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कविता

प्रेम का भविष्य
प्रांजल धर


प्रेम के आदर्श
सीढ़ियों से सटे कमरे में
खूँटी पर टाँग दिए गए हैं
घना अँधेरा घुप्प वहाँ
और कुतर रहे चूहे
पहले प्यार की
कुछ पुरानी चिट्ठियों को
प्रेमाख्यान ग्रंथ के
बेहद जरूरी पन्ने को।
 
देखकर हड़बड़ाता हूँ
मन में प्रेयसी का चित्र
उसके नयनों में आँसू हृदय में वेदना
भीतर हाहाकार दिमाग में कोलाहल...
बड़बड़ाता हूँ
हाय! क्या होगा मेरे प्रेम का भविष्य!!
खून दौड़ता है तेजरफ्तार
पुतलियाँ नाच उठतीं आँखों की
चकरघिन्नी की तरह
बड़ी हलचल है उस चित्र में
जो मन खींचता भविष्य के लिए
एक भयंकर और डरावना दृश्य
छा जाता आँखों के सामने
क्या होगा हाय! उल्टियाँ होने लगीं
उबकाई से दबा चला जाता है मन
अचानक उठता हूँ झटककर, जाकर नहाता हूँ
कई बाल्टी पानी, माघ की सर्दी में।
 
बदलता हूँ कपड़े चार-पाँच बार
रात के तीन बजे
पर वक्त है कि गुजरता नहीं
घबराहट का सिलसिला
एक पल को भी रुकता नहीं
क्या होगा मेरे प्रेम का भविष्य!
 
मन बेचैनी से भर उठता लबालब
खत्म हो जाती सिगरेट की एक और पैकेट
हारकर बीड़ी जलाता,
पढ़ डालता एक बार में ही
उड़ती नजरों से पूरा रोजगार समाचार
हाय! किस किनारे लगेगा यह प्रेम!!
 
सुबह होते ही उतार लेता खूँटी से
प्रेम के आदर्शों को
और टोपी बनाकर पहन लेता उन्हें
ठहर जाता दौरा, दौड़ रहे खून का
ठिठक जाती जिंदगी...
रात भर यथार्थ और दिन भर आदर्श
एक-एक करके मन को दबाते हैं
साँसों में हड़बड़ाहट जारी रहती है।
 

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