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कविता

आजाद
प्रांजल धर


साँसों की आवक-जावक की तरह
साँय-साँय करती लंबी-लंबी महानगरीय कारों
के हॉर्न
रद्दी बीनते और अखबार बेचते
बच्चों के जीवन संगीत हैं,
उनके सिर पर
उनके रिक्शाचालक पुरखों के
बोझिल अतीत हैं।
ये हॉर्न
मधुर हों या कड़वे
खट्टे या मीठे, ताजे या बासी
चाहे जो दें उन्हें - लज्जा या प्रेम,
सहारा या धक्का, हर्ष या उदासी!
जो भी दें, उन्हें लेना ही है
पलटकर आशीष देना ही है।
कितने आजाद हैं !
बिल्कुल तीसरी दुनिया की तरह।
 

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हिंदी समय में प्रांजल धर की रचनाएँ