीस साल बाद। प्रतीक्षा करते-करते न जाने कितने लोग स्वर्गवासी हो गए और कितनों की आँखें ही छिन गईं।

कोट, पैंट और गले में टाई लगाकर कुछ गँजाती चाँद के अफसर आए थे, दो जीपें भरकर। ज्यादातर ने काले चश्मों से अपनी आँखें ढॅंक रखी थीं, पता ही नहीं पड़ा कि कौन किस तरफ देख रहा था। जीप से उतरकर चपरासीनुमा मरियल आदमियों ने अंदर से सामान उतारा। जंजीरें, फीते, दूरदर्शी-यंत्र और भी बड़ी-छोटी मशीनें साथ लाए थे। गाँव में खबर फैल गई। जो जैसा था, वैसा ही उठ भागा। प्राइमरी स्कूल की छुट्टी कर दी गई। वैसे भी सात अध्यापकों में से एक आया है, और दूसरी स्वर्णलता - जिसका आना-न-आना ही बेकार। स्वेटर बुनने से फुरसत नहीं मिलती। जूनियर हाई स्कूल के तो पिछवाड़े ही यह सब हो रहा था इसलिए वहाँ पढ़ाई हो, यह कैसे संभव था? हेड मास्साब मैनेजर की चौपाल पर हुक्का पी रहे थे और दूसरे नंबर के मास्साब के खेत में नहर के पानी का ओसरा था, अतः वे अपने खेत में पानी लगवा रहे थे। लड़कों को बहाना मिल गया। नाले की पार पर भीड़ लग गई। ऐसी भीड़ तो अब किसी मेले-तमाशे में भी नहीं लगती। ग्यानू भंगी ने कह दिया था कि गुड़ बँटेगा। इसलिए रहे-सहे भी दौड़ गए - गुड़ का लालच और वह भी सर्दियों में। गाँव के अधिकांश लोगों के लिए गुड़ अमृत के समान है। जिंदगी में कुछ ही दिन आए होंगे जब गुड़ से रोटी मिली होगी।

भीड़ के कारण सरकारी कर्मचारियों को काम करने में असुविधा हो रही थी। मोटा-सा आदमी जंजीर लेकर इधर-उधर लोगों को हटाता जा रहा था। बाबूलाल भी आ गया था। उसने अब खादी का कुर्ता-पाजामा और ऊपर से लाल इमली का शाल लपेटना शुरू कर दिया है। पिछली साल ही मथुरा से पढ़कर लौटा है। सारे गाँव में वह सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा है। सुनते हैं सोलह पास है। तीन साल में की है - दो क्लास पास। एक साल मजबूती के कारण परीक्षा ही नहीं दी। पढ़ा इतना है कि सिर के बाल भी उड़ने शुरू हो गए हैं।

शाम तक नाप-जोख होती रही। जाते समय अफसर लोग बाबूलाल के घर भी गए। वहीं बैठकर चाय पी। सुनते हैं प्रधान जी के बारे में पूछा कि वे कहाँ हैं - तो चिलमारा चैंटू ने झटाक से कह दिया - 'शराब पीकर पड़ा होगा, कहीं। और कहाँ होगा।'

अफसरों पर बाबूलाल का अधिक प्रभाव पड़ा। गाँव के असली नेता के रूप में उसे ही मान्यता मिल गई। मथुरा आने का निमंत्रण भी दे गए। और कह गए हैं कि यदि कुछ काम हो तो सीधे चले आना, अपना ही घर समझकर। बाबूलाल ने 'जरूर-जरूर' दो बार कहा था - हँसते हुए। अफसर जीप में बैंठे तब तक वह उनके साथ ही रहा।

