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कविता

उल्टे सीधे घर
आरती


मेरी उँगलियों ने भी थामी थीं
दो सलाइयाँ
उल्टे सीधे घर बनाने का
लक्ष्य दिया गया था
कितनी चतुरता से माँएँ
सौंप देती हैं बेटी को घर
उसे आकार देने
सजाने सँवारने का काम
उँगलियों में घट्टे पड़ जाने से अधिक
घर छूट जाने का डर लगा रहता है
आजीवन दो उँगलियों की चाल पर
टिका रहता है घर

स्वेटर बुनती बेटियों को देखकर
बेहद खुश होती हैं माँएँ
एक एक घर सँभालती
अल्हड़ बेटी की तन्मयता
माँओं को आश्वस्त करती है
बेटी के हाथ का बुना पहला गुलूबंद
अनछुई ऊष्मा से सराबोर कर देता है
एक एक फंदे को परखती
ताकीद देती कहती है -
और अच्छा बुनो, हमेशा माँ नहीं होगी साथ


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