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कविता

पाठशालाएँ
प्रांजल धर


चिलकती रगों में उतरती है गरीबी किसी कशिश की तरह
भर जाता पोर-पोर में पिछले किसी जन्म के
अनजाने कर्मों के प्रायश्चित का गहरा एक भाव
जिसे पता नहीं किसने देखा है।
इतिहास की धारा को समझने की तार्किकता तो
बचपन से ही खत्म कर दी गई,
जब पढ़ाया गया कि बुराई पर
अच्छाई की जीत ही होती आई है।
 
यह तो हम जीवन गँवाकर ही सीख पाये शायद,
कि पता नहीं जीत अच्छाई की होती या नहीं,
पर जीत जाए जो
उसे ही अच्छा साबित करने हित
मेहनत करते हाड़तोड़
भाष्यकार, कविजन, बौद्धिक और तबला वादक, सभी।
ये पराजय बोध को अमली जामा पहनाते
पिछले जन्म के कर्मों का हवाला देकर।
ये बताते कि असल में पर्याय हैं अमीरी और प्रतिभा,
चुप हो जाता मैं।
 
ये पाठशालाएँ हैं इस सीख की
कि उबलते आक्रोशों को किस तरह
ढेर कर देना चाहिए।
 

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