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कविता

रास्ते का पत्थर है जीवन
प्रांजल धर


रास्ते का पत्थर है जीवन
उस समाज में
जहाँ बड़े गिलास हैं, प्रमाण हैं
बड़े जीवन की भव्यता के,
और दमकता लिबास
सबूत है आदमी की महानता का
लिबास में जड़े रत्नों से
बू आती है
किसी बाल मजदूर के थकने की
थककर चुकने की
चुक-चुककर जीने
और जी-जीकर मरने की।
 
रास्ते का पत्थर है जीवन
उस समाज में
जहाँ वेश्याओं की गली
सेफ्टी वॉल्व मानी जाती है
समाज की कुंठा का
एक का अस्तित्व
कारण है दूसरे की अय्याशी का
या दूसरे की अय्याशी कारण है
पहले के अस्तित्व का?
 
रास्ते का पत्थर है जीवन
उस समाज में
जहाँ ऐसे बुनियादी सवाल
हाशिए पर चले गए हैं
जहाँ ऐसे प्रश्नवाचक क्षण
आदतों में ढल गए हैं
रास्ते का पत्थर है जीवन
ठोकरें खाना नियति है जिसकी।
 

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