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कहानी

एक और अहिल्या
उर्मिला शुक्ल


जल्दी जल्दी तैयार होकर वह बस स्टैंड पहुँची मगर बस का तो कहीं अता पता ही नहीं था। वैसे भी यहाँ बसों के आने जाने का कोई टाइम कहाँ होता है।

प्राइवेट बसें हैं आ गईं तो आ गईं, नहीं तो बायपास रोड से ही चली जाती हैं? और बेचारे गाँव वाले इंतजार ही करते रह जाते हैं। सो उसे भी बस के इंतजार में समय तो काटना ही था। ये गाँव का बस स्टैंड था, जहाँ टपरेनुमा एक ही होटल था वहाँ पान बीड़ी और सिगरेट से लेकर साबुन, तेल, कंघी तक हर चीज मिलती थी।

होटल के दोनों दोनों और लकड़ी का एक एक फट्ठा रखा था। दोनों ओर चार चार ईंटें लगाकर उसे बेंच का रूप दिया गया था। पूरे बस स्टैंड में बैठने की यही एक जगह थी। सो वो भी वहीं बैठ गई थी। उसने देखा भट्ठी पर चाय का पानी खौल रहा था और चाय देने वाला लड़का कोने में बैठकर ऊँघ रहा था। ये वही लड़का था जो बस के आते ही चाबी भरे गुड्डे की तरह फुदकने लगता है। एक हाथ में केतली और दूसरे हाथ में गिलास लिए पेशल चाय - पेशल चाय की खनकती आवाज यात्रियों को घेरने लगती है। उस समय तो उसे अपनी बुचकती हाफ पेंट का भी होश कहाँ रहता है। मगर ये हलचल बस कुछ देर ही रहती है यहाँ। और फिर यही सन्नाटा।

उसने देखा उस राह को जहाँ से होकर बस को आना था मगर अब तक बस की कोई खबर नहीं थी। बैठे बैठे ऊब चली थी सो उसका मन किया कि तालाब की ओर निकल जाय। और वो तालाब की ओर चल पड़ी थी। ये बड़ा तालाब कहलाता है और ये सिर्फ नाम का बड़ा तालाब नहीं है इसमें बारहों महीने इतना पानी रहता है कि इस गाँव के साथ साथ आस पास के कई गाँवों का निस्तार भी इसी से होता है। उसने देखा निर्मल पानी की उठती लहरों को जो हवा में हिलकोरे ले रही थीं। वो सीढ़ियों पर बैठ गई। अब जल में उसका चेहरा नजर आने लगा था। अब कितना साफ है इसका पानी। मगर पहले... पहले इसका पानी ऐसा साफ नहीं था। और गाँव भी तो...? और पानी पर बनती बिगड़ती लहरों के साथ वह अतीत में झाँकने लगी थी...

तब उसकी नई नई पोस्टिंग हुई थी यहाँ। छोटा सा ये गाँवनुमा कस्बा, कुछ भी तो ऐसा नहीं था यहाँ जो उसे बाँध पाता। सो अपने काम के बाद ऊबती रहती थी और अपनी ऊब मिटाने के लिए अक्सर इधर उधर निकल जाती थी। कभी हरे भरे खेतों की ओर, तो कभी इस तालाब की ओर। तब इसके घाट कच्चे थे और घाट भी क्या? घाट के नाम पर इसके दोनों ओर दो-चार पत्थर रखे थे। एक मर्दाना घाट था जिसे यहाँ के लोग डउका घाट कहते थे और एक जनाना घाट था जो डउकी घाट कहलाता था। गाँव का निस्तार इन्हीं दो घाटों से होता था। और बाकी के दोनों छोर उजाड़ से पड़े थे। वहाँ जलकुंभी का साम्राज्य था सो उधर कोई नहीं जाता था। उस दिन वो फुरसत में थी सो उधर ही चली गई थी।

दिन डूब चला था और रात उतरने वाली थी। वो लौट ही रही थी कि जलकुंभी वाले किनारे पर एक परछाईं सी उभर आई थी। वो उस ओर बढ़ी तो परछाईं कुछ साफ हुई।

