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कविता

वरना न ही आना
प्रांजल धर


हमारे पास आना तो हमारे ही पास आना
और केवल आना तुम,
अपने लाव-लश्कर ताम-झाम पीछे कहीं छोड़कर।
मैं थक चुका हूँ मेरे दोस्त
तुम्हारे इर्द-गिर्द छितराई बड़प्पन की कथाएँ सुन-सुन
और भरोसा नहीं कर पाता
कि तमाम रेतीली सँकरी पगडंडियों पर हम
न सिर्फ साथ चले थे
साथ बुझे और साथ जले थे,
बल्कि वे पगडंडियाँ
हमारे ही कदमों के साहस ने रची थीं।
 
अब कहाँ तुम राजमार्ग पर
तेज रफ्तार से चलने वाले अनात्मवादी,
और पगडंडियों को गले में
लटकाए घूमता मैं,
घाम हो कि छाँह, चलता रहता हूँ।
 
आना तो इस तरह कि किसी के भी
हृदय को लगे कि आना इसी को तो कहते हैं,
कि उस आने का बखान ही न कर सके कोई
कि खत्म हो जाएँ सबकी क्षमताएँ ही बखानने की।
कि जाने का विचार तक न उपज सके
आने के बाद।
 
आना तो ऐसे ही मेरे दोस्त,
कि महिमा से आक्रांत हो तुम्हारी
वही महसूसना न भूल जाए कहीं मेरा दिल
कि जिसे मन के मानसरोवर में
सबसे पहले महसूस होना चाहिए।
तुम्हारे आने से
अपना भविष्य और पत्नी के जेवर गिरवी रख 
तुम्हें पढ़ाने वाले बड़े भाई को
यह न महसूस हो हर बार की तरह
कि महाजन आया है अपना सूद उगाहने।
 

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