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कविता

घुड़सवार महिला की कहानी

आरती


मैं एक रास्ता बनकर फैल जाना चाहती हूँ चुपचाप
इस ऊबड़ खाबड़ कंक्रीट के बियाबान में
उसी तरह, जैसे फैल जाती थीं हमारी नींद में
दादी की कहानियाँ
मैं उन्हीं कहानियों की रंगीन पृष्ठों वाली किताब बनकर
उनके पन्नों की तरह फड़फड़ाना चाहती हूँ
इस तरह कि गुजरे जहाँ से सदी दर सदी
चहलकदमी करे घर त्यौहार छोटी छोटी खुशियाँ गम
और कमोबेश बासठ बहत्तर या बयासी की उमर में
जब नई पौध दिन में सोए और
रात-रात भर काम कर रही हो
मैं धीरे से दाखिल होकर
उनके प्यालों में कॉफी की तरह
सुनाऊँगी ‘हूँकी’ के बिना ही
घुड़सवार महिला की कहानी या कोई और
बिलकुल दादी की लय में

 


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