वो एक युवती थी जो, घुटनों तक पानी में खड़ी कपड़े धो रही थी। उधर घाट नहीं था और न ही कोई पत्थर इसलिए वो कपड़ों को दोनों हाथों से मसल मसल कर खंगाल रही थी। कपड़े धोने में वो इस कदर तल्लीन थी कि उसने उसे देखा ही नहीं। मगर वो...? वो अकचका गई थी! घाट छोड़कर इस दलदली और निर्जन किनारे पर वो भी इस उतरते अँधेरे में! ऐसे एकदम अकेले! जबकि औरतों का घाट तो उधर है! और यहाँ औरतें तो अपने ही घाट पर जाती हैं फिर ये? इसी उधेड़बुन में उसका पैर एक पत्थर पर पड़ा और क्षण भर को वो लड़खड़ाई फिर सँभल गई मगर पत्थर लुढ़ककर पानी में जा गिरा। और छपाक की आवाज के साथ ही वह चौंक उठी और फिर वो उत्ता धुर्रा धुले अनधुले कपड़े समेटे और भाग खड़ी हुई थी।

उसने देखा उसकी चाल में भी भय की परछाइयाँ उतर आई थीं और उसका साँवला चेहरा और सँवला गया था। अकचका तो वो भी गई थी। 'उसका यूँ जलकुंभी वाले घाट में कपड़े धोना और फिर मुझे देखकर यूँ डर कर भागना? कैसा डर है ये? वो भी मुझसे? मैं भी तो उसी की तरह एक लड़की हूँ। फिर ये भय?' सोचकर वो उसके पीछे चल पड़ी थी।

खेतों से होती हुई एक पगडंडी दूर पहाड़ी तक चली गई थी। पहाड़ी पर पहुँच कर उसने देखा वहाँ एक छोटी सी झोंपड़ी थी, जिसकी छानी पत्तों से बनायी गई थी। और बाँस की कमचिल का बना एक द्वार था। वो द्वार इतना छोटा था कि लगभग बैठकर ही उसमें प्रवेश किया जा सकता था। वह चाहती थी कि भीतर जाकर देखे कि...? मगर गई नहीं।

उसने देखा झोंपड़ी के सामने एक चबूतरानुमा पत्थर रखा था। उस पर सिंदूरपुती एक मूर्ति रखी थी। उसने ध्यान से देखा उसके सामने सिंदूर लगा नीबू और कुछ काली चूड़ियाँ भी रखी हुई थीं। वह देख रही थी उसे पर पहचान नहीं पा रही थी कि ये मूर्ति किसकी है? मगर चूड़ियों से उसने अनुमान लगा लिया था कि हो न हो ये किसी देवी की मूर्ति ही है। मगर किस देवी की? और बहुत कोशिश करने के बाद भी वो पहचान नहीं पाई थी। एक तो शाम का समय और वो निर्जन पहाड़ी। सो हवा भी किसी रहस्य की तरह सरसरने लगी थी। वो कुछ देर तो वहाँ खड़ी रही फिर लौट चली थी। कुछ दूर चलकर उसने पीछे देखा, अब झोंपड़ी से पीली सी रोशनी फूट रही थी।

नमस्ते पटवारी बहन जी।
उसने मुड़कर देखा एक छाया उसी की ओर बढ़ रही थी। धुँधलका गहराने लगा था सो दूर से पहचान पाना मुश्किल था। मगर वो जानती थी गाँव का ही कोई होगा। ये संबोधन तो उसे गाँव वाले ही देते थे। शुरू शुरू में उसे बहुत अटपटा लगता था - पटवारी बहन जी! ये भी भला कोई संबोधन है! मगर गाँव वाले भी क्या करते, उन्होंने अब तक महिलाओं को स्कूल में ही देखा था और उन्हें बहन जी कहा करते थे। वैसे भी वह इस गाँव के लिए तो पहली महिला पटवारी थी। उसे क्या कहें उन्हें शायद समझ ही नहीं आया, सो सब उसे पटवारी बहन जी कहने लगे थे और अब तो उसे भी इसकी आदत सी हो चली थी। धीरे धीरे वो छाया पास आई तो उसने पहचाना वो बिसाहू राम जी थे। गाँव के गँउटिया। अब दोनों गाँव की ओर बढ़ चले थे।

"पटवारी बहन जी! आप उधर कहाँ गई थीं?'

बस यूँ ही। टहलते हुए उस पहाड़ी तक चली गई थी। गंउटिया जी! उस चबूतरे पर किस देवी की मूर्ति है?

