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कविता

चुनाव
प्रांजल धर


नरम मुलायम हथेलियाँ
प्रायोजित
सांस्कृतिक निरक्षरता के
वर्तमान युग में
मासूमियत की नहीं
रूखी त्वचा को निखारने वाली
किसी पश्चिमी स्किन-क्रीम की
परिचायक हैं
जो त्वचा को
चक्रवृद्धि ब्याज की दर से
गोरा बनाती है
‘साइकालोजी’ ही
बदल डालती है
 
...और हृदय उसका
दूनी दर से
काला होता चला जाता है
इसीलिए साहित्यकार
हथेलियों और क्रीम में से
किसी एक का चुनाव
नहीं कर पाता है
उसकी चयन की स्वतंत्रता
अर्थहीन और खोखली है
अपनी दौड़ रही
अर्थव्यवस्था-सी!
 

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