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कविता

न कोई उम्मीद, न कोई...
प्रांजल धर


उम्मीदों की लंबी पथरीली सड़क पर चलते हुए
हर मोड़ पर खड़ा हो जाता हूँ अचेत प्रश्नाकुल-सा
प्रतीक्षा भी नहीं करता किसी की
अपेक्षा तो इतनी भी नहीं कि कोई पूछ ले हाल-चाल
कोई कहे कि ध्यान रखो खाने-पीने का
कहे कोई कि पान, तमाखू, बीड़ी या सिगरेट
तबियत के लिए बहुत ही नुकसानदेह है...
मुराही मत करो
कि खाना दोनों जून वक्त पर खाया करो,
अपेक्षा यह भी नहीं कि अक्सर खराब रहती तबियत का
लिहाज करके दो टेबलेट ले आए कोई,
कोई काढ़ा बना दे, लगी हो सर्दी जब
या खाँसियों के दौरान रात में ओढ़ा दे कोई कंबल
जब लात मारकर अनजाने स्वप्नों के दौरान उसे
दूर, बहुत दूर, फेंक देता हूँ
आजादी को उतारते हुए सोई रगों में अपनी,
कई बार तो चारपाई के नीचे भी पड़ा मिलता कंबल!
उम्मीद तो यह भी नहीं कि मौके-बेमौके कोई
दे दे उधार, सौ-पचास...
हाँ, सौ-पचास ही, ताकि देने वाले को भी कष्ट न हो बड़ा,
कई बार हजार की नोट भले ही पड़ी हो जेब में
लेकिन बस के किराये के लिए दस-पाँच रुपयों की
फुटकर जरूरत आन पड़ती है,
कौन कंडक्टर जहमत मोल ले हजार की नोट को
तोड़ने की, दो-चार की एक टिकट के लिए...
वैलेंटाइन डे पर किसी को फूल देने की
कोई भी उम्मीद स्वयं से बहुत बड़ा छलावा है
कौन लेगा वह फूल
फूल चाहे जिस रंग का हो - लाल, सफेद या पीला गुलाब!
छलावा तो यह भी कुछ कम नहीं
कि फूल तो दूर, काँटे भी न चुभाता कोई...
न ही यह चाहता हूँ कि कोई पाँच रुपये की एक कलम
मेरे जन्मदिन पर मुझे उपहार में दे दे
जो मेरी ही रहे सर्वदा के लिए
न ही यह अपेक्षा कि गिरूँ सड़क पर तो उठा दे कोई
आती-जाती बेतहाशा भीड़ के बीच!
नाउम्मीदी की इस दुनिया में कितने कम लोग रह गए हैं
जिनसे कोई आशा रख सके यह मन
आशंकारहित आशा!
दुनिया के जाल-बवाल से थककर फिर भी कई बार
ऐसी उम्मीद पैदा हो जाती भीतर
कि कोई एक कप चाय बनाकर दे दे,
जिसमें चीनी जरूरत से थोड़ी ज्यादा ही हो...
बिल्कुल देसी चाय! देर तक उबली हुई!!
और वह चाय पीते हुए खँगाल सकूँ जीवन को।
 

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