पटवारी बहन जी आप वहाँ गई थीं! उस टोनही पहाड़ी पर? उसकी बात को अनसुना करते हुए गँउटिया ने प्रतिप्रश्न किया था। इसके साथ ही उनके चेहरे पर उसके लिए असीम दया उभर आई थी। और वो चकित सी रह गई थी। इस दया के स्थान पर अगर क्रोध उभरता तो उचित होता वो। गाँव के इस माहौल में, इतने अँधेरे में, उसका यूँ अकेले जाना क्रोध का कारण था मगर ये दया भाव उसकी समझ से परे था। सो उसने पूछा -

"आप इतने परेशान क्यों हो गए? ये पहाड़ी गाँव से इतनी दूर भी तो नहीं है कि...? "

तब उन्होंने बताया कि उस पहाड़ी पर रहने वाली वो युवती टोनही है। टोनही यानी वो डायन जो लोगों को खा जाती है।" मगर वो पहले ऐसी नहीं थी। बहुते गुनी थी वो। इतनी गुनी कि गाँव भर में उसकी बराबरी में कोई नहीं था। मगर फिर न जाने का हुआ कि उसने टोना सीख लिया? मसान जाके टोना जगाने लगी? और सबसे पहले अपने बाप को खाया! और बाद में तो गाँव के कितने ही लोगों को खा लिया उसने। बूढ़े जवान यहाँ तक बच्चा मन को भी नई छोड़ा उसने! तब तंग आकर हम लोगों ने उसे गाँव से बाहर हकाल दिया। अब वो गाँव के बाहर उस पहाड़ी पर रहती है। अब उससे मुक्ति है हमें।" कहते हुए उनकी आँखों में घृणा झलक उठी थी।

और उसकी आँखों में निर्जन में कपड़े धोती, फिर धुले अधधुले कपड़े बटोरकर भागती उस युवती का भय उभर आया था। अब वो समझ गई थी उसके भय का कारण। किसी मनुष्य पर उसकी छाया जो पड़ गई थी। तो क्या अब वो सचमुच मनुष्य नहीं है? शायद नहीं। इन लोगों की नजरों में तो हरगिज नहीं। तभी तो... और उसका मन व्यथित हो उठा था।

गँउटिया ने और भी बहुत कुछ बताया था। उससे जुड़े कई भी सुनाए थे और अपनी कोलकी में मुड़ने के पहले उन्होंने उसे बैगा को दिखा लेने की बात कही थी, ताकि वो टोनही की मारक शक्ति से बच सके। और वो? वो तो सिर्फ एक ही बात सोच रही थी कि ऐसा कैसे संभव है? औरत जो सृजन का आधार है; जो रचती है। वो भला टोनही कैसे हो सकती है? मगर इस इलाके में ये अंधविश्वास बहुत गहरे तक धँसा था। उसे अखबारों में पढ़ी ऐसी अनेक घटनायें याद हो आई थीं। मगर जादू-टोने पर उसे यकीन नहीं था। मगर ये लोग? इस इक्कीसवीं सदी में भी? वो व्यथित हो उठी थी, इतनी कि रात भर सो ही नहीं पाई। वो सोच रही थी उन लांछनों के बारे में, जो उस युवती पर लगाए गए थे। अपने ही पिता और गाँव वालों को खा जाने का लांछन! किसी मनुष्य को यूँ पिशाच बना देना कितना आसान है इनके लिए! मगर दोष इनका नहीं, इनके माहौल का है; जिसमें इस तरह के अंधविश्वास पनपते हैं। और कोई विरोध करने वाला या सही स्थिति बताने वाला भी तो नहीं है। कोई बात नहीं, अब तक जो हुआ, सो हुआ। मगर अब वो समझाएगी इन्हें। तोड़ेगी उन भ्रांतियों को जिनके चलते एक औरत डायन मान ली जाती है। मगर वो कुछ कर पाती इससे पहले उसे ज्वाइंडिस ने आ घेरा और माँ उसे शहर लिवा ले गई थी। फिर तो वो अपनी बीमारी में ऐसी उलझी कि...

