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कविता

विरासत
प्रांजल धर


(विंसेंट वॉन गॉग के प्रति)
 
विंसेंट वॉन गॉग
या विसलर के चित्रों-सा...
पलकों में संसार समेटा है
उँगलियों के जर्जर किनारों से
बिखर पड़े दर्द को लपेटा है,
आरोपों को जिया
और गालियों को पिया
विनम्रता दी अपमान लिया
सपना सँजोया
और सारी उम्र रोया!
 
रात हो या दिन, हर पल हर छिन
बन रही बिल्डिंग की
ईंटों को ढोया,
जिंदगी के दंश को भी
उसी तरह झेल गया
जैसे माँ झेलती थी
हर रोज खान में
मौत से खेलती थी।
 
बिल्डिंग तैयार है
खान मालिक ने
तीन नई फैक्ट्रियाँ और खोल लीं
कारोबार सोने और हीरे तक फैला
इधर मरते समय
इसके कंधे पर भी
वही टी.बी. की दवाइयों का थैला
जिसे माँ को बाप ने
‘विरासत’ के तौर पर दिया था,
माँ ने विंसेंट वॉन गॉग को!
 

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