एक साल में ही बाबूलाल की नेतागीरी चमक गई। पिछले साल तक गाँव में उसे कोई नहीं पूछता था। उल्टे उसके बारे में किस्से और चल निकले थे कि - मथुरा में कोई ईसाइन है, उससे फँस गया है, रोज शराब पीता है, शहर के नामी बदमाशों से उसके निजी संबंध हैं। गाँव आकर कुछ दिन वह शांत रहा। एकाध महीने में ही उसने ब्लॉक और थाने जाना शुरू कर दिया था। अच्छी जमीन है। ट्रेक्टर अभी नहीं लिया है। घर पर दो कुँवारे चाचा हैं - जो रात-दिन खेती के काम में लगकर धीरे-धीरे बुढ़ा रहे हैं। पिता पिछली साल ही मरे हैं इसलिए घर में फालतू समय भी है और खाने की भी कमी नहीं है। नेतागीरी तो तभी हो सकती है, जब घर में खाने-खरचने की कमी न हो - भुखमरा आदमी क्या खाकर नेतागीरी करेगा?

बाबूलाल की नेतागीरी ऐसी चमकी कि अब उसे फुरसत ही नहीं है। हर समय घिरा रहता है। नौकरी लगवाने से लेकर ब्लॉक से खाद-बीज तक के लेन-देन में वह प्रमुख रहता है। मोटर-साइकिल भी खरीद ली है। आवाज ऐसी कि थानेदार की मोटर साइकिल भी फीकी पड़ जाती है, उसके सामने। चेहरे पर एक अतिरिक्त चमक आ गई है, बात करते समय भी चौंध मारता है।

प्रधान जी ने शिकायत भेजी है। खुद कलक्टर से मिलने भी गए थे, लेकिन उसने मिलने से मना कर दिया। लिखकर दे आए हैं कि पुल की पैमाइश ठीक नहीं हुई। जो कर्मचारी गए थे उन्होंने अपनी मनमर्जी से काम किया है। गाँव के किसी मौज्जिज आदमी से नहीं मिले और न मुझसे ही। शिकायत की एक-एक प्रति मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को भी भेज दी है। गाँव में आकर ध्यान में बात आई कि राष्टपति को भी तो शिकायत की एक प्रति भेजनी चाहिए थी, इसलिए दुबारा कल फिर मथुरा जाएँगे। वहीं टाइप कराकर रजिस्ट्री करेंगे। गाँव से तो रजिस्ट्री भी नहीं कर सकते। विरोध का मामला है - न भेजी तो। पोस्ट-ऑफिस में पिछले आठ साल से मुकदमा चल रहा है। हर आदमी डाकिया होना चाहता है - दो सौ रुपए मुफ्त के हैं। चार-छह चिट्ठियाँ आती हैं, वे बाँटीं और निधड़क डंड पेलो। इसीलिए एक-दूसरे के पीछे पड़े हैं।

चैंटू ने कई अफवाह फैलाई हैं कि पुल बनवाने में पूरा हाथ बाबूलाल का है। हर अफसर उनकी बात मानता है। पिछले दिनों जब मथुरा गए थे, तब बड़े-बड़े अफसर इतने प्रसन्न थे कि कहने ही क्या। कहने लगे - बाबूलाल जी कोई सेवा हो तो बताना। बाबूलाल कहाँ चूकने वाले, झट से कह दिया - सेवा अपनी निजी नहीं सारे झलाके की है - बरौठ गाँव पर नाले का पुल बँधना बहुत जरूरी है। सारा इलाका परेशान है। हर साल दस-पाँच आदमी डूबकर मर जाते हैं। मोटे-मोटे चेहरों वाले अफसर खिलखिला पड़े थे, नेता हो तो बाबूलाल जैसा। अपने काम को आज तक नहीं कहा और सारे इलाके को दुख दूर करने के लिए कितना बेचैन है। मैं तब साथ में था। मेरी तो सिट्टी-पिट्टी सब गायब हो गई थी, उनकी हँसी देखकर। इतने जोर से हँसते हैं - कमला भगत रावण बनकर क्या हँसता है? पान रचे मुँह एक-एक बिलांद खुल जाते हैं। तभी उन्होंने पैमाइश की बात कही थी और बरसात आने से पहले पुल बँधने की पक्की गारंटी। चैंटू सुबह से शाम तक मुफ्त का हुक्का पीता फिर रहा है। बातें ऐसे गढ़ता है, जैसे कितना बड़ा आदमी हो। जिस ढंग से कहता है - प्रभावित करता है।

