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कविता

वोट फ़ॉर बड़के भइया
प्रांजल धर


दिन भर ‘वोट फ़ॉर बड़के भइया...’
पैदाइश से लेकर आज तक की
सारी ताकत लगा दी
दिन भर चले राजनीतिक नारे में
‘वोट फ़ॉर बड़के भइया...!’
भइया को सत्ता सुख,
इसे भइया का।
कितना आराम है जब सर पर हो
एक मजबूत हाथ
और दस शातिर उँगलियाँ
प्रतीक दसों दिशाओं में फैले
‘भइया’ के आतंकी साम्राज्य की
दल-बल, लश्कर, साधन, सामान
भय के खेतों से उपजकर मिलता
सम्मान
इतनी जल्दी चढ़ जाते सीढ़ियाँ
राजनीतिक यथार्थ के लेखक,
मानो पल भर में हजार बार
पैदा हुआ हो हिटलर
और सौ बार हत्या हुई हो गांधी की
कितनी प्रगतिशील तकदीर है
पूँजी के कांधों पर बैठी
इस आँधी की...
रात के जमावड़े में भइया बैठते
एकदम बीच में गोले के
और सारे इज्जतदार परिधि पर
बीच में जलता अलाव विश्वास का
विसंगति का धुआँ छोड़ते हुए
सारी बातें रात में, हर कोई औकात में...
जी-हजूरी, चमचेबाजी, चापलूसी।
और सुबह फिर नहा-धोकर
‘वोट फ़ॉर बड़के भइया’, ‘वोट फ़ॉर...!’
 

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