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कविता

बहन
प्रांजल धर


फूलदार लकीरों से रेखांकित शब्द थे
बहन की चिट्ठी में
आई जो बहुत दूर से थी
‘भैया को मेरी भी उमर लग जाए’
यही लिखा था, मात्र इतना
चिट्ठी बढ़ाई भैया ने
बहन की भाभी की ओर -
एक तिरछी मुस्कान फैल गई
पूरे बरामदे में
इस छोटी-सी पंक्ति में भी
घरेलू राजनीति का गुर कोई
खोजा जा रहा हो मानो
और गुर न मिलने पर
हाथ लगा उस चिट्ठी को
घर का सबसे बड़ा कूड़ेदान...
 
बहन कहते किसे हैं?
जिसकी चिट्ठियाँ आती हों कभी-कभार
जिसकी राखी आती हो हर साल
कोसा गया था जिसे बचपन से ही, बस...
परिचय इतना, इतिहास यही !
 

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