मंगी मास्टर साँवलिया की दुकान पर बैठकर खैनी रगड़ता हुआ बता रहा था कि पुल की मंजूरी नई नहीं है। कई साल पहले का मंजूर हुआ पड़ा था। बहुत पहले बन गया होता, बीच में सोशलिस्ट पार्टी का एम.एल.ए. न जीतता तो। सरकार अब इस गाँव से नाराज है। वह अब कुछ भी नहीं करना चाहती। प्रधान जी पर तो प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के पत्र आते रहते हैं। लगातार प्रधान जी पुल बनने की बात दुहराते रहे हैं, लेकिन दिल्ली और लखनऊ से एक ही बात रिपीट होती है, कांग्रेस को क्यों हराते हो? हमारे आदमियों को हराओ भी और हमसे ही सुविधा चाहो, यह कैसे संभव है? प्रधान जी ने अगले चुनाव में कांग्रेस को जिताने का पक्का वायदा किया है। तब पैमाइश हुई है और पुल ही थोड़े, अस्पताल, पानी की टंकी और सड़क सभी मंजूर हुए पड़े हैं। प्रधान जी इस गाँव को सुरग बना देना चाहते हैं, गाँव का सहयोग मिले तो। मंगी मास्टर प्रधान जी का खास आदमी है। सारा घर लोकदल का कट्टर समर्थक है, लेकिन अकेला आदमी है घर में, जो कांग्रेस का परम भक्त है। खैनी खाते-खाते दाँत खराब हो गए हैं। मोटी खादी का कुर्ता और धोती पहनता है। सिर पर हल्के-हल्के बाल। रंग साँवला, चेहरे की छवि प्रभावशाली है। जब भी बात करता है अपने मतलब की। कांग्रेसी आदमी है, इसलिए गाँव से तबादला नहीं होता। सोशलिस्टी एम.एल.ए. ने कई बार कोशिश की है, लेकिन शिक्षा-अधिकारी जानता है, मंगी सिंह की पहुँच कहाँ तक है।

साँवलिया की दुकान गाँव का सूचना-केंद्र है। जैसी भी खबर हो, सबसे पहले वहीं पहुँचती है। फालतू आदमी समय कहाँ काटें, इसलिए वहीं बैठे-बैठे इधर-उधर की हाँकते रहते हैं। साँवलिया का मन भी लग जाता है और दुकान भी चल जाती है। गाँव में दुकानें भी तो संबंधों के आधार पर चलती हैं, कोई गरीब-गुरबा खोल ले दुकान, देखें कैसे चलती है? कोई बैठना भी पसंद नहीं करेगा - वहाँ। साँवलिया जाति का पंडित है। दुकानदारी इतनी कि कम फुरसत मिलती है। अपना एक बीड़ी-बंडल दिन भर में खर्च करता है, लेकिन दूसरे की दुगुनी बीड़ी पी जाता है। पिछले जन्म का बनिया है - पक्का।

प्रधान जी की अनुभवी आँखों ने भविष्य पढ़ लिया। इसलिए जब कलक्टर नहीं मिला तो लखनऊ चले गए। लखनऊ में उन्हें मथुरा जिले के दूसरे एम.एल.ए. अच्छी तरह से जानते हैं। मंत्री भी जानता है। जानता क्यों नहीं, पहले वकील तो था ही। बैठे-बैठे मक्खी मारता रहता था, बिल्कुल नहीं चलती थी उसकी वकालत। राजनीति की करामात कि चुनाव लड़े, एम.एल.ए. हुए और पहली ही बार में मंत्री भी बन गए। प्रधान जी ने कलक्टर को फटकार लगवा दी है। लखनऊ से वापसी में सोचा कि कलक्टर से भी मिलते चलें तो देखकर अचंभे में रह गए। रिरिया रहा था। अब दुबारा बदमाशी न करने का वायदा किया है। प्रधान जी ने सिर्फ मंगी मास्टर से ही कहा है कि अब पुल जिंदगी भर नहीं बनेगा, लेकिन तुम ऐसा प्रचार करो कि प्रधान जी पुल के साथ सड़क और पानी की टंकी की मंजूरी भी ले आए हैं।

