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कविता

संस्कृति, परंपरा और साँप
प्रांजल धर


संस्कृति, परंपरा और साँप
बड़े जिद्दी होते हैं।
एक बनती है धीमे-धीमे
लेकिन चट्टान हो जाती है,
दूसरी पहले से चली आ रही होती है
अपने कलेजे में कितने कलेजों का
               मांस समोती है।
साँप भी कहाँ मानता है !
इस जनम में नहीं, तो अगले में -
लेकिन बदला जरूर लेता है;
गलत कहते हैं लोग
और मदारी भी
कि साँप समझदार और स्वतंत्रचेता है।
साँप और संस्कृति अपनी-अपनी
परंपराएँ निभाते हैं;
जिद पर आ जाएँ तो बारदईचिखला तक को
धता बताते हैं; आईना दिखाते हैं उसे।
लेकिन असहाय मानव
साँप को टोकरी और झोली में डालता है,
संस्कृति और परंपराओं को पढ़कर
श्रेष्ठ होने का भंगुर दंभ पालता है।
 
(बारदईचिखला - असमिया गीतों में प्रयुक्त होने वाला एक प्रसिद्ध शब्द। ‘बार’ का अर्थ ‘आँधी’, ‘दई’ का ‘वर्षा’ और ‘चिखला’ का मतलब ‘अप्सरा’ है। यानी वर्षा और आँधी की शक्तिशाली देवी।)
 

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