और लंबी छुट्टी के बाद जब वो गाँव लौटी तो... उसने देखा गाँव बीचोंबीच गौरा चंउरा के इर्द गिर्द भीड़ जमा थी। मगर सब खामोश थे। उसे आश्चर्य हुआ' इतनी भीड़! और वो इतनी खामोश कि...।' फिर उसने सोचा, कोई तमाशा दिखाने वाला आया होगा तभी तो सब साँस रोके तमाशा देख रहे हैं। चलें देखें भला ऐसा कौन सा तमाशा आया है कि... और उसके कदम भीड़ की ओर बढ़ चले थे। जैसे जैसे वो भीड़ के करीब पहुँची उसे सिसकियाँ सुनाई दीं। फिर तो भीड़ को चीरकर वो उसके सामने जा पहुँची और उसने देखा एक आदमी नारियल बुच की रस्सी से एक युवती को पीट रहा था। रस्सी की मार से उसके शरीर पर नीली नीली लकीरें उभर आईं थीं, उसका सारा शरीर धूल धूसरित था और उसके ओठों की कोर से खून बह रहा था। वो उसे पहचान नहीं पाई थी।

सो उसने लोगों से पूछा था - "ये क्या हो रहा है? इसे ऐसे क्यों...? मगर किसी ने कोई जवाब नहीं दिया था। सब मंत्रबिद्ध से देख रहे थे उसे। उसने देखा वहीं परदेशी के बेटे की लाश रखी थी। अब सब कुछ साफ हो उठा था। और फिर बैगा का हंटर फिर उसके शरीर को छू पाता उससे पहले उसने बैगा का हाथ पकड़ लिया था।

फिर तो चारों ओर हाहाकार ही मच गया था। उसने धर्म कार्य में बाधा जो दी थी। एक टोनही को मारना धर्म कार्य ही तो था। उसने कितनों को खा लिया था। हत्यारिन थी वो। सो गाँव वालों ने उसे प्राण दंड देने का फैसला लिया था। वो जानती थी कि परदेशी का लड़का कुपोषण का शिकार था। पौष्टिक भोजन और उचित इलाज के आभाव से ही उसकी मृत्यु हुई थी। मगर इस समय किसे समझाती वो? उसके सामने तो भीड़ थी। विवेकहीन और उत्तेजित भीड़। अब भीड़ से उसके विरोध में आवजें तो उठ रही थीं मगर खुलकर कोई सामने नहीं आ रहा था। कारण वो पटवारी थी और गाँव के लिए पटवारी सबसे बड़ा अफसर होता है। उसी के हाथ में सब कुछ होता है। वो खसरा में जो भी लिख दे वही फाइनल। इसलिए लोग दबे मुँह ही उसका विरोध कर रहे थे। और ये बात वो भी जानती थी। इसीलिए उसने गँउटिया से बात की। वे गाँव के मुखिया भी थे और कुछ पढ़े लिखे भी थे। हालाँकि इस अंधविश्वास से वो भी मुक्त नहीं थे। मगर और कोई उपाय भी तो नहीं था।

सो उसने उनसे अपनी बात कही और चेताया भी "अगर आप कुछ नहीं करेंगे तो मुझे पुलिस का सहारा लेना पड़ेगा।" और गँउटिया बुझे मन से उसकी बात मान मान ली। मगर गाँव वाले? वे बहुत नाराज थे। वे उसे क्षमा नहीं कर पा रहे थे मगर विवश थे उसका विरोध करने की हिम्मत किसी में नहीं थी सो विवश क्रोध में फनफना रहे थे... उसके पास कुछ दवाएँ थीं। उसने उसके घावों पर लगाईं और उसे साथ लेकर घर की ओर चल पड़ी ताकि वो सुरक्षित रह सके। और रास्ते में उसने जो कुछ बताया वो...


जंबो नाम की वो युवती गाँव के वैद्य की इकलौती लड़की थी। पढ़ लिख कर नर्स बनने का सपना देखा था उसने। गाँव में स्कूल न होने के कारण पाँच मील पैदल चलकर भी वो स्कूल जाती थी।

