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कविता

मेरा गाँव : एक शहर
प्रांजल धर


शब्दों के साथ सिमटी हुई काव्य चेतना
कहे किसे, लिखे किसे
सौंदर्य बोध भी व्यर्थ हुआ
स्मरण नहीं जिन तथ्यों का - 
सघन गाँव की स्मृतियाँ
वह तंग-तंग सँकरी गलियाँ
भोले बच्चों की स्मितियाँ
अब विगत बनीं
उन सरल-सुकोमल कथ्यों का
क्या करे कोई, अब कहाँ लिखे
क्या इस पन्ने पर
सीमा ही जिसकी परिभाषा,
सड़ियल पन्ने और बँधी लेखनी
शहरी भावों से रुँधी लेखनी
स्याही में इतनी शक्ति नहीं
जो बाँध सके गाँवों का रस
निःस्वार्थ प्रेम को कसने में
अब सारे शब्द हुए बेबस,
वह आसमान अब रहा नहीं
पर दंश शहर का कहा नहीं।
 

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