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कविता

पुनर्मूषको भव
प्रांजल धर


चाहकर भी चारदीवारी फाँद नहीं पाओगी
क्या होगा ज्यादा से ज्यादा?
रोओगी, चिल्लाओगी
खाना नहीं खाओगी,
बहाना बनाओगी
घर से निकलने का
और पीला वाला सूट भी लेती आओगी।
कहोगी आ गई हूँ,
रह लिया जितना रहना था
अब अपनी
मंजिल पा गई हूँ।
चलो कहीं रह लेंगे। कहीं भी।
किसी झोंपड़पट्टी में, अनाथालय में
धर्मशाला में।
मुंबई के जुहू में या दिल्ली के रिठाला में।
टेम्स के तट, टिटिकाका के किनारे। कहीं भी।
पर रहेंगे साथ ही। तय हो चुका।
 
कहाँ तक लड़ोगी अपने भैया से?
क्या जीवन का मझधार पार हो सकेगा
इस भगोड़ी और जर्जर नैया से?
मार-पीटकर रात में सबसे छिपाकर तुम्हें
घर वापस बुला ले जाएँगे,
फिर मारेंगे, पीटेंगे दरवाजे की तरह
और खुलती चली जाओगी तुम।
धमकियाँ देंगे
फिर ‘भूल’ जाओगी साथ देखी हुई ‘फिलिम’।
वही पुनर्मूषको भव।
इसलिए फाँदो मत, सोच लो!
चाहकर भी चारदीवारी फाँद नहीं पाओगी
रोओगी, चिल्लाओगी, खाना नहीं खाओगी...।
 

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