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कविता

माँ के लिए
आरती


तुम्हारी दुनिया, देहरी के भीतर
सबकी इच्छाओं की धुरी पर घूमती
न जाने छाया तुम या सब कुछ तुम्हारी परछाईं मात्र
माँ, तुम्हारी तरह नहीं बनना चाहा मैंने
पिता के व्यक्तित्व को आदर्श बना बैठी
और जाने कब
पिता जैसी ही बन गई

किसी सजी सँवरी स्त्री को
नहीं देखा कभी अंतर्मन के आईने में
मेरे आईने में दिखती थी एक आद्य स्त्री
तीर कमान सँभाले शिकार करती हुई
और अपने शावकों को भी शिकार करना सिखाती
वह स्त्री, जो कबीले की रक्षक होती थी
तब कोई प्राक् इतिहास मेरी आँखों में न था
अछूती थी शोध संसार से
वह स्त्री, वही आद्य स्त्री
आज मुझे नींद से झिंझोड़कर जगाती है
और पूछती है - मेरे तीर कमान कहाँ हैं
माँ! वह स्त्री
तुम्हारी हमशक्ल लगती है

इन दिनों ना जाने क्यूँ
तुम्हारे खून की शांत लहरें
मुझे अपनी ओर खींच रही हैं
तुम्हारा स्त्रीत्व, वह व्यक्तित्व
जिसे मैं अब तक नकारती रही
आज आकर्षित कर रहा है
मैं इन दिनों तुममें
खुद को टटोलने लगी हूँ

ये शामें मुझे डराती हैं
रातें साँय साँय करती हैं
नींद गोलियों की मोहताज हो गई है
ऐसे पलों में माँ,
मुझे पिता नहीं तुम याद आईं


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