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कविता

कवायद
प्रांजल धर


शरियाली* से वशिष्ठ आश्रम या कामाख्या के
बीच कीचड़ भरे रास्ते एक संकेत करते हैं।
न भी करते हों तो मयूरद्वीप जरूर करता है।
अगर वह भी अक्षम हो
तो दौल के बाहर मारकस बजाता अंधा
जतिंगा पहाड़ियों की उजड़ी चोटियों-सा
            कुछ कह रहा है।
जीवन ही नहीं, प्रगति भी कितनी निस्सार है !
विदशी कार से रौंदकर मारे गए
एक आवारा कुत्ते के सपनों-सी अर्थहीन!
जिंदगी इतनी महीन!!
कि कोई देख भी न पाए
      मदद तो दूर की बात है।
हर जगह दिन है
      बस जिंदगी में रात है।
क्या ये संकेत सुनकर
कभी अरुणोदय की हालत आएगी!
पता नहीं।
हर जगह किंतु-परंतु-शायद है
इसीलिए हर संकेत एक व्यर्थ की कवायद है।
 
* असमिया भाषा में शरियाली का मतलब चौराहा होता है।
 

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