प्रधान जी गाँव में कम लोगों से ही बात करते हैं। दिन में जिसे जरूरी हो मिल लो, रात में तो उन्हें खुद होश नहीं रहता। पूरी बोतल चढ़ा जाते हैं। लेन-देन का हिसाब दिन में ही चलता है। एक जगह का चार बार पट्टा कर दें और चारों से ही पैसा खा जाएँ। बाबूलाल क्या खाकर नेतागीरी करेगा? नेतागीरी कभी बाबूलाल के पुरखों ने भी नहीं की। प्रधान जी बाबूलाल से बहुत नाराज हैं। वह जो कहता है, उसकी काट पहले ही तैयार करके फैला देते हैं।

बाबूलाल ने गाँव की पंचायत बुलाई। पंचायतें शायद ही कभी पंचायत घर पर हुई हों, वहाँ तो गज्जी सिंह का कब्जा है। पंचायत घर में भैंस-बैल बाँधते हैं और वहीं स्वयं पड़े रहते हैं। गज्जी सिंह ने चाँदी के जूते मारे हैं प्रधान जी के सिर पर - कोई सैंत में ही थोड़े है। इसलिए पंचायतें देवालय पर होती हैं। चैंटू सुबह से ही लट्ठ ताने फिर रहा है। औरतों तक को उसने बता दिया कि प्रधान लखनऊ जाकर पुल बनाने की मना कर आया है। जिसने भी सुना वही गुस्से में हो गया। बड़ी मुश्किल से तो पुल बनने की नौबत आई और उसमें भी अड़ंगा। औरतें तरह-तरह की गालियाँ दे रही हैं। जो मन में आ रहा है, वही कह रही हैं। घूँघट की ओट में हर खुला मुँह गाली बक रहा है - प्रधान जी को।

गाँव में ज्यादातर आदमी अब तक यही समझते थे कि चैंटू सिर्फ मुफ्त का हुक्का पीने वाला है, लेकिन अब मालूम पड़ रहा है कि उनकी समझ गलत थी। जिस तरह चैंटू ने घर-घर जाकर प्रधान के विरोध में वातावरण बनाया है, उसकी उम्मीद प्रधान जी को भी नहीं थी। प्रधान जी के खेमे में मुर्दनी छा गई है। जब सारा गाँव एक हो तब अकेले प्रधान जी और उनके चपरकनाती क्या कर लेंगे?

पुलिस आ गई। हाथ में डंडे और कंधे पर राइफल। दस सिपाही और हैड-कांस्टेबल आए हैं। कुछ देवालय पर बैठे बीड़ी पी रहे हैं, कुछ गाँव के चक्कर लगा रहे हैं। गलियों में कुत्तों ने भौंक-भौंककर कुहराम मचा रखा है। हेड-कांस्टेबल प्रधान जी की बैठक में सो रहा है। दिन निकले ही पूरी बोतल चढ़ा गया है।

बाबूलाल अंदर कमरे में बैठा चैंटू को समझा रहा है - अब धीरज से काम लेना। पुलिस का मामला है। कहीं कुछ गड़बड़ हो गई तो सब करा-धरा बेकार हो जाएगा। प्रधान यही चाहता है कि हम उसे गाली-गलौज दें, मारने-पीटने की धमकी दें, जिससे पुलिस उसकी रक्षा करे। तुम ध्यान रखना। अपने लोगों को पहले ही समझा देना। तेल चुपड़ी लाठियाँ अभी साथ न लाएँ, उसका मौका अभी नहीं आया है। इस पंचायत में जितना हो सके धीरे-धीरे यह बताना है कि 'प्रधान गाँव में कोई काम नहीं होने देना चाहता है। हम जिस काम को उपर से पास कराकर लाते हैं, उसमें यह टाँग अड़ाता है, यही वजह है कि अब तक इतने बड़े गाँव में कुछ भी सुविधा नहीं है।' बाबूलाल धीरे-धीरे चैंटू को समझाता रहा। बंद कमरे में धुआँ घुमड़ रहा है।

