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कविता

एक मूरत और
आरती


मीरा गाती रही
साँसों के झाँझ मजीरे बजा बजाकर
समझाती रही प्रेम की पीर
‘मेरो दरद न जाने कोय’
न प्रेम जाना किसी ने न दीवानगी
बस, एक मूरत और जोड़ दी मंदिर में


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हिंदी समय में आरती की रचनाएँ