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कविता

ठंढे-ठंढे फूल
प्रांजल धर


कचोटते हैं
ठंढे-ठंढे रंगों के ठंढे-ठढे फूल
दबे हुए रिश्तों के उलझे बबूल
मन के बरसाती झुरमुट में।
भूखी एक चील की झुकी गर्दन
झूल जाती है
विचारों के रोशनदान पर।
हाथ-पाँव ठप
बिल्कुल अगले ही पल।
...चार डिग्री तापमान पर जी रहे
विस्थापित परिवार के
खुले आसमान तले
जल रहे चूल्हे-सा सुलग रहा मन।
सटी पगडंडियों से गुजरता काफिला
विधायक जी का
किसी ‘अरजेंट’ समायोजन के लिए,
काफिला फूलों से सजा है
नहीं रखी जा सकती एक कली भी और!
 
साँय-साँय, साँय-साँय...
उठ चुकी झोपड़ी से उठतीं
निगाहें तीन जोड़ी
मानो मुस्कुराकर मंद-मंद
बाल-क्रीड़ा देख रहे हों बुद्ध;
मानो अपने अर्थ को छटपटा रही हों
कुरान की आयतें, मानस की पंक्तियाँ;
जाग उठी हों क्षण भर को
मानो सभी धर्मों की सारी ही रिक्तियाँ
और बेमतलब हो जाता हो
अफ्रीकन शिल्पकला का सौंदर्य
निहारा था पिकासो ने जिसे जी भर,
‘एविग्नॉन की स्त्रियाँ’
...उनका नंगापन भी !
झूलने लगते सृष्टि के नियम
कल्पना के पहियों पर
साइकिल की जंग लगी
तीलियों में फँसे रद्दी अखबार-से!
और कचोटने लगते हैं
और भी तेजी से,
अखबार में छपे
ठंढे-ठंढे रंगों के ठंढे-ठढे फूल
दबे हुए रिश्तों के उलझे बबूल!
 
(‘एविग्नॉन की स्त्रियाँ’ पाब्लो पिकासो का ऐतिहासिक चित्र है जिसमें उन्होंने नग्न स्त्रियों को चित्रित किया है। मानव-आकृतियों के इस चित्रण से घनवादी कला की शुरुआत हुई।)
 

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