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कविता

कुल इतनी कहानी
प्रांजल धर


लैटिन अमेरिका के आदिवासी विद्रोह
माया, इंका या हड़प्पा से कैसे संबंधित हैं
केरल का वायनाड, कलिंग नगर की झड़पें,
चिल्का के मछुवारे
चकाचौंध में बिसरा दिए गए
ये बेसहारा लोग भला कैसे जुड़े हैं।
इनकी किस्मत के पन्ने
दर्द की इबारतों की तरह
एक झटके में ही चार-चार बार मुड़े हैं।
वही बरछियाँ, तीर, धनुष और भाले
परंपरा की वाहक मोरपंखी तस्वीरें
झनक-झनक करता कोई वनवासी नाच
स्वप्निल दुनिया...
फ्रायडीय विश्लेषणों, मायकोव्स्की के विचारों
या भूमंडलीकरण के दौर में
अर्थहीन हो चली भौगोलिक दूरियों से
बिलकुल अनजान है
जो परंपरा ढोई जा रही है
यही इनकी अकेली पहचान है।
 
अचानक
आधुनिकता का धक्का इन्हें ठेलता है
इसीलिए
ग्लोब का हर आदिवासी बालश्रमिक
समाजशास्त्रियों के विचारों से
जमकर खेलता है
और खेलने का असहनीय दंड भी
बराबर झेलता है
...इरावदी से मिसीसिपी या फिर
थार से सहारा तक...
कभी विस्थापित, उजाड़ा हुआ
सताया गया प्रवासी मजदूर बनकर
बहुत दूर चला जाता है :
रह जाती हैं वतन की अधूरी यादें
माटी की सोंधी खुशबू
बारिश की टपकन
या नमक, तेल, आलू और
रोटी की अनबन।
 
यात्राओं में ही बीत रहा जीवन
भावी पीढ़ियों के लिए कुछ भी
छोड़ तक नहीं पाता,
संचय तो दूर की बात है
कुल मिलाकर यही इतनी हर
आदिवासी मजदूर की बात है,
और इतनी ही है उनकी कहानी
उनके लिए नहीं रहे जंगल
और सूख चुका
उनकी आँखों का नमकीन पानी।
सूख चुका।
 

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