गाँववाले अक्सर उसकी पढ़ाई की आलोचना करते। उसके बाबूजी से कहते - "भइगे बेटी ल अउ कतका पढ़ाबे? अब ओखर बर-बिहाव कर अउ अपन घर पठो।" मगर बाबूजी उनकी बात एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देते। वे भी चाहते थे कि उनकी बेटी कुछ बन जाए। मगर वो दसवीं में पहुँची ही थी कि उनका देहांत हो गया। अब वो बिलकुल बेसहारा हो गई थी। सो गाँव लोगों की नजरें भी बदल गई थीं। हर कोई उसे खा जाने के फिराक में रहने लगा और कामयाबी न मिलने पर उस पर तरह तरह के लांछन लगाए जाने लगे। अब वो अपने घर में भी सुरक्षित नहीं थी। आधी रात को उसका दरवाजा भड़भड़ा उठता और सहमकर एक कोने में दुबक जाती। इस माहौल में उसका जीना दूभर हो गया था। वो सोच नहीं पा रही थी कि आखिर क्या करे? किससे शिकायत करती वो? गँउटिया का बेटा भी तो उन्हीं लोगों में शामिल था। "फिर मुझे याद आई थी मंटोरा। और उसे अपनी राह मिल गई थी फिर मैंने अपने घर के बाहर एक चबूतरा बनाया और उस पर सिंदूर पुती मूर्ति स्थापित की।

और कार्तिक अमावस्या की उस अंधियारी रात में मसान साधना का स्वाँग भी किया। मुझे याद है उस ठंड में भी मैं भय से किस कदर पसीने पसीने हो गई थी।" कहते हुए उसके चेहरे उस भय की परछाई उभर आई थी। '...मगर दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं था। पर मेरा वो स्वाँग रंग लाया था। सुबह लोगो ने मुझे मसान में देखा तो मेरे टोनही होने की बातें उठीं और सारे गाँव में फैल गई। मगर लोग अब मुझसे भय खाने लगे थे। तभी गाँव में एक मौत हुई, मैंने उस रात भी साधना करने का स्वाँग भरा। मैं लोगों के पीछे मसान भी गई। फिर तो लोगों को पक्का यकीन हो गया कि उस मौत का कारण मैं ही हूँ। और फिर गाँव में हैजा फैला उसने तो मुझे खाँटी टोनही साबित दिया।"

"फिर? "

फिर क्या। मेरे खिलाफ पंचायत बैठी और मुझे गाँव से बाहर निकाल दिया गया। अब तो गाँव ही नहीं पूरे इलाके की मौत का दोष मुझ पर थोपा ही जाता। मगर मैं अब खुश थी। टोनही ने तो मुझे जीते जी मार दिया था मगर उसी ने कवच बन कर मेरी औरत को बचा लिया था। मगर इस बच्चे...? "

और उसे याद आई थी सतयुग की वो अहिल्या जिसे बिना किसी दोष के पाषाणी बना दिया गया था। उसने देखा जंबो की आँखों में दर्द ठहर सा गया था। उसे पढ़ी सुनी अनेक घटनाएँ याद हो आईं और उसका मन तड़प उठा। कब तक? आखिर कब तक चलेगा ये सिलसिला? कब तक औरत यूँ पाषाण बनती रहेगी? और उसे पाषाण बना देने वाला समाज और उसके ठेकेदार? वे यूँ ही...? नहीं कुछ तो करना ही होगा। मगर अभी तो जंबो के लिए...

और उसने गँउटिया से सारी बातें कहीं वे गाँव के मुखिया थे और औरों से अधिक समझदार भी। उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि जंबो के साथ गलत हुआ है। सो उन्होंने उसका साथ दिया था। वे उसके आभारी थे कि उसके कारण वे स्त्री हत्या के पाप से बच गए। दूर से आते बस हार्न से उसकी तंद्रा टूटी और वो चल पड़ी थी। सड़क पर धूल के गुबार उठाती बस नजदीक आ रही थी। धूल के गुबार और गहराए और एक लंबे हार्न के साथ ठहर गए थे। बस स्टैंड पर लग चुकी थी और बस के द्वार पर खड़ी थी वो। कलफ लगी कड़क सफेद साड़ी मगर चेहरे पर पर थी अथाह कोमलता।' सचमुच इसने सेवा की सच्ची ट्रेनिंग ली है।' सोचते हुए वो उसकी ओर बढ़ रही थी तभी गँउटिया भी आ गए थे। उनके साथ कुछ लोग और भी थे। सबने आगे बढ़कर अपने गाँव की नर्स का स्वागत किया था। कल तक जिसकी छाया भी वर्जित थी आज वही यह सबकी छाया बन गई थी।


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