चैंटू के चेहरे पर निराशा चमक उठी। उसकी समझ में नहीं आया कि बाबूलाल ने इतनी जल्दी हार कैसे मान ली। वह तो आज की पंचायत में प्रधान को नंगा करना चाहता था। सब कुछ असलियत बताना चाहता था। इतने दिनों से रात-दिन भाग-दौड़कर बातें मालूम की हैं, गवाह बनाए हैं। जिसने पचास रुपए भी दिए हैं, चैंटू ने उससे पाँच सौ रुपए बताने को कहा है। उसने यह वायदा किया है कि एक-एक पाई का हिसाब करवाकर रहेगा। सब बेकार कर दिया बाबूलाल ने। सब पढ़ाई-लिखाई बेकार गई। अनपढ़ प्रधान से हार मान रहा है। उसने बाबूलाल को समझाया भी, लेकिन उसने चैंटू की एक नहीं चलने दी। उठकर चला आया।

चैंटू की चिंता है अब वह किस मुँह से समझाए। गाँव में समझ की भी तो कमी है। एक बार जो समझ गए उसे बदलने की कहो तो गाली-गलौज। चैंटू परेशान है। अब उसने तय कर लिया है, यह पंचायत जैसे-तैसे हो जाए, फिर वह प्रधान से मिलेगा। प्रधान चाहे कैसा भी हो, हेकड़ है। गाँव में चाहे गालियाँ मिलें, लेकिन बाहर बहुत चलती है। लखनऊ-दिल्ली तक में पहुँच है। जो काम वह चाहता है, कर दिखाता है। बाबूलाल डरपोक है। पढ़ा-लिखा है तो क्या। पढ़े-लिखे को कौन यहाँ मास्टरी करनी है, जिस तरह की राजनीति की जरूरत है, वह बाबूलाल के बस की बात नहीं है। चैंटू ने अपनी भूल स्वीकार कर ली है।

प्रधान जी अपनी जीत पर उछल नहीं रहे हैं। मंगी मास्टर ने नया कुरता-धोती पहने हैं। टोपी भी लगाई है, आज तो। सुबह से ही दो सिपाहियों को साथ लेकर घूम रहा है। जहाँ बैठता है, थूक-थूककर ढेर लगा देता है। मिलिट्री वाले एक-एक बोतल के सौ-सौ रुपए माँग रहे हैं। मंगी परेशान है। प्रधान जी से इकट्ठे रुपए ले आया है। रुपए देते समय प्रधान जी ने कह दिया था कि कम ही पिलाना, कहीं ज्यादा पीकर खुद होश खो बैठें। रात को चक्कर देंगे। मंगी खुद समझदार है। स्थिति को दूर से ही भाँप लेता है। बचपन से ही प्रधान जी की सोहबत में रहा है।

पंचायत शुरू होने से पहले ही पछाई थोक के चार लड़के पकड़ लिए - घर से देसी बंदूकें निकली हैं। जमुनाई थोक में तलाशी ली तो सिवाय बल्लम-फरसों के कुछ नहीं मिला। बल्लम-फरसे पुलिस ने अपने कब्जे में कर लिए। जमुनाई थोक में मंगी मास्टर ने एक भी आदमी को गिरफ्तार नहीं होने दिया। उसकी अपनी राजनीति है।

पंचायत शुरू हुई। चैंटू सबसे आगे बैठा है। फरसी की नय से मुँह उठा ही नहीं रहा है। जरा-सा होंठ ऊपर कर धुआँ निकाल देता है। सामने रामसिंह और बाबूलाल बैठे हैं। बड़े-बूढ़े कम ही हैं। ज्यादातर नए-नए लड़के हैं। कुछ स्कूलों में पढ़ रहे हैं और कुछ की शादियाँ हो गई हैं, इसलिए पढ़ाई छोड़ दी है।

