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कविता

फैसला
प्रांजल धर


निरर्थकता बोध से खिन्न मन ने
अचानक राहत की एक लंबी साँस ली
अंदर की पूरी दुनिया मानो किसी
कॉरपोरेट घराने-सी बिलकुल बदल चली
बस एक पल पहले निराशा-अंधकार... वंचना
और तीन पीढ़ी लंबी वेदना की पीर
अगले ही पल मानो टूट गई जंजीर
शायद कोई फैसला हो चुका था
मन के निर्जन और सन्नाटे भरे कोने में,
अचानक क्यों लगा कि
कुछ नहीं रखा इस रोने में!
शेक्सपीयर के सभी नाटक पढ़े और देखे थे
स्टीफन हॉकिंग्स से भी मिल चुका था
साहित्य का फूल तो मन में
न जाने कितनी बार खिल चुका था।
 
जवाब बहुतेरे थे
पर उन सवालों के नहीं
जो उसे बुरी तरह घेरे थे
वही दाल, रोटी, नमक, डेराडंगर... के
लंबे-लंबे सवाल!
बहरहाल!
अपने ही हाथों घोंपा छुरा
देह के दोनों तरफ निकल चुका था
यही फैसला हो चुका था।
 

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