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उपन्यास

सुन्नैर नैका
पुष्यमित्र


सुरपति राय का भसियाना

दिल्ली में रहते हुए सुरपति राय भसियाने लगे हैं। ऐसा हमारा अनुमान नहीं खुद सुरपति बाबू की अपनी सोच है। जो सुधि पाठक कोसी-मिथिला और अंग के इलाके से बावस्ता हैं, वे इस भसियाना का अर्थ जरूर समझते होंगे। उन्हें अगर समझाने लगूँ तो मेरी काबिलियत की जोरदार खिल्ली उड़ाएँगे। उन पाठकों से क्षमा माँगते हुए मैं इस शब्द का अर्थ अन्य पाठकों की सेवा में हाजिर कर रहा हूँ। भसियाना शब्द का मूल भसान है और यह शब्द संस्कृति के विसर्जन से हमें प्राप्त हुआ। भसान का अर्थ तो विसर्जन है मगर भसियाना को लोग मानसिक विसर्जन के रूप में इस्तेमाल करते हैं। आधुनिक संदर्भ में इसे स्मृति लोप के प्रारंभिक चरण के रूप में समझा जा सकता है। मगर ग्रामीण आमतौर पर इसे बहुत गंभीरता से लेते नहीं हैं। कहते हैं बुढ़वा भसिया गया है। आजकल उल-जुलूल काम करने लगा है।

सुरपति राय कहते हैं सठियाना से कम रोचक नहीं है अस्सी की उम्र में भसियाना। इस दौर तक आते-आते इनसान वही सब करने पर मजबूर हो जाता है, जिससे वह ताउम्र बचने की कोशिश करता रहता है। कहते हैं - जिस तरह महात्मा गांधी ताउम्र डाक्टर, वकील और हिंसा से परहेज करते रहे, हम भी उसूल बना कर तय कर लिए थे कि कभी महानगर में नहीं रहेंगे, डाक्टरी चीड़फाड़ नहीं करवाएँगे और टीवी-सिनेमा से दूर रहेंगे। मगर देखिए अकल और समय का फेर, अभी पंद्रह दिन पहले एम्स के कुशल दर्जियों ने पेट उघार कर सीया है, दो महीने से महानगर दिल्ली में प्रवास कर रहे हैं, नजर के सामने चौबीस घंटा टीवी चलता रहता है उसको बंद भी नहीं करवा सकते (दूसरे के घर में रहने का यही सुफल है)। अच्छा हुआ बापू अस्सी के पहले सिधार गए नहीं तो उनको भी गॉल-ब्लाडर का ऑपरेशन करवाना पड़ता और अहिंसा का प्रण त्याग कर नाथूराम से पिस्तौल छीन अपने ही चेलों पर गोली चलाना पड़ता।

दरअसल तमाम उम्र सात्विकता में गुजारने के बाद ऐन परलोक यात्रा से पहले उनके साथ जो हादसा पेश आया उसका जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि उनका अनन्यतम और जघन्यतम भतीजा डॉ. विश्वंभर हैं। इस साल पिता की बरसी पर जब वह गाँव पहुँचा तो पितातुल्य चाचा को बुरे हाल में पाया। वह उन्हें जबरन दिल्ली उठा ले आया। विश्वंभर की जगह कोई और होता तो वे आज भी गाँव में आराम से जलनेति (एक तरह की प्राकृतिक चिकित्सा) करते रहते। भले ही रात-रात भर तड़पाने वाली उदरपीड़ा के कारण उन्हें असमय इहलीला समाप्त कर देनी पड़ती (असमय? क्या अब भी समय नहीं आया है?)। मगर विश्वंभर के आपरेशन के प्रस्ताव पर वे चिर परिचित दुर्वासावतार धारण नहीं कर सके। गाँव के लोग सही ही कहते हैं, सुरपति राय अगर किसी से डरते हैं तो विश्वंभर से, किसी पर दिलोजान से मरते हैं तो विश्वंभर पे... और किसी से हद से ज्यादा नफरत करते हैं तो वह भी डॉ. विश्वंभर राय, निदेशक, लोक कला अकादमी, दिल्ली सरकार से ही।

अब इससे पहले कि मैं चचा-भतीजा मुहब्बत-नफरत कांड का संक्षिप्त किंतु सारगर्भित विवरण दूँ, बेहतर यही होगा कि पहले सुरपति राय का तार्रुफ आपसे करा दूँ। वैसे अगर मैं यह कहूँ आपमें से कई सुरपति राय को पहले से जानते हैं तो आप हैरत में पड़ जाएँगे। मैं झूठ थोड़े ही कहता हूँ, जिन सुधि पाठकों ने फणीश्वरनाथ रेणु का प्रसिद्ध उपन्यास 'परती परिकथा' पढ़ा होगा वे घाट हाकिम सुरपति राय को भला कैसे भूल सकते हैं। वही घाट हाकिम जो अपनी पीएच-डी. के लिए लोकगीत और लोककथा जुटाने कोसी और उसकी उप नदियों के किनारे-किनारे भटका और घटवारों के आगे-पीछे डोला करते थे। सुरपति राय वही तो हैं। इनका असली जीवन काफी हद तक इसी तर्ज पर गुजरा। किसी घाट पर रेणुजी से टकरा गए सो उनने संदेह इन्हें अपने उपन्यास में उतार लिया।

सुरपति मूलतः दरभंगा जिलावासी हैं पर कोसी के कछार में भटकने के कारण लंबे समय तक उनकी पहचान घाट हाकिम और कथा कलक्टर के रूप में ही रही। कोसी कछार की लोक कथाओं ने उन्हें ऐसा मोहा कि वे पीएच-डी. तक को भूल बैठे। अररिया जिले के एक हाईस्कूल में नौकरी कर ली और बस गए। शादी-ब्याह तक की सुध न रही। गाँव में तो यह अफवाह भी उड़ी थी कि वहीं किसी घटवारिन से लगन लगा बैठे हैं। बात चार आने सच भी हो सकती है। कथा-कहानियों के चक्कर में घटवारों से उनका प्रेम तो जगजाहिर था। स्कूल में छुट्टी के बाद वे सीधे घटवारों के मुहल्ले पहुँचते और बूढ़े-बूढ़ियों के बीच बैठकर गप्प हाँकते रहते। कथा-कहानी सुनते और बदले में उनके बाल-बच्चों को सँभालते। धीरे-धीरे उनकी लोक कथाओं वाली कॉपी मोटी हो रही थी कि उनके जीवन में बारह वर्षीय बालक विश्वंभर का प्रवेश हुआ। विश्वंभर उनके बड़े भाई का पुत्र था। भैया ने उसे यह कहते हुए भेज दिया था कि विद्यार्थी लगनशील है। तुम तो जानते ही हो अपने गाँव में हाईस्कूल है नहीं। रोज दस किमी पैदल चलकर पढ़ पाना कठिन साबित हो रहा था। तुम्हारे साथ रहेगा तो अच्छा ही रहेगा, कुछ तुम्हारा संस्कार भी पा लेगा (बस गितक्कर-बतक्कर न बने)। कहते हैं बड़े भैया की दिली इच्छा तो यह थी कि कुँवारे और अपेक्षाकृत पैसे वाले चाचा का उत्तराधिकारी बन गया तो क्या बुरा है? सुरपति उन दिनों चालीस के लपेटे में थे। यह वही उम्र होती है जब अविवाहित रहने का प्रण कर बैठा हर इनसान अपने अकेलेपन से घबराने लगता है। उनमें से कई तो ऐसी-वैसी-कैसी भी लड़की तलाश कर ब्याह कर बैठते हैं और तमाम उम्र अपने इस निर्णय पर कुढ़ते रहते हैं। कई किसी बच्चे को गोद लेकर उसी के सहारे जीने की कोशिश करते हैं। कुछ अतिगंभीर किस्म के चिरकुँवारे कुत्ता या बिल्ली पाल लेते हैं। बहरहाल आशय सिर्फ इतना है कि विश्वंभर की टाइमिंग जबरदस्त थी। जल्द ही दोनों ने पिता-पुत्र की भूमिका में समाने की कोशिश शुरू कर दी।

सुरपति ने विश्वंभर को बिल्कुल वैसा बनाने में सब कुछ झोंक दिया, जैसा वे खुद बनना चाहते थे मगर लोककथाओं की मुहब्बत में कुछ और बनकर रह गए थे। स्कूल के बाद पहले पटना भेजा, फिर दिल्ली। कुशाग्रबुद्धि विश्वंभर को दिल्ली विवि और जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में ज्ञानार्जन का मौका मिला। वे विश्वंभर के जेएनयू वाले दिन ही थे कि सुरपति का जीवन एक बार फिर बदल गया। एम.ए. के बाद जब पीएच-डी. की बारी आई तो विश्वंभर ने शोध के लिए कोसी की लोककथाओं को ही अपना विषय चुना। विश्वंभर का यह कदम सुरपति के लिए नाकाबिले बरदास्त था। वे विश्वंभर को अच्छी तरह जानते थे लोक कहो या फोक उसे इन चीजों से रत्ती भर लगाव न था। उन्हें समझ आ गया था कि विश्वंभर क्या चाहता है और क्या करने वाला है? उनके लिए यह सदमा बज्रपात सरीखा साबित हो रहा था कि उनकी बरसों की मेहनत ने एक अवसरवादी चोर का निर्माण किया है। बहरहाल हमेशा की तरह उनकी जुबाँ से उफ तक नहीं निकला। उन्होंने अपनी लोककथाओं-गीतों वाली कॉपी के प्रयोग का इंतजार किया और विश्वंभर को पीएच-डी. ग्रांट होते ही कॉपी अग्निदेव को समर्पित कर दी। पीएच-डी. के बाद जल्द ही डॉ. विश्वंभर की पहचान लोक संस्कृति के विशेषज्ञ के तौर पर होने लगी और संस्कृति विभाग की अफसरी पाने में उन्हें ज्यादा वक्त न लगा। इधर दो-दो असफलताओं से कुंठित सुरपति दुर्वासावतार को प्राप्त होते चले गए।

इन दिनों विश्वंभर के सरकारी बंगले में लेटे सुरपति के दिमाग में यह सब बातें धुँधली हो चली है, पर लोक कथाओं की जली हुई कॉपी का धुआँ ज्यों का त्यों है। वे इस बात से अधिक परेशान नहीं हैं कि उन्हें दिल्ली में विश्वंभर के घर रहकर ऑपरेशन कराना पड़ रहा है। उनकी परेशानी की असली वजह लोककथा वाली कॉपी से ही जुड़ी है। दरअसल कल रात उन्हें विश्वंभर की बेटियों से वादा करना पड़ा कि वे उन्हें सुन्नर नैका की कहानी सुनाएँगे।

