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कविता

एक घर
प्रांजल धर


कम से कम
उतनी जमीन तो है मेरे पास
जितनी मातम, हिंसा, दंगों
और राजनीति से अनछुई रह गई है,
उतने विचार भी
जो किसी वाद में बाँधे न जा सके
छूट गए सबसे।
उतना ही आसमान
देख पाते मेरे नेत्र जितना,
एक टूटी हुई खिड़की से
और उतनी ही खुशबू
जितनी जाति-धर्म के बाड़े तोड़कर
दिए गए उस ताजे गुलाब में थी
जिसे पहली बार
आधी दुनिया की एक मालकिन ने
चोरी-छुपे मुझे भेंट किया था
हड़बड़ाकर।
उत्साह सिर्फ उतना
कि आज फिर दाल-भात बन जाए 
ताजी हो जाएँ इंद्रियाँ
उतर जाए थकन
पतीली में उबलते भात की सुगंध से
जा सके मन दशकों पीछे
उन पगडंडियों पर
जो बैलों के साथ-साथ
बैलगाड़ियों को भी सलाम किया करती थीं।
उतने ही नाम इस जुबान पर
जिनसे मिला वह
उम्मीद न की जिसकी कभी।
दिमाग में उतने ही शब्द
जो इंतजार करते-करते
करते-करते
थककर चूर हो जाने के बाद मिले
परदेसी प्रेमिका के खतों में
फूलदार लकीरों से रेखांकित किए रहते थे,
जिन्हें बार-बार पढ़ता है कोई प्रेमी
और सौ बार सोचती हर प्रेमिका
लिखने से पहले।
कवच सिर्फ उतना ही
जो माँ के आँचल में मिलता
लेकिन होश सँभालने के पहले ही,
मजबूरियाँ उतनी
एक निर्धन नवयौवना के पास
चौबीसों घंटे जितनी होती हैं।
सीमाएँ
दो क्रमागत पदचिह्नों की दूरी जितनी
...क्या सिर्फ इतना कुछ जोड़कर
एक घर बनाया जा सकता है!
 

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