रामसिंह बोलने में बाबूलाल से भी ज्यादा है। एक आँख है। जब बाहर निकलता है, तब काला चश्मा लगा लेता है। बोलते समय मुँह से झाग देता है। आँकड़े खूब याद हैं। गाँव की एक-एक घटना याद है। बोलते समय आवाज इतनी जोर से निकलती है कि रेडियो भी फीका पड़ जाता है। बाबूलाल से अच्छे संबंध नहीं हैं, लेकिन प्रधान जी से नाराज है, इसलिए ज्यादातर बाबूलाल के साथ रहता है।

इधर-इधर की बातों से पंचायत शुरू हुई। थोड़ी देर के बाद रामसिंह बोलने खड़े हुए। पहले धीरे-धीरे बोलना शुरू किया और फिर जैसे ही रफ्तार पकड़ी, वैसे ही स्वर अपने आप बढ़ता गया। रामसिंह ने प्रधान की एक-एक बेईमानी का उल्लेख किया। नाले पर पुल न बनने का कारण भी उन्होंने ही बताया। मंगी मास्टर के पास बैठे खिल्लू ने जैसे ही बीच में बोलना शुरू किया, वैसे ही उसे डाँट-डपटकर बिठाने की कोशिश हुई। खिल्लू अकड़ गया। तब बाबूलाल ने भी हस्तक्षेप किया। बाबूलाल ने क्या कहा - कुछ सुनाई नहीं पड़ा। जिसे देखो वही बोल रहा है। पंचायत रावण-मेला हो गई है। जब सब बोल रहे हों, तब दूसरे से बैठने और चुप रहने की कौन कहे? बहुत देर तक हो-हल्ला होता रहा। कोई किसी से कम नहीं था। सबकी अपनी-अपनी तैयारियाँ थीं।

चैंटू पर चुप नहीं रहा गया। उसने खड़े होकर गालियाँ देनी शुरू कर दीं। चैंटू गालियाँ किसे दे रहा है - ऐसे माहौल में कौन सुने। मंगी मास्टर ने आगे बढ़कर चैंटू का गला पकड़ लिया। चैंटू ने भी उसका गला पकड़ लिया। पीछे से किसी ने धूल की गठरी उछाल दी। धूल का अंबार। दिखना भी बंद हो गया। ऐसे में जो लात-घूँसे चले, किसी को नहीं मालूम, किसने किसको मारा?

पंद्रह आदमी पकड़े गए। बाबूलाल भी। रामसिंह भाग गया। घर भी नहीं मिला। चैंटू को ज्यादा चोटें आई हैं। मंगी मास्टर का कुर्ता फाड़ दिया है। माथे पर पता नहीं क्या लगा कि चबूतरी-सी बन गई है। ज्यादातर बच गए। एकाध थप्पड़ खाकर ही भाग लिए।

पुलिस उन्हें थाने ले गई। चार आदमी रात में ही छूट आए। चैंटू भी आ गया है। थानेदार ने जेब भरकर रुपए लिए हैं। चैंटू ने तो इलाज भी नहीं कराया। थानेदार ने कह दिया, यदि इलाज कराओगे तो सुबह चालान कर दूँगा। चैंटू ने मना कर दिया है। बाकी आदमियों का सुबह चालान होगा। मंगी मास्टर अपना डॉक्टरी मुआइना करा आया है। डॉक्टर ने रुपए लिए हैं, लाठियों की फर्जी चोट लिखी है।

पुल की चर्चा ही गायब हो गई। साँवलिया की दुकान पर बाबूलाल की चर्चा रहती है - कैसे जेल में पड़ा है। थानेदार ने माँ-बहिन की गालियाँ दीं और दो-चार थप्पड़ भी जड़ दिए। मंगी मास्टर ने जान से मार डालने की रिपोर्ट दर्ज कराई है - बाबूलाल और उसके साथियों पर। सारा पैसा प्रधान जी खर्च करेंगे - ऐसी चर्चा है।

चैंटू अब प्रधान जी का आदमी बन गया है। बाबूलाल के खिलाफ पक्की गवाही देगा। उसकी अब एक ही इच्छा है कि बाबूलाल से जेल में चक्की पिसाकर रहेगा - जैसे भी हो। पुल भाड़ में जाए, जिंदगी-भर न बने, उसे क्या!


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