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कविता

प्रवचन
प्रांजल धर


पूँजी की गद्दी पर बैठकर बाबा
पूँजी से मुक्त होने का
प्रवचन देते जा रहे हैं
मन ही मन, ‘पूँजी-पूँजी’ गा रहे हैं
भक्तगण आ रहे हैं
जत्थों में जा रहे हैं
पूँजीपतियों ने अपनी
बसों और जीपों को
बाबा के प्रति उमड़े
श्रद्धाभाव से
अनुप्राणित हो
किरायामुक्त कर दिया है,
लाभ को
एक हफ्ते के लिए
सुप्त कर दिया है
और गए हैं विदेश
किसी ‘प्राइवेट फंक्शन’ में
‘इलाज को गए हैं’
यही बताते पी.ए. उनके।
मोबाइल बजता बाबा का
किसी आई.एस.डी. कॉल से
उधर से परिचित भारतीय आवाज
‘सात्विक’ अंदाज इधर से!
संपर्क बना हुआ है
हाथ सना हुआ है, पसीने से;
...जाने क्यों सर्दी में भी पसीना!
लंबी साँस खींचकर पसीना भगा रहे
तनाव कम करने के जुमले बता रहे
 ...प्रवचन देते जा रहे!
 

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