सब कुछ टीवी पर चल रहे उस समाचार के कारण हुआ जिसमें झारखंड में नक्सलियों द्वारा दस पुलिसकर्मियों को उड़ा देने की सूचना आ रही थी। दफ्तर से लौटकर विश्वंभर अपनी बेटियों के साथ उसी के कमरे में बैठा था। इस समाचार पर उसकी बड़ी बेटी ने कहा - झारखंड को अब बरबादी से बचाना इंपासिबल है। कितना पोटेंशियल था इस नए स्टेट में। बिहार से जब अलग हुआ था तो सब यही कहते थे कि बहुत जल्द यह देश का नंबर वन स्टेट बन जाएगा। अब तो लगने लगा है कि कहीं करप्शन और वाइलेंस में बिहार को पछाड़ कर यह नंबर वन न हो जाए।

इस पर विश्वंभर बोल पड़ा - ऊपरी तौर पर ऐसा जरूर लगता है, मगर गहराई में उतर कर देखोगी तो समस्या कुछ और ही मिलेगी। यह राज्य जरूर आदिवासियों के नाम पर बना है मगर इस पर राज गैर-आदिवासी ही कर रहे हैं। तुम जो कुरसी पर बैठे मुंडा, मरांडी, कोड़ा और सोरेन नामधारी नेताओं को देखती हो, इससे यह भ्रम मत पालना कि वे राज कर रहे हैं। ये तो बस मोहरे हैं, जिन्हें वहाँ के उद्योगपतियों, कोल माफियाओं और ठेकेदारों ने सामने खड़ा कर रखा है ताकि परदे के पीछे से वे अपनी लूट-खसोट जारी रख सकें। दुर्भाग्य की बात यह जरूर है कि आदिवासियों की नुमाइंदगी करने वाले इन नेताओं को भी माफियाओं की दलाली रास आने लगी है। लिहाजा आम आदिवासी आज भी उतना ही गरीब है, उतना ही शोषित जितना राज्य बनने से पहले था। कई लोग तो इन्हें इनसान ही नहीं समझते हैं। पशु समझते हैं या फिर राक्षस... यही वह राक्षस शब्द था जिस पर सुरपति भसिया गए और धरे चले गए। उनके मुँह से निकल पड़ा - राक्षस नहीं राकस। दंता राकस... बाद में उन्हें महसूस हुआ कि पोतियों के हाथ में उन्होंने जिज्ञासाओं की पोटली थमा दी है। इसका अंत इस वादे के बिना कैसे हो सकता था कि वे उन्हें दंता राकस और सुन्नैर नैका की कथा सुनाएँगे।

तब से सुरपति भारी पशोपेश में हैं। उन्हें लग रहा है कि दंता राकस उनके सीने पर कुंड खोद रहा है और सुन्नैर नैका छम-छम नाच रही है। वही सुन्नैर नैका की कथा जो उन्होंने चालीस-पैंतालीस साल पहले अररिया के परानपुर इस्टेट की हवेली के आँगन में अर्धांग से पीड़ित अप्रतिम गीतकार रग्घू रामायणी की काँपती आवाज में धड़कते दिल सुनी थी। हर पल उत्तेजित करने वाली वे पाँच रातें और पाँच कुंडों की खुदाई के बीच पल्लवित होती अमर प्रेम कथा। क्या वह रग्घू रामायणी के रोल में समा पाएगा? क्या दोनों बच्चियाँ रग्घू रामायणी की भाषा समझ पाएँगी? काश उसे भी सुन्नैर और सुन्नर की तरह कामाख्या का काला जादू आता और वे खुद को आधा रग्घू रामायणी और आधा जेएनयू के किसी प्रोफेसर में बदल सकते, ताकि सब कुछ कहना और समझाना आसान होता...।

कुपित हो गई कोसी मैया

सावन का महीना था। आठ-दस बैलगाड़ियों की कतार चर्र-चोयं, चर्र-चोयं करती किसी लंबे सफर के लिए चली जा रही थी। एक सुंदर कन्या, तुम दोनों जैसी ही नई उमर वाली, हथेली पर ठुड्ढी धरे लीक के दोनों और पसरी हरियाली को टुकुर-टुकुर निहार रही थी। नाम था उसका सुन्नैर नैका।

इतना कह कर सुरपति राय ने नजरें उठाई और सामने बैठीं दोनों पोतियों को कथा के रस का पान करता पाया। लगा सब ठीक है। श्रोता गंभीर हैं, कथा का अनादर नहीं होगा। आश्वस्त होकर फिर शुरू हुए।

नाम सुनकर तो तुम्हारे जमाने के लोग हँसेंगे। सुन्नैर नैका, गँवारों वाला नाम। अपनी सहूलियत के लिए तुम लोग उसे सुंदरी नायिका भी पुकार सकती हो। नाम सुंदरी टायटिल नायिका। अररिया जिले के परानपुर हवेली की राजकुमारी थी इसलिए नायिका उपाधि मिली थी और उसका भाई था नायक। सुन्नर नायक। कहने को तो सुंदरी नायिका और सुंदर नायक भी कहा जा सकता है मगर जो रस सुन्नैर में है सुंदरी में कहाँ।

तो हथेली के नीचे ठुड्ढ़ी रखकर हरियाली को निहारती सुन्नैर की आँखों से अचानक एक गरमागरम आँसू निकला और छप से सुन्नर नायक की बाँह पर गिर पड़ा, जो उसकी बगल में आराम से सो रहा था। बाँह पर गीलेपन का अहसास हुआ तो उसने देखा कि बहिनियाँ की आँखें तो गीली हैं। अब बहिन के आँसू भला भाई कैसे बरदास्त करे। विह्वल होकर पूछ बैठा... क्या हुआ सुन्नैर बहिन, रोती काहे है... जवाब में सुन्नैर बोली - हरियाली देखकर रोना आ गया, भैया। कामरूप देश की यह हरियाली सही नहीं जाती।

पहले तो सुन्नर ने सोचा कि पूछें हरियाली देखकर भी कहीं रोया जाता है? मगर तुरत उसे अपनी बहिन का दुख समझ आ गया। हरियाली देखकर कोई खुश हो तो हो मगर उसके गाँव-टोला के लोग कैसे खुश हो सकते हैं? कितने बरस बीत गए उस बात के जब हरियाली ने न सिर्फ उसके गाँव बल्कि पूरे इलाके का साथ छोड़ दिया था। कोसी मैया ने ऐसी राह बदली कि उसके इलाके की धरती पर दूब तक उगना बंद हो गया। हर तरफ बालू ही बालू। ऐसे में दूसरे इलाके की हरियाली देखकर किसका हृदय नहीं कलपेगा?

मत रो बहिन। आँसू बरबाद मत कर। कामरूप कामाख्या में हमने-तुमने जो तीन साल गुजारे हैं उसका कुछ तो सुफल निकलेगा। घर पहुँचते ही कोई न कोई इंतजाम करेंगे जिससे अपने परानपुर गाँव की धरती फिर से हरिया जाए। फिर कभी कोई कंठ, कोई खेत पानी के लिए नहीं तरसे। घर तो पहुँच बहिन कामाख्या मैया कोई न कोई रास्ता जरूर निकालेगी।

सुन्नर की बात सुनकर सुन्नैर के मन में थोड़ा बल आया। वह मुस्कुराई। आँसू से नहाये गीले गालों पर गुलाबी रंग छाया। गाड़ीबानों ने भी उत्साह में चाबुक लहराया और इससे पहले कि चाबुक बैलों की पीठ पर गिरता बैल सरपट भाग चले। जल्दी परानपुर पहुँचो, अब सूखी धरती की प्यास बुझने में देर नहीं।

थोड़ा दम धर कर सुरपति बोले - कहानी बहुत पुरानी नहीं, जितनी लगती है। लगभग चार एक सौ साल पुरानी होगी। यह वही समय था जब ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारी सूरत बंदरगाह पर उतरे होंगे और उनका अफसर बादशाह जहाँगीर के दरबार में सलामी देने पहुँचा होगा। तभी एक रात की बात है, कोसी मैया जो उस वक्त भारत-नेपाल की सीमा को छूकर बहती थी, ने अचानक अपनी राह बदल ली। दरअसल मैया की गोद में इतना मिट्टी-कंकड़ जमा हो गया था कि उसकी अपनी राह ही बंद हो गई। फिर कोसी मैया ने नई राह चुनी, वह पूर्णिया जिले के बीच से होकर बहने लगी। मैया को तो नई राह मिल गई मगर उसके आधे बच्चे अनाथ हो गए। नदी के पूरब की जमीन को जैसे लकवा मार गया। पूरी जमीन पानी के वियोग में सूखकर बंजर हो गई। हर तरफ बालू ही बालू, रातोंरात इस इलाके के लोग बरबाद हो गए। समझ रही हो न दोनों सुन्नैर?

इतना कहकर जब सुरपति ने दोनों की तरफ देखा तो दोनों गुमेगुम चुपेचुप। कोई जवाब नहीं, न हाँ-न ना। कहीं कोसी मैया के खोपा (जूड़ा) में तो उलझ नहीं गई सुन्नैर नैका की कहानी? तभी विश्वंभर की आवाज सुनी तो जान में जान आई।

अरे सिल्ट समझती हो? गाद? ज्योग्राफी में पढ़ा होगा? नदी की राह में जब बहुत सिल्ट जमा हो जाता है तो मजबूरन वह राह बदल लेती है। पर ऐसा बहुत बरसों में होता है, अधिकांश नदियाँ अपने पूरे जीवन में मुश्किल से तीन या चार बार अपनी राह बदलती है। मगर कोसी की बात जुदा है। 2008 में जो भीषण बाढ़ आई थी वह इसके राह बदलने के कारण ही। अब तक इसने कितनी बार राह बदली है इसका कोई हिसाब नहीं। 1732 से लेकर अब तक के दर्ज इतिहास के मुताबिक वह 14-15 बार राह बदल चुकी है और पूरब से पश्चिम की ओर इसका फैलाव 120 किमी के दायरे में हो चुका है। अगर नक्शे पर इस फैलाव को देखोगी तो यह किसी औरत के जूड़े की तरह लगेगा। इसी को अपने इलाके के लोग कोसी मैया का खोपा भी कहते हैं।

अब तुम्हारे मन में सवाल उठता होगा कि ऐसा क्यों है? कोसी नदी के इस खास बर्ताव की वजह क्या है? वजह इस नदी के उद्गम में छुपा हुआ है। इसके उद्गम से पहले नेपाल और तिब्बत की सात बड़ी नदियाँ इसमें आकर मिलती है, इसलिए इसे सप्तकोसी भी पुकारा जाता है। ये सातों नदियाँ हिमालय की ऊँची-ऊँची चोटियों से बहकर यहाँ पहुँचती है। इनमें से एक एवरेस्ट तो दूसरी कंचनजंघा से निकली हैं। इतने ऊँचे शिखरों से होकर बहने के कारण ये नदियाँ अपने साथ भारी मात्रा में गाद लेकर चलती हैं और मूल कोसी नदी में उसे विसर्जित कर देती हैं। गाद की अधिक मात्रा के कारण ही कोसी हर बीस-पच्चीस साल में रास्ता बदहती रही है। इससे पूरे इलाके में भारी तबाही फैलती। आजादी के बाद पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का ध्यान इस समस्या की ओर दिलाया गया। उन्होंने इसके निदान के लिए भारत-नेपाल सीमा पर सुपौल जिले के भीम नगर नामक स्थान पर बराज का निर्माण करा दिया, जो कोसी की गाद को रोक ले और उत्तर पूर्वी बिहार को तबाही से बचाया जा सके। मगर बराज का समाधान कितना सार्थक हुआ यह 2008 में दुनिया देख चुकी है। सुन्नैर नैका की कहानी समझने के लिए मेरे ख्याल से इतनी जानकारी पर्याप्त है। आगे की कहानी शुरू कीजिए काकाजी।

तो उस जमाने में कोसी मैया ने जो राह बदली, पूर्णिया जिले की आधी जमीन कठुआ कर रह गई। खेती-पथारी तो सब चौपट हुई ही माल-जाल (पशुधन) भी पानी के बिना पटपटाकर मरने लगे। एक तरह से अकाल जैसी हालत हो गई। बरसात के मौसम में जो दो बूँद पानी गिरता उससे धरती मैया के होठ भी नहीं भीज पाते। ऐसे में परानपुर की जनता हाय-हाय कर अपने नायक के पास रोज फरियाद करने पहुँचने लगी। वहाँ का नायक कमल बड़ा ही ज्ञानी और दयालु था। प्रजा का दुख तो वह समझ ही रहा था पर करे तो क्या करे? उसने अपना बखार (अनाज का भंडार) खुलवा ही दिया था कि कोई गरीब-गुरबा भूखे न मरे। मगर इससे कितने दिन चलने वाला था? धरती और इनसान दोनों प्यास के मारे कितने दिन बचने वाले थे?

एक दिन नायक को उसके एक दरबारी ने बताया कि कामरूप कामाख्या का एक पहुँचा हुआ तांत्रिक इन दिनों अररिया बजार से पूरब की परती पर धूनी जमाए बैठा है, वहाँ के तांत्रिक बड़े सिद्ध होते हैं। कहिए तो एक दिन आमंत्रित कर लिया जाए।

वैसे तो कमल नायक नई सोच का आदमी था, तंत्र-मंत्र पर कम ही भरोसा करता था। मगर इस समस्या ने उसके आत्मविश्वास को काफी कमजोर कर दिया था। हर तरफ से प्रयास करने के बाद भी कोई समाधान नहीं निकलने के कारण वह किसी भी उपाय को तुरंत मान लेता था। उसने इस सलाह पर भी सहमति दे दी।

कमल नायक के आमंत्रण पर तांत्रिक बाबा परानपुर पहुँचे। पहले उन्होंने दिन भर पूरे गाँव का चक्कर लगाया, फिर संध्या बेला में कमल नायक की हवेली के प्रांगण में गाँव वालों की सभा बैठी। सभा शुरू हुई तो कमल नायक ने अपनी समस्या बाबा को बताई। इस पर बाबा मुस्कुराते हुए बोले - अगर मैं आपकी जगह होता न नायक जी तो कभी इस समस्या का समाधान न कराता। कोसी के पलटने से गाँव जो नुकसान हुआ हो मगर यहाँ की धरती बड़ी सिद्ध हो गई है। इसको हम लोग अपनी भाषा में कछुआ पीठा जमीन कहते हैं। तंत्र साधना के लिए इससे बेहतर दूसरी जमीन हो ही नहीं सकती। मगर मैं आपकी समस्या समझता हूँ। आप लोग तांत्रिक नहीं किसान हैं और किसान का काम पानी के बगैर नहीं चल सकता। चलिए, मैं आप लोगों की समस्या का समाधान करने की कोशिश करूँगा। मगर इसके बदले मुझे क्या मिलेगा, मेरी कामाख्या मैया को क्या मिलेगा?

बाबा की बातों से उत्साहित कमल नायक के मुँह से निकल पड़ा - जो कहेंगे, वही मिलेगा बाबा।

सोच लीजिए नायक जी।

अगर बस में हुआ तो जरूर मिलेगा बाबा।

तो सुन लीजिए, मुझे नहीं, मेरी मैया को दो नौजवान चाहिए। एक स्त्री, एक पुरुष। जो बनेंगे तंत्र साधना के पुजारी और वही परानपुर की धरती का दुख दूर करेंगे। हैं तैयार?

बाबा ने फिर पूछा - हैं तैयार?

इस पर कमल नायक ने पूछा - उनको करना क्या होगा बाबा?

कामाख्या मैया के चरणों में तीन साल तक तंत्र साधना।

ठीक है।

कमल नायक के मुँह से जैसे यह जवाब निकला बाबा उस पर सवार हो गए।

किसको भेजिएगा? अपनी प्रजा में से किसी को? नहीं चाहिए माँ को। अपना बेटा और बेटी दे दीजिए। मैं भरोसा दिलाता हूँ, जैसा ले जा रहा हूँ उसी हालत में वापस करूँगा।

बाबा की बात सुनकर सभा को साँप सूँघ गया। खिड़की से झाँककर सुन रही कमल नायक की घरवाली को तो खड़े-खड़े दाँती आने लगी। कमल नायक अवाक, कहें तो क्या कहें? बहुत हिम्मत करके बाबा से एक हफ्ते का समय माँगा। बाबा हफ्ते भर बाद आने की बात कहकर चले गए।

फिर सात दिन तक परानपुर में हर चौक चौराहे पर खूब बहस हुई। कोई कहता कि बाबा की बात नहीं मानना चाहिए, शक्ल से ही धूर्त लगता है। कोई मान लेने की सलाह देता और उनके ललाट की महिमा गाता। कुछ लोग इस डर से भी बात मान लेने की सलाह दे रहे थे कि कहीं बाबा नाराज होकर श्राप न दे दे।

परानपुर हवेली का तो अजब हाल था। हर कोई चुप्पी लगा बैठा था। सिर्फ सुन्नर अपने पिता से बार-बार कहता - जाने दीजिए, हम लोगों को कुछ नहीं होगा। आपको बाबा पर भरोसा नहीं है तो क्या, मुझ पर तो भरोसा है। मेरे रहते किसी का कुछ नहीं बिगड़ेगा, न मेरा और न सुन्नैर का। और मुझे तो बाबा पर पूरा भरोसा है। देखते-देखते तीन साल बीत जाएँगे और लौटकर हम लोग गाँव को फिर से हरा-भरा बना देंगे। सोचिए बाबूजी, यह सब हो गया तो कितना अच्छा लगेगा।

कहते हैं न जब बुरा होने वाला होता है तो कुमति घेर लेती है और अच्छा होने वाला होता है तो भाग्य अँगुली पकड़ कर सारे काम करवाता है। सो सातवें दिन जब बाबा आए तो कमल नायक ने अपने दोनों जिगर के टुकड़ों को उन्हें सौंप दिया। तीन साल तक बाबा ने दोनों को खूब तंत्र-मंत्र सिखाया। एक से एक जादू। कैसे रूप बदलना है, कैसे किसी का मन हर लेना है। साथ-साथ यह भी कि तंत्र का उपयोग समाज के हित में करें, व्यक्तिगत हित में नहीं। दोनों वहीं से पढ़ाई पूरी कर बैलगाड़ी पर अपने गाँव लौट रहे थे।

परानपुर हवेली में उत्सव

उस दिन परानपुर में सुबह से ही चहल-पहल थी। महिलाओं ने अपने-अपने घरवालों को जलपान कराकर विदा किया और पतालिया कुएँ की ओर चल पड़ीं। गाँव का यही कुआँ था जिसका पानी नहीं सूखा था। कुएँ की इसी खूबी के कारण लोगों ने इसका नाम ही पतालिया कुआँ रख दिया था। यानी जिसकी गहराई पाताल को छूती हो। कोसी मैया के पलटने के बाद यह कुआँ सिर्फ परानपुर ही नहीं बल्कि आसपास के कई गाँवों को पानी पिला रहा था। ऐसे में पूरे दिन इस कुएँ पर औरतों का ताँता लगा रहता था। कोई और दिन होता तो यहाँ गाली-गलौज, झगड़ा-झंझ़ट, उकटा-पैंची से लेकर झोटा-झोटी का नजारा रहता, मगर आज दैव योग से यहाँ का माहौल खुशगवार था। अपने-अपने घड़े जगत पर रखकर औरतें गप्प लड़ा रहीं थीं। हवेली की खास दाई रधिया की माँ अपनी बेटी के मुँह से सुनी हवेली की कथा सबको सुना रही थीं। जब से सुन्नर-सुन्नैर कामरूप से लौटे थे, हवेली की चर्चा से बढ़िया और क्या गप्प हो सकती थी। ऐसे में रधिया माय का भाव तो बढ़ना ही था।

कल सुबह-सुबह ही उसने सबसे अच्छी खबर सुना दी थी कि आज हवेली में पूजा होने वाली है और इस मौके पर लछमन गवैया कोसी माय वाला गान सुनाने आ रहा है। अच्छा-खासा मजमा लगने वाला है। वैसे तो कल दोपहर हवेली की तरफ से ढोलाही भी हुई, मगर ढोलाही वाला तो बस काम की बात बताता है। अंदर की बात तो रधिया ही जानती है और रधिया को फुरसत कहाँ सो उसकी माय जो बता देती है उसी से पूरा गाँव काम चलाता है।

आज रधिया की माँ सुन्नर और सुन्नैर की कथा सुना रही थी। तुम लोग तो देखी नहीं होगे, वैसे हम भी अब तक कहाँ देख पाए हैं। मगर जैसा रधिया बताती है, अब जाके लगता है, जैसा नाम-वैसा रूप। कामरूप कामाख्या में तीन साल रहकर दोनों सचमुच रूपवान हो गए हैं। देख के लगता है जैसे भगवान-भगवती हों। कहोगी, कामाख्या मंदिर में तो टोना चलता है, वहीं से रूप भी गढ़वा लिए होंगे। मगर कमल नायक और हवेली वाली मालकिन क्या कम सुंदर थी जवानी में। तुम तो देखी हो न संतोषी मैया?

हाँ दाय। बियाह करके दोनों जब आए थे तो लगता था इंद्र-इंद्राणी हों। नायक जी की माय तो दिन भर दोनों की कनपटी में काजल लगाती फिरती थी कि कहीं नजर-गुजर न लग जाए। वैसे भी हवेली में किसका नाक-नक्शा खराब है। जब दोनों कामरूप गए थे तो क्या कम सुंदर थे, हाँ थोड़े दुबले-पतले थे। वहाँ देह भरा गया होगा तो दमक बढ़ गई होगी।

एकदम ठीक बात।

रधिया माय ने फिर से बातचीत का सूत्र अपने हाथ में ले लिया।

रधिया बताती है, सुन्नर तो किंवाड़ की चौखट जितना लंबा हो गया है। देह भरा गया है, बाँह पर मछलियाँ उग गई हैं। मोंछ कड़-कड़, चलता है तो धरती काँपती है। परसों-तरसों कदम पहलवान से भिड़ गया। बताओ जिस पहलवान का पिछले साल मेला में जोड़ नहीं मिल रहा था, उसको ऐसा पटका कि होश गुम... तभी रूपलाल की बहू ने बीच में ही बात काट दी - ठीके बोल रहीं हैं काकी। कल के छोकरा को इतना ताकत हो गया कि कदम पहलवान को पटक दिया। हम को भी समझ आता है, हवेली का लड़का है सोचकर कदम बाबू जानबूझ कर चित्त हो गए होंगे।

इस पर रामजी माय बोली - ई भी हो सकता है, काहे कि कदम पहलवान का गिरस्ती गमगाया हुआ है। हवेली में सिपाही की नौकरी चाह रहा है। रूपलाल का दोस्ते है कनियैन, तुमको तो जड़ बात पता होगा।

यह सब सुनकर रधिया माय का मुख मलिन हो गया।

भीड़ में सबसे छोटी कमली को यह सब रुच नहीं रहा था। वह चाह रही थी जल्दी से सुन्नैर की चर्चा चले। सुन्नैर के साथ वह बचपन में खेला करती थी। अब तो भेंट भी नहीं होती। फाटक के पीछे बंद रहती है हवेली की राजकुमारी। वह पूछ बैठ - अच्छा सुन्नैर कैसी लगती है?

रधिया माय फिर शुरू हो गई - सुन्नैर तो सुन्नैर है। जैसी पहले थी, वैसी ही। नौकर-चाकर को भी मौसी-चाची-दीदी कहने वाली। जैसा रूप, वैसा नाम और वैसा ही गुण भी। और रूप की चर्चा क्या किया जाए, रूप तो लहलह करता है। गे दैया, नजर न लग जाए, भोग-भाग देना हवेली वाली बेटी को। कहने वाले तो कहते हैं ऐसी रूपमती आस-पास के बारह जोजन (योजन) में नहीं। एक पर एक रिश्ता आ रहा है, उसके रूप और गुण की चर्चा सुनकर। मगर सुन्नैर किसी में हाँ नहीं बोल रही। कहती है, जब तक परानपुर का कंठ सूखा है बियाह नहीं करेगी। इस साल सत्रह की हो गई है। माय-बाप परेशान रहते हैं, मगर बेटी कहती है - एक साल दम धरो, बुढ़ा नहीं जाऊँगी। इ बात तो जरूर है, जिसके घर जाएगी उसका भाग बदल देगी।

इतना कहकर रधिया माय चुप हो गई। इनारे को पास बैठी दूसरी औरतें भी चुप होकर सोचने लगी, जैसे सुन्नैर उन्हीं की बेटी हो। थोड़ी देर में रूपलाल की घरवाली ने टोका, कुछ इंतजाम हो भी रहा है कि खाली हवाबाजी है।

किस चीज का?

वही। पानी की समस्या का। जिसके लिए दोनों सुकुमार-सुकुमारी तीन साल कामरूप-कामाख्या में तपस्या करने गए थे।

हाँ, सुन तो रहे हैं, पूजा-पाठ और कोसी गान के बाद आज बैठक होगी, उसी में विचार होगा।

और पूजा-पाठ की क्या व्यवस्था है? भोज-भात है कि सूखा-सूखी ही।

अरे वाह, भोज की बड़ी चिंता है?

फिर से उत्साहित होकर रधिया माय बोल पड़ी। जबरजस्त (जबरदस्त) इंतजाम है। बैठक के बाद खान-पान होगा। खीर-पुड़ी, पाँच तरह की मिठाई। वह भी सबजना (सपरिवार)। सब नौकर-चाकर मिलकर हवेली को जगमगा दिए हैं। दीया-बाती का तो ऐसा इंतजाम हो रहा है, जैसा दीवाली पर होता है। पास-पड़ोस के सभी मुखिया को नोत पड़ा है। सुबह से चुल्हा जोड़ दिया गया है, देगची ढनर-मनर हो रहा है। अभी थोड़ी देर में नोत पड़ जाएगा, निश्चिंत रहो।

तब तो मजा आएगा। एक साथ कई औरतों के मुँह से निकल पड़ा।

मजा आने की उम्मीद ने न सिर्फ इन औरतों के बल्कि पूरे गाँव के मन खलबली मचा दी थी। हलवाहों के हल के फाल बार-बार धरती में अटक जा रहे थे, क्योंकि भोज का ख्याल आते ही वे मूँठ पर दवाब बनाना भूल जाते थे। लुहारों की भट्ठी, कुम्हारों के चाक, बुनकरों का करघा से लेकर गुरुजी की छड़ी तक धोखा देने लगी थी। जहाँ तक बच्चों का सवाल था वे तो चाबी भरे खिलौनों की तरह कक्षा में बैठे थे, छुट्टी मिली नहीं कि नाचना शुरू कर देंगे। जैसे ही दिन ढला, सजे सँवरे स्त्री-पुरुषों और उछलते-कूदते बच्चों का रेला हवेली की ओर चल पड़ा।

हवेली पहुँचकर लोगों ने रोशनी से नहाए उस अनुपम नजारे को देखा तो उनकी आँखें फटी रह गईं। हर कंगूरे पर दीपों की माला इस तरह सजाई गई थी कि लगता था काले आसमान में सुनहरे रंग से हवेली का चित्र बनाया गया हो। द्वार पर इतनी रोशनी जगमगा रही थी कि कीड़ों तक के लिए छुपकर बैठना मुश्किल था। अतिथि कक्ष में आसपास के गाँवों के मुखिया और नायक पगड़ी बाँधे बैठे थे। बाहर ढोल और मृदंग वालों का झुंड अनवरत ताल से ताल मिला रहा था। आठ-दस सिपाहियों के जिम्मे लोगों की भीड़ को सँभालने और उन्हें आँगन ले जाकर नियत स्थान पर बिठाने का काम था।

आँगन में पूजा की सारी तैयारियाँ हो चुकी थी। पिठार (पिसे चावल) से बने खूबसूरत अर्पण के बीच भगवान, पूजन सामग्री और प्रसाद करीने से सजाकर रखे गए थे। एक छोर पर पंडित जी बैठे थे, दूसरे पर सुन्नर नायक के बैठने का आसन लगा था। उन्हीं का इंतजार था। स्नान करने के लिए तालाब की ओर गए थे। तब तक सुन्नर की माँ और सुन्नैर पंडित जी से बातचीत कर निश्चिंत हो ले रही थी कि कहीं कोई कमी तो नहीं रह गई।

इस बीच जो औरतें देर से पहुँची उन्हें पहले से पहुँचकर बैठी औरतों ने बताया कि यह जो अर्पण और सजावट देख रही हो, सब कुछ सुन्नैर ने अपने हाथों से किया है। देखती हो कितना सुंदर अर्पण बना है और कितने सलीके से पूजा का सामान और प्रसाद रखा है। हवेली की किसी नौकरानी में है ऐसा हुनर? पहले भी तो यहाँ पूजा देखने आती रही हो, कभी इतना सुंदर दिखा था? देर से पहुँचने वाली औरतों ने पूछा - सचमुच? जवाब में पहले पहुँची औरतों ने बताया - अरे, हमने अपनी आँखों से देखा है।

तभी पीतांबरी पहने सुन्नर नायक आँगन में घुसे। गोरा बदन, गठीला शरीर, पीछे कंधे तक लटक रहे भीगे-काले-घुँघराले बाल, बदन पर जनेऊ, पाँव में खड़ाऊँ। सुन्नर नायक की सुंदरता देख गाँव की जनता निहाल हो गई। तभी एक कोने से दौड़ी-दौड़ी उनकी दादी आई और पोते के कान की जड़ में काजल लगा दिया, कहीं इस रूप की ज्वाला को किसी की नजर न लग जाए। मगर यह क्या? सुन्नर ने अपनी दादी की ओर नाराजगी भरे भाव से देखा और पीतांबरी के खूँट से काजल को पोछ कर मिटा दिया। बोला - मैंने कामरूप-कामाख्या में तीन साल तक समय नहीं बरबाद किया है। यहाँ कोई ऐसा नहीं जो मेरा बाल भी बाँका कर सके। काजल क्यों लगाती हो? किसकी नजर में इतना तेज है कि सुन्नर को झुलसा सके? है कोई?

सुन्नर के इस व्यवहार को देख कर उसकी माँ दौड़कर आई - अरे तुम तो बेवजह उत्तेजित हो रहे हो। तुम्हारी दादी ने किसी से रक्षा के लिए थोड़े ही काजल लगाया था, यह तो सिर्फ उनका स्नेह था।

जो भी हो, मगर दादी के साथ-साथ यहाँ सबके लिए यह जान लेना जरूरी है कि सुन्नर तंत्र-मंत्र में इतना शक्तिशाली हो चुका है कि उसे काजल जैसे टोटकों की जरूरत नहीं। यह बात परानपुर की जनता भी समझ ले, मुझे उनका दुख दूर करना है।

इतना कहकर सुन्नर पूजा के आसन पर बैठ गया और बोला - पंडित जी शुरू कीजिए, मुहूर्त बीत रहा है।

सुन्नर के इस व्यवहार से पूरे आँगन में सन्नाटा छा गया। आहत दादी अपने कमरे में जाकर बैठ गई। तभी कमल नायक अपने मेहमानों के साथ आँगन में आए और यथास्थान बैठ गए। पंडित जी ने आचमन कराकर पूजा शुरू करा दी।

कोसी मइया का सराप

पूजा विसर्जित हुआ तो पूरे आँगन में चरणामृत और प्रसाद बाँटने का काम भी सुन्नैर ने ही सँभाला। फिर लोगों ने फटाफट पूजन सामग्री आँगन से हटाया और लछमन गवैया के लाट ने मोरचा सँभाल लिया। साजिंदे साज कसने और ताल मिलाने लगे। नायक लछमन ने आलाप लेने की तैयारी शुरू कर दी। उस जमाने में लछमन गवैया के लाट का वैसा ही नाम था, जैसा आजकल तुम्हारे राहत अली और कैलाश खेर वगैरह का है। टीवी-रेडियो का जमाना तो था नहीं कि बटन दबाया और संगीत शुरू। ऐसे में गवैया और नटुआ लोगों का जबरदस्त क्रेज था। वैसे तो कहते हैं कोसी कछार की गाय-बकरी भी सुर में ही बोलती है, मगर जो रस लछमन गवैया में था उसका परतर नहीं था। जिस गाँव में लछमना पहुँचता दस कोस के रसिक बिन बुलाए हाजिर हो जाते। भीड़-भड़क्का और हल्ला-गुल्ला से बचने के लिए आयोजक पूरी कोशिश करते कि खबर न फैले, चुप-चाप बात तय करें और जब लछमना पहुँच जाए तो ढोलहा दिलवा दें। मगर फूल खिलने के बाद महक छुपाने से कहीं छुपता है। दस दिन पहले से फुस-फुस शुरू। इनार-बथान-दुआर-मचान जहाँ देखो वही कहानी। फिर किसी दिन दूर-दराज के गाँव का कोर्इ आदमी आयोजक को ही बताने लगता, आपको पता है आपका गाँव में लछमना गवैया आने वाला है? आयोजक बनते हुए पूछता, कौन लछमना? फिर सामने वाला शुरू हो जाता, गजब हुनर दिया है उस गवैया को भगवान ने। बिरहा गाता है तो महफिल सिसकारी पारने लगती है और मदमाता है तो लोग पगला जाते हैं, उठ-उठकर नाचने लगते हैं। आजकल एकठो नया गीत बनाया है कोसी माय का सराप। एक बार सुन लीजिएगा तो दूसरा गाना सुनने का होस नहीं रहेगा। इस पर आयोजक उस ज्ञानी श्रोता से पूछता कि आप सुने हैं कोसी मइया का सराप?

नहीं, अब तक मौका नहीं मिला।

तो आ जाइएगा मेरे गाँव, वहाँ लछमन गवैया यही गाना गाएगा।

परानपुर हवेली में इसी तरह भीड़ जमा हुई थी। मन में गुरु का ध्यान धरकर लछमन ने आलाप लिया और गीत का पहला टुकड़ा धीमी आवाज में उसके कंठ से बाहर निकला।

          रेशमी पटोर मइया फाइर के फेकलथिन
          सोना के जेवरवा गाँव में बाँटलखिन
          आरे रुपवा के सोलह मन चूर हे।
          रगैड़ केलखिन मइया धूर हे।

माय-बाप, कका-काकी, भाय-बहिन, भौजी-मौसी, दीदी-दादी सबको लछमन गवैया और साथी मंडली का परनाम। सभा संगत में बिरजमान सब गुणी लोगों से आग्रह है कि यह कथा कोसी मइया के सराप की है; बड़ी दुख भरी कहानी है। जरा ध्यान धरिएगा; हँसी-ठट्ठा मत कीजिएगा; क्योंकि... तर... र... रर... रंग। वाद्य यंत्रों की तान ने उसकी बात का समर्थन किया।

क्योंकि आप लोग तो गयानी हैं; जानते ही हैं कोसी मइया हम लोगों से रूस गर्इ है। हँसी ठट्ठा करेंगे तो कोप बढे़गा, फिर क्या होगा यह कौन नहीं जानता है। तो गुनीजन; आप लोग इस गीत को ध्यान से सुनिएगा और हृदय में श्रद्धा हो तो मइया से अपनी गलती का छिमा भी माँग लीजिएगा।

          रेशम... पटोर... मइया

एक बात और कहना है, यह गीत जो आप लोग की सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं; यह इस नाचीज लछमन गवैया का रचा हुआ नहीं है। यह कथा हमने कोसी कछार पर तप करने वाले संतों के श्रीमुख से सुना हैं। उसी कथा को लय और ताल में गूँथ कर माला तैयार किए हैं। इसलिए यह मत सोचिएगा कि लछमन गवैया झूठ-सच गढ़कर सुनाता है। तो शुरू करते हैं...

          रेशम पटोर मइया फाइर के फेकलथिन

तो सुनिए, कोसी मइया ने अपना रेशम का पटोर फाड़कर फेंक दिया और जितना गहना-जेवर था पूरे गाँव में जहाँ-तहाँ बाँट दिया। आप लोग तो जानते ही हैं, कोसी मइया का नैहर पच्छिम तरफ तिरहुतिया राज में है और सासुर पूरब मुलुक में। मइया की सास बड़ी झगड़ाही थी; जिला-जवार, टोला-मोहल्ला में नामी और दोनों ननैद तो उससे भी बीस, एक नंबर की लहरी। नाम भी कैसा था, गुनमंती-जोगमंती। समझिए कि तीनों मिल जाती और मइया को बड़ा कष्ट देती। सुर मिलाकर जब गाली देने लगती तो लगता जैसे कनसार (भूजा भूजने की जगह) में भुट्टा का दाना पटपटा रहा हो। कोखजरौनी... पुतखौकी... भतारखौकी... बाँझ! सुनते-सुनते मइया का कान टनकने लगता।

एक दिन ऐसा वाकया हुआ कि क्या जाने कौन बात पर बमककर बड़की ननद गुणवंती ने मइया को बाप लगाकर गाली दे दी; छोटकी ने भी सोचा अच्छा मौका मिला है उसने भार्इ से संबंध जोड़ कर इलजाम लगा दिया। सासू माता ने सब पर टीप लगा दिया कि इसकी माय कौन सती-सावित्री थी... इतनी बात पर तो जैसे बारूद में आग धर लिया। मइया का स्वभाव बरदास्त करने वाला कहाँ था, क्रोध से थर-थर काँपने लगी। यह जो आपको सुना रहे हैं, उसी समय का बरनन है...

          आरे रूपवा के सोलह मन चूर हे...
          रगैड़ केलखिन मइया आकर धूर हे...

झूठ थोड़े कहते हैं, जाके देखिए अपने-अपने खेत में रूपा का सोलन मन चूर आज भी कैसे चकमका रहा है।

खैर, सास-ननद के उपराग (आरोप) पर मइया ने तय कर लिया, अब इन कुपात्रों की संगत में नहीं रहना है। नैहर में नून रोटी का संकट नहीं है। रोती-पीटती, चीखती-चिल्लाती, हहाती-फुफनाती भागी पच्छिम दिस, अपने नैहर तिरहुत राज। सास और ननदों को पंचपहरिया मुर्छाबान मारकर पहले ही सुला दिया था। अचानक रास्ते में याद आया -ज्जा! गौर में तो माय के नाम पर दीप लेसा (जलाया) ही नहीं।

तो माताओं और भौजियों को मालूम है गौर कहाँ है! मालदह जिला में जहाँ हर साल लाट बाँध कर मेला देखने जाती हैं और अपनी-अपनी माय के नाम से दीप लेसती हैं। तो कोसी मइया को भी वहाँ साँझ देना था; यह सोचकर लौटी और गौर घर में दीया-बाती कर दिया। मगर हाय रे नसीबा, मइया ने जैसे ही दीप लेसा, सासू महरानी की मूर्छा टूट गर्इ। क्योंकि गौर घर में साँझ देने से बाप और सांय (पति) दोनों कुल इजोर (ज्योति) होता है।

होस हुआ तो सासू ने गुन मारकर दोनों बेटियों को जगाया - उठ गे गुनमंती, जोगमंती दोनों बहिन, कोसका कनिया तो नैहर भाग रही है।

छोटकी बोली - अभी सुतने दे माय। अभी तो बीस कोस भी नहीं गई होगी, पचास कोस तक तो झोंटा खींचकर ले आएँगे। बड़की बोली - सौ कोस तक तो मेरा बेड़ीबान-कड़ी छान गुन चलता है। भागने दो, कहाँ तक भागेगी।

माय हँसी - आजे पता चल जाएगा तुम दोनों का फुटफुटिया गुन मंतर का तागत! कनियैन (पतोहू) गौर घर में दीप लेस आर्इ है; अब तुम दोनों का सब गुन-मंतर सटकदम नै हो गया तो कहना।

आयं! क्या-आ-आ-आ! दोनों बहिन हड़बड़ा कर उठ गर्इ। अब सुनिए कैसा भूचाल हुआ! तीनों माय-बेटी अपने-अपने गुन की डिबिया लेकर निकल पड़ी। छोटकी ने डिबिया का ढक्कन खोला तो भरल दुपहरिया में आठ-आठ अमबस्या का अन्हार हो गया। बड़की ने भी अँगूठी के नगीने में बंद आँधी-पानी को अजाद कर दिया।

उधर कोसी मइया जान-परान छोड़कर भाग रही थी। रस्ता भर का नदी, धार, नाला-चाप को बालू से पोतकर पार करती और फिर पलटकर बबूर, झरबेर, खैर, साहुड़, पनियार, तिनकटिया जैसे काँटेदार कुकाठों को उखाड़कर गिरा देती और घाट-बाट बंद कर देती।

          थर-थर काँपे कोसी मइया, रोये जी आकास
          घड़ी-घड़ी पर मुरछा लागे, बेर-बेर पियास
          घाट न सूझे, बाट न सूझे, सूझे न अप्पन हाथ।

भागते-भागते मइया मूर्छा खाकर गिर जाती, फिर उठती और भागने लगती। दोनों ननदों की डिबिया में जितने गुन थे सब बेकार हो गए तब मइया की सास खिलखिला-खिलखिलाकर हँसने लगी - इसी गुन-मंतर पर तुम दोनों को इतना गुमान था। अब देखो, सात पुस्त के दुश्मन पर जो गुन छोड़ना मना है, उसका खेला - इ... निकला... आ... आ... कुल्हड़िया आँधी, पहड़िया पानी।

कुल्हडिया आँधी में एक हजार कुल्हाड़ी वाले दानव रहते हैं और पहड़िया पानी तो ऐसा गजब होता है कि पहाड़ को भी डुबाकर बिला दे। अब देखिए कि कुल्हड़िया आँधी और पहड़िया पानी ने कैसा परलय मचाया - ह... ह... ह... र... र... र... र...! गुडगुडुम... आँ... आँ... सि.. र्इ... र्इ... र्इ... आ... गर... गर... गुडम! गवैया के चेले-चपाटियों ने मुँह से आवाज निकालकर ऐसा समा बाँधा कि लगा सचुमच प्रलय आ गया है।

गाँव-घर, गाछ-बिरिच्छ, अँगना-दुआर कतरती कुल्हड़िया आँधी जब गर्जन करने लगी तो पतालपुरी में बराह भगवान भी थरथरा गए। पहड़िया पानी सात समुंदर का पानी लेकर एकदम जलामय करता दौड़ गया... तब कोसी मइया भी हाँफने लगी, हाथ भर जीभ बाहर निकालकर। अंदाज लगाकर देखा नैहर ज्यादा दूर नहीं है। बेसी से बेसी पचास कोस। हिम्मत बँधा कि सौ कोस तक तो नैहर के सगे-संबंधी, नाते-रिस्ते वाले ही रहते हैं। मइया ने अपने बाबा और बंस का नाम लेकर ममेरे-फुफेरे, मौसेरे भाइयों को सोर पारा - रे भैया, बहिन के बचैहियैं! फिर एक-एक भौजी से अनुराग किया - भौजी यै भौजी, बेटा खेलायब, साडी पखारब ये भौजी, एक बेर भायजी के भेज दियौ यै भौजी।

कुल्हड़िया आँधी-पहडिया पानी नजदीक आ गया। बहुत पास। अब? अब क्या होगा, कौन बचाएगा? कोसका माय की पुकार सुनकर एक मुनिया भी न बोली, एक सिक्की भी न डोली। कहीं से कोर्इ जवाब नहीं। तब माय बुक्का फाड़ कर रोने लगी - अरे कोर्इ तो आओ रे! कोर्इ तो एक दीया जला दो रे! कोर्इ एक दीया जला दे, एक पल के लिए ही; फिर कौन कोसी माय से जीत सकता है? कुल्हड़िया आँधी मइया का आँचर पकड़ने ही वाला था कि एक दीप टिमटिमाने लगा। कोसी मइया की सौतेली सबसे छोटी बहिन दुलारीदाय, बरदिया घाट पर आँचल में दीप लेकर खड़ी हो गर्इ। बस! मइया को सहारा मिल गया और उसने उलटकर अपना आखिरी गुन चला दिया। पतालपुरी में बराह भगवान डोले और धरती ऊपर हो गर्इ।

गुनमंती-जोगमंती दोनों बहिन अपने ही गुन में जलकर राख हो गर्इ... सासू महरानी भी झमझमाकर काली हो गर्इ है। उजाला हुआ। कोसी मइया दौड़कर दुलारीदाय से जा लिपटी फिर तो...

          दुनु गे बहिन रामा गला जोड़ बिलखै,
          अखियाँ से बरसे झर-झर लोर!

दोनों बहिन गले लगकर घंटों रोती रहीं। हिचकियाँ लेती हुर्इ दुलारीदाय बोली - गे बड़की बहिन पलैट के देखि, धरती के दुरदसा। मइया ने पीछे देखा - सचमुच गाँव का गाँव असमसान बन गया, हजारों-हजार आदमी के प्राण-पखेरू उड़ गए। जो बचा उनके पास न घर था और न खाने-पीने का इंतजाम। उनको तो वैसे भी भूख-प्यास से पटपटाकर मरना था। सिसकारी और क्रंदन से आसमान काँप रहा था।

मरें! सब मर जाएँ। हमर बाप के फेकल टुकड़ा पर पेट पोसै बला सगा-संबंधी मर जाए त फिकिर न छै। जे अपने बंस के अभागन बेटी के पुकार पर खिड़की नै खोललकै से मैरियै गेलै त कोन दुख। धरती के भार घटलै। मैर जाए जे बचल छै उहो मैर जाए।

धरती कहाँ बचलै? कहाँ बची है धरती, बहिन जो उसका बोझ हल्का होगा? इ तो धरती की लहास है। सफेद बालूचरों से ढँकी धरती की लहास!

हम लोग छोटकी बहिन को दुलार से दाय कहते हैं। वही दाय थी दुलारीदाय। शील-सुभाव इतना अच्छा कि उसकी बात को काटना मुश्किल। बोली - गे बहिन अभियो समय है। क्रोध त्यागो, दुनिया क्या बोलेगी?

कोसी मइया ने उलटकर देखा - सिकियो न डोले! कहीं हरियाली की एक डिडीर (लकीर) भी नहीं बची थी। देखकर मइया सिहर उठी। गुस्से में कितना बड़ा अनर्थ हो गया। बोली - नहीं, धरती नहीं मरेगी। जहाँ-जहाँ बैठकर वह रोर्इ-कलपी है, आँसुओं की उन धाराओं के आसपास धरती के प्राण सिमटे रहेंगे। हर साल पूसी पूर्णिमा के दिन इन धाराओं में स्नान करने वालों का सब पाप कट जाएगा। जुग बीतने के बाद एक-एक प्राणी पाप से मुक्त हो जाएगा। तब फिर सारे इलाके में हरियाली छाएगी।

लछमन गवैया से आगे कहा न जा सका, उसका गला रुँध गया। आँखों से आँसू टप-टप टपकने लगे। मइया जाने कब वह दिन आएगा? कब परानपुर का इलाका हरियाएगा? कब यहाँ के इनसानों के पाप कटेंगे? अँगना में बैठे लोगों की हालत भी वैसी ही थी।

औरतों के लाट से तो हिचक-हिचक कर रोने की आवाज आ रही थी। मर्द लोग इधर-उधर ताक कर इस प्रयास में जुटे थे कि अगर आँखों से आँसू निकल गए तो लोग क्या कहेंगे। इसी बीच सुन्नर नायक की आवाज गूँज उठी - चुप हो जाइए। रोना-धोना छोड़िए। बहुत जल्दी परानपुर की धरती फिर से हरी-भरी होगी। आपको तो याद होगा तांत्रिक बाबा मुझे और सुन्नरि बहिन को इसी शर्त पर कामरूप कामाख्या ले गए थे कि वहाँ से लौटकर हम दोनों इस समस्या का समाधान कर लेंगे।

हाँ सुन्नर बाबू! वह भी कोर्इ भूलने वाली बात है। उसी के भरोसे तो दिन काट रहे हैं। अब बता दीजिए बाबा ने क्या उपाय बताया है। एक बुजुर्ग ने कहा।

उपाय तो नहीं बताया मगर इतना जरूर कहा कि परानपुर पहुँचने के एक हफ्ते के अंदर समाधान मिल जाएगा और समाधान बताने वाला किसी दूसरे इलाके का आदमी होगा। सो आज सातवाँ दिन है और अब शाम भी हो चुकी है। अगर अब तक समाधान नहीं मिला तो इसका मतलब है, अभी ही समाधान मिलेगा। आप लोगों के बीच बैठा कोर्इ परदेसी ही समाधान बताएगा।

सुन्नर के इतना कहते ही सभा में बैठे परानपुरवासी अपने आसपास ताकने लगे कि उपाय बताने वाला परदेसी कहाँ छुपकर बैठा है। पड़ोसी गाँव से आए लोग खुद हैरत में थे, कि उन्हें कैसे इस समस्या का समाधान पता हो सकता था, वे तो खुद इस समस्या से पीड़ित हैं। काफी देर तक सभा में सन्नाटा छाया रहा, धीरे-धीरे खुसुर-पुसुर होने लगी कि कहीं सुन्नर-सुन्नरि को कामख्या ले जाने वाला तांत्रिक झूठा या ठग तो नहीं था। काफी देर बीतने के बाद नायक जी उठकर कुछ कहने ही वाले थे कि अचानक दरबान झटकता हुआ आँगन में घुसा - मालिक! एक यात्री परिवार दूर देश से आया है और रात भर दुआर पर ठहरना चाहता है।

नायक जी ने कहा, ठीक है ठहरा दो और उनके खाने-पीने व सोने की बढ़िया व्यवस्था कर देना।

इजाजत पाकर पहरेदार लौटा ही रहा था कि सुन्नर ने कहा - अच्छा परिवार के मुखिया को कुछ देर के लिए बुलवा लेना और कहना कि हम लोग उनसे कुछ बातें करना चाहते हैं।

पहरेदार के जाने के बाद सुन्नर ने आँगन में उपस्थित लोगों से कहा कि आप लोग कुछ पल और ठहर जाइए। लगता है कि यह परदेसी ही हमें अपनी इस समस्या का समाधान बताएगा।

पहाड़ों से आया परदेसी

सुन्नर का अनुमान सही था। आगंतुक मनिहारी गंगा घाट के उस पार के पहाड़ी इलाकों में एक कोयले की खदान में नौकरी करता था। उसका नाम रामचरित दास था। रामचरित दरभंगा जिले का रहने वाला था। उसके गाँव से होकर गुजरने वाली बागमती नदी में हर साल बाढ़ आती थी और हर बार चार-पाँच घर कटाव की चपेट में आ जाते थे और उन्हें उजड़कर दूसरी जगह बसना पड़ता था। आजिज आकर एक दिन उसने अपना घर-बार छोड़ दिया और पूरब दिशा की राह पकड़ ली। कोसी नदी के इलाके में बसने का मन बनाया तो यहाँ भी वही हालत थी। कहीं बाढ़ तो कहीं सुखाड़, लाचार होकर उसे गंगा पार करना पड़ा और राजमहल की पहाड़ियों में ठौर मिली। वहाँ हाल ही में बंगाल के व्यापारियों ने पाताल से कोयला निकालने का उद्मम शुरू किया था। मजदूर के रूप में तो उन्हें आसपास बसने वाले हटटे-कटटे दैत्याकार वनवासी बहुत ही सस्ते में मिल जाते थे, मगर मुंशी और काम की देखरेख करने वाले समझदार लोग नहीं मिल पाते। बंगाल की सोना उपजाने वाली भूमि का ऐशोआराम छोड़कर वनों के एकांत, दुष्कर और भयावह जीवन जीने के लिए लोग तैयार नहीं होते थे। ऐसे में रामचरित को बड़ी आसानी से एक खदान मालिक के यहाँ मुंशी का काम मिल गया। परिवार के रहने और खाने की व्यवस्था भी हो गर्इ तो धीरे-धीरे वहीं रम गए। वैसे तो वहाँ आमदनी अच्छी थी और कोर्इ दूसरी परेशानी भी नहीं थी। मगर जब बच्चे बड़े हो गए तो उन्हें उनके पढ़ार्इ-लिखार्इ की फिक्र सताने लगी। उस इलाके में कोर्इ विद्यापीठ नहीं था। ऐसे में उन्होंने अपने परिवार को फिर से अपने पैत्रिक गाँव पहुँचा ने का फैसला कर लिया, जहाँ भगवती कृपा से स्थानीय ब्राह्मणों के कर्इ अच्छे विद्यापीठ संचालित होते थे। फिर बेटियों की शादी भी करनी थी। राजमहल की पहाड़ियों में उन्हें स्वजातीय सुयोग्य वर कहाँ मिलते। धन का अभाव रहा नहीं सो इरादा यही था कि वहाँ कुछ जायदाद खरीदकर घरवालों के रहने की व्यवस्था वहीं कर देते और खुद लौट आते। वैसे रामचरित का मन भी अब उस बियावान से उबने लगा था। वे भी साल दो साल में वहाँ की नौकरी छोड़कर गाँव लौट जाना चाहते थे।

सुन्नर ने अपने गाँव की परेशानी का जिक्र किया तो उनके मुँह से बरबस यही जवाब निकला - आप लोग कुंड क्यों नहीं खुदवा लेते हैं?

कुंड खुदवा लें! कुंड खुदवाने से समस्या खतम हो जाएगी। लोगों की हँसी आ गर्इ। धरती कोड़ते-कोड़ते डाँढ़ (कमर) टूट जाती है और आचमन करने लायक पानी निकलता नहीं, कहते हैं कुंड खुदवा लीजिए।

नहीं भाय लोग! आप लोग हमारी बात नहीं समझे। हम भी बाहर के आदमी नहीं हैं, हमको सब पता है। मगर आपको पता नहीं है कि जहाँ हम रहते हैं वहाँ पाताल के भी नीचे से खोद-खाद के कोयला निकाला जाता है। वहाँ भी हम लोग धरती मइया के गरभ से चालीस-चालीस, पचास-पचास बाँस भीतर से पानी निकालते हैं। ऐसा कुंड हमारे-आपके जैसे नरम हाथ-पैर वाले लोग नहीं खोद सकेंगे, इसके लिए हमारे इलाके के दानवों की जरूरत पड़ती है। दंता राकसों के झुंड की। वे लोग दाँत से भी जमीन खोदेंगे तो रात भर में कुंड तैयार कर देंगे। अगर उनको यहाँ ले आए तो काम आसानी से हो जाएगा।

मुदा (हालाँकि) दंता राकस का झुंड यहाँ आएगा नहीं। कहते-कहते रामचरित बाबू सोच में पड़ गए।

लोगों ने पूछा - काहे...

रामचरित बोले - बड़ा एक बोलिया जात है। एक तो अपना इलाका छोड़ना नहीं चाहता, फिर हमारे आपके जैसे इनसान से दूर ही रहना पसंद करता है। इसके अलावा उसको तीन टाइम महुआ का रस चाहिए, कहाँ मिलेगा यहाँ?

इस पर नायक जी ने कहा - फिर तो आपको हम लोगों की मदद करनी पड़ेगी, आप लोग हमारे इलाके के रहने वाले हैं और उन दानवों से परिचित भी हैं, आप जब घर से लौटने लगिएगा तो इधर से ही जाइएगा और हमारे लोग आपके साथ हो जाएँगे। आप रास्ता निकालिएगा तो जरूर काम हो जाएगा?

नायक जी, कोशिश जरूर करेंगे। मगर वे लोग हैं तो आखिर दानव ही, कब कैसा मिजाज है समझ नहीं आता? हमारे सेठ लोगों ने बड़ी मुश्किल से उनको बस में किया है और काम करवा रहे हैं। उनके लिए मदिरा का भरपूर इंतजाम रहता है। इसका इंतजाम आप यहाँ नहीं करवा पाएँगे। यहाँ महुआ के पेड़ कहाँ मिलेंगे? ऐसे में उनको यहाँ इस इलाके में खींचकर लाना बड़ा मुश्किल है। फिर भी आपने कहा है तो सहयोग जरूर करेंगे।

अंत में इस बात पर सहमति बनी कि एक माह बाद जब रामचरित बाबू सारा काम निबटाकर गाँव से लौटकर पहाड़ी इलाके की तरफ जाने लगेंगे तो सुन्नर और गाँव के कुछ और साहसी युवक उसके साथ हो लेंगे; और दंता राकसों को गाँव लाकर उनसे कुंड खुदवाया जाएगा। यह भी तय हुआ कि कम से कम पाँच कुंड खुदवा लिए जाएँगे ताकि पूरे गाँव के जल संकट का एक साथ समाधान हो जाए।

इतना कहने के बाद सुरपति ने एक बार फिर श्रोताओं के भरोसे को टटोलना जरूरी समझा। नजरें उठार्इ तो देखा दोनों पोतियों के भौं सिकुड़े हुए थे।

क्या हुआ बाबू लोग, बात जम नहीं रही?

नहीं दादा जी! लोक कथाएँ तो डेविड धवन की फिल्मों की जैसी ही होती है।

ये डेविड धवन की फिल्में कैसी होती है?

मतलब! खिलखिलाहट भरी हँसी हँसते हुए छुटकी ने कहा - इनमें आप लाजिक थोड़े ही लगा सकते हैं। जैसे, सारी माथा-पच्ची जल संकट को लेकर हो रही है और समाधान है कुंड। क्या उस जमाने के लोग कुंड खोदने के बारे में नहीं जानते थे, जो झारखंड के इलाके से लेबर आउटसोर्स किए जा रहे थे।

बातचीत की कमान एक बार फिर डायरेक्टर साहेब ने थाम ली - बात तो तुम लोगों की सही है, मगर यह भी तो सोचो कि आज के समय और उस वक्त में चार-पाँच सौ साल का फासला था। नरम मिट्टी वाले इलाके में तो लोग जैसे-तैसे तालाब खोद लेते थे, मगर बंजर और पहाड़ी इलाकों में जमीन के नीचे से पानी निकालना बहुत बड़ी बात होती थी। यही सोच लो कि अगर सबमर्सिबल पंप नहीं होते तो जिन इलाकों में दो सौ फीट के नीचे पानी पाया जाता है, वहाँ पानी की व्यवस्था कैसे होती। यह सिर्फ बोरिंग करवाने की बात नहीं थी; लंबे-चौडे कुंड खुदवाने का मसला था। उस जमाने में ऐसे ही आदिवासी दानव कुंड खोदा करते थे, भोपाल का बड़ा तालाब भी कहते हैं किसी दैत्य या जिन्न ने ही खोदा था। बड़ी-बड़ी मशीनों के बगैर ऐसा तालाब खोद पाना मुमकिन था क्या?

तो क्या वे लोग सचमुच दानव ही थे, इनसान नहीं थे? बड़की के इस सवाल पर डायरेक्टर साहेब सकते में आ गए।

वैसे विश्वंभर इन लोगों की बात भी गलत नहीं। सुरपति राय ने इस बहस को समाप्त करने के इरादे से कहा - लोक कथाओं का पाठ करने वाला हर वाचक उसे अपने हिसाब से थोड़ा तो बदल ही देता है। ऐसे में इनका अतार्किक होना कैसे असंभव है। अब देखो, हमने ही अपनी बुद्धि के प्रयोग से इस कहानी में कितने बदलाव कर डाले। वैसे भी बच्चियों कथा-कहानियों की गुणवत्ता उसके तार्किक होने में थोड़े ही है। कर्इ बार अतार्किक कहानियाँ लोगों को ज्यादा पसंद आती है, क्योंकि उनमें वे कहीं नहीं होते और कथा का संदेश या मर्म उन्हें या उनके अहम को चोट नहीं पहुँचाता। चलो अब इस बहस को यहीं छोड़कर यह पता करें कि परानपुर गाँव में आगे क्या-क्या होने वाला है। अब कुछ बातें अपनी कथा नायिका सुन्नैर के बारे में भी हो जाए हमने लंबे समय से जिसकी चर्चा नहीं की है।

सपनों का देवपुत्र

ऐसा नहीं कि सुन्नैर के जीवन में परानपुर की धरती को फिर से हरा-भरा देखने के सिवा कोर्इ और सपना नहीं था। जवानी की दहलीज पर कदम रखने के बाद हर आम ओ खास लड़की की तरह उसने भी सपना देखा था कि कोर्इ गठीले शरीर और मुस्कुराते चेहरे वाला देवपुत्र उस पर मर मिटेगा और वह भी कुछ देर अपनी नाजो अदा दिखाकर उसके नाम पर अपना जीवन कुर्बान कर देगी। जीवन की कड़वी सच्चाइयों का अनुभव होने पर उसकी प्राथमिकताएँ जरूर बदल गर्इं, मगर वह सपना कभी मरा नहीं, बस दिल के किसी कोने में छिपा रहा, सही मौके का इंतजार करता रहा। आखिर वह देवपुत्र आ ही गया।

इतना कह कर सुरपति चुप हो गए।

फिर क्या हुआ दादाजी?

यह मैं नहीं बताऊँगा। यह तो कल्पना की जा सकती है कि क्या हुआ होगा?

काकाजी! संकोच मत कीजिए। विश्वंभर ने आग्रह किया - मैंने अपनी बेटियों को कालीदास भी सुनाया है और वात्स्यायन का पाठ करने की भी इजाजत दी है। आप इन्हें सुन्नैर के इस प्रेम-प्रसंग से क्यों वंचित करना चाहते हैं?

लो सुन लो। विश्वंभर जो न कराए।

पूजा के चार दिन बाद यह घटना घटी। तीसरे पहर का वक्त था; दिन भर धूप की तपिश ने सुन्नैर के बदन को पसीने से तर-बतर कर दिया था। उमस कम होने का नाम नहीं ले रहा था। वह मंदिर के पास वाले पुराने तालाब में डुबकी मारने पहुँची थी। मगर एक बार पानी में उतरने के बाद बाहर निकलने को उसका मन हो ही नहीं रहा था। आखिरकार सूरज डूबता देख उसने तट की ओर कदम बढ़ा ही दिए। पानी से निकलकर उसने जैसे ही पहली सीढ़ी पर कदम रखा तो देखा घोड़े की लगाम को पकड़े एक नौजवान उसके सामने खड़ा है, उससे महज डेढ़ कदम की दूरी पर। गोरा और चौकोर चेहरा, घुँघराले बाल, चमकती आँखें, होठों पर सहज मुस्कुराहट, लंबी काठी और भरा शरीर। यह कौन है! कोर्इ देवपुत्र तो नहीं? कोर्इ सपना या कोर्इ मूरत तो नहीं? किसी जादूगर का काला जादू तो नहीं? वह ठगी सी इस संयोग को देखती रह गर्इ। पल भर को यह भी न सोचा कि जिसे वह इस तरह देख रही है वह भला क्या देख रहा है? छाती से जाँघ तक के शरीर को सूती के अधोवस्त्र से ढकी एक युवती। नवयौवना। इतनी सुंदर कि उसका नाम ही सुन्नैर है। और इस हाल में है जिस हाल में किसी पुरूष ने उसे आज तक देखा नहीं। पानी से भीगा अधोवस्त्र जितना छुपा रहा है उससे अधिक इशारे कर रहा है। स्तन की गोलाइयाँ, बदन का कटाव, नितंब का आकार कुछ भी तो नहीं छुपाया जा रहा है। वह देवपुत्र चाह तो रहा था कि उसे इस बात का आभास दिलाने से पहले ही लौट जाए, मगर लौटे कैसे? र्इश्वर से प्राप्त इस अवसर को भला कैसे ठुकरा दे? वह चरित्रवान तो है, मगर इतना नहीं कि कामदेव के इस उपहार से नजरें बचाकर निकल जाए। वह शर्मीला तो है, मगर इतना तो नहीं कि अपनी किस्मत से भी शरमा जाए। कामदेव का जादू कर्इ पल यूँ ही चलता रहा और जब टूटा तो दोनों के पास एक दूसरे को समझाने के लिए कुछ बचा नहीं था। घोड़े को पानी पिलाने आया देवपुत्र पलटकर लौट गया और सुन्नैर शरमाकर पानी में बैठ गर्इ। मगर कुछ ही पल बाद उसे लगा कि उसका सर्वस्व वह देवपुत्र लिए उससे दूर जा रहा है। कहीं उसका सब कुछ खो न जाए। एक पल में उसने फैसला किया और कामाख्या में सीखे गुन से पल भर में कलगी बनकर उसके घोड़े के सिर में जा फँसी। वह देवपुत्र एक बार फिर उसके सामने था।

अब वह उस देवपुत्र को सामने से देख सकती थी, ठीक डेढ़ कदम की दूरी से। मगर इस बार देवपुत्र का चेहरा कुछ उतरा हुआ था। चाल में न सिर्फ शिथिलता थी, बल्कि सुध-बुध का अभाव भी था। अचानक देवपुत्र का घोड़ा एक बैलगाड़ी के सामने आकर खड़ा हो गया, गाड़ी वाले ने एक बार कहा भी कि मालिक रास्ता तो छोड़ दें, मगर ऐसा लगा कि देवपुत्र ने उसकी बात सुनी ही नहीं। आखिरकार बैलगाड़ी वाले को नीचे उतरना पड़ा, करीब जाकर घोड़े का लगाम खींचा तो देवपुत्र की सुध-बुध वापस आर्इ।

मालिक! किसी जरूरी बात का विचार कर रहे थे क्या, राह-बाट में ऐसा व्यवहार करेंगे तो कैसे काम चलेगा?

अरे नहीं भार्इ माफ कीजिएगा। अच्छा भार्इ आप कमल नायक के घर का पता बता सकते हैं?

क्या कमल नायक का घर? उसी के घर जा रहा है देवपुत्र? जानकर सुन्नैर का मन अपार हर्ष से भर गया।

हाँ-हाँ क्यों नहीं! गाड़ीवाले ने देवपुत्र को सुन्नैर के घर का पता बता दिया।

कौन हो तुम ऐ देवपुत्र, जो मुझे इस तरह अपने अश्व पर बिठाकर मेरे अपने ही घर लिए जा रहे हो? मेरे मन का अश्व तो बेलगाम होन लगा है।

अचानक देवपुत्र की नजर उस कलगी पर पड़ी। यह कलगी तो उसकी नहीं थी, किसने लगा दी यह कलगी? कहीं छोटे भार्इ ने तो नहीं? नहीं! जब वह घर से निकला था उस वक्त तो यह नजर नहीं आया? हो सकता है निगाह नहीं पड़ी हो। उसने झट से वह कलगी निकालकर अपने हाथ में ले ली और उसे घुमा फिरा कर निहारने लगा। कलगी घबड़ा उठी, कहीं देवपुत्र उसे चूम न ले, या फिर तोड़कर फेंक ही न दे। या फिर अपने साथ ही लेकर कहीं चला न जाए। अब क्या होगा?

देवपुत्र भी कलगी से इतना आकर्षित हो गया था कि उसे चूम ही लेना चाहता था। कलगी उसके होठों से चंद उँगलियों की ही दूरी पर थी। मगर उसने अपने आप को इस वजह से रोका था कि अगर किसी ने देख लिया तो क्या सोचेगा। भला उसके दिल में ऐसा अजीब ख्याल आ ही क्यों रहा है? इस दीवानगी का तुक क्या है? कहीं वह सुंदरी तो नहीं? वह कौन थी? अब तो वह दुबारा कभी उसे देख भी नहीं पाएगा। नहीं इस कलगी को चूमे बिना वह नहीं रह पाएगा। देवपुत्र ने इधर-उधर निगाहें दौड़ाई। सड़क के आखिर में अकेले गुल्ली-डंडा खेल रहा वह बच्चा कहीं उसे ही तो नहीं देख रहा? नहीं वह अपने खेल में मस्त है। अगर कहीं ऐन वक्त पर उसकी निगाह इधर पड़ ही जाए? नहीं, ऐसे में उसे कुछ भी समझ नहीं आएगा। मगर कलगी को चूमना जरूरी है क्या? हाँ जरूरी है, उस रूपवती के मदमाते यौवन का आखिरी जाम है यह कलगी।

कलगी को पता नहीं था कि देवपु़त्र के मन में क्या चल रहा था? उसे क्या पता था कि आज ही उसके यौवन का उद्घाटन होने वाला है। अचानक एक हरकत हुर्इ और उसके होठ देवपुत्र के अधरों पर चिपके थे, एक झटके में दोनों शरीर में बिजली दौड़ गर्इ। तभी उस बच्चे की गूँजती हुर्इ हँसी सुनार्इ पड़ी और दोनों अलग-अलग थे। देवपु़त्र ने बच्चे की तरफ देखा तो किसी और बात पर हँस रहा था। उसने उसकी बेवकूफी नहीं देखी थी। आश्वस्त होने के ख्याल से उसने उसे बच्चे से जोर से पूछा।

अरे बाबू! कमल नायक का घर कैसा जाना होगा?

दाएँ मुड़ जाइए। सीधे पहुँच जाएँगे। ज्यादा से ज्यादा पचास बाँस होगा।

कलगी ने देखा - यह उसी के टोले का बच्चा था। वह सिहर उठी। नहीं, अभी तो वह कलगी बनी हुर्इ है, अभी उसे कोर्इ नहीं पहचानेगा। चैन आया, मगर इस देवपुत्र ने कैसा अनर्थ कर डाला।

बच्चे का जवाब सुनकर देवपुत्र ने घोड़े को ऐड़ लगार्इ और अगले ही पल वह उसके द्वार पर था। अपने द्वार पर देवपुत्र को देखकर सुन्नैर के मन में संगीत बज उठा।

         सजना ऐले मोरे दुआर।
         घोड़ा पकड़ौ हौ दरबान।
         ठीक से परिछियैं हे गे माय।
         भइया तू लीहैं गोदी उठाय।
         ढोलकिया रे तोयाँ डोल बजाए।
         सजना ऐले मोरे दुआर।
         हेगे सखिया देखें गे दाय।
         सुंदर छै ना मोरे साँय।
         गे मालिनियाँ माला लानिह।
         गरदन में हम देबै पिन्हाय।

कलगी अभी भी उसके हाथ में ही थी। घोड़े से उतरकर शायद वह उसे घोड़े के सिर में लगा देगा। फिर वह द्वार के अंदर जाएगा। इस बीच उसके पास मौका होगा आसानी से रूप बदलकर अंदर चले जाने का। देवपुत्र बड़ी अदा से घोड़े से नीचे उतरा और दरबान की तरफ ऐसे इशारा किया, जैसे उसका अपना दरबान हो। दरबान सुखन दौड़ा-दौड़ा आया। उसने घोड़े की रास सुखन को थमा दी और कहा - नायकजी को खबर दे दो - धरमपुर से शिवचंद्र ठाकुर के पुत्र और आनंद ठाकुर के भतीजे राघव ठाकुर आए हैं।

आनंद ठाकुर यानी छोटका मौसा। तो यह देवपुत्र छोटका मौसा का भतीजा है। कलगी का मन खुशी से पुलक उठा। नाम है राघव। रघुपति राघव राजा राम। राम ही जैसा तो है। मगर वह अभी भी उसके उँगलियों में ही फँसी थी। राघव उसे घोड़े के सिर में फँसाना भूल गया था। दैया रे दैया अब क्या होगा?

अंदर खबर गर्इ तो कमल नायक बड़े उत्साह से झटकते हुए बाहर आए, पीछे-पीछे सुन्नैर की माँ और दादी भी पहुँची। कमल नायक राघव को अंदर ले गए और उसकी माँ आतुरता से अपनी छोटी बहन का कुशल क्षेम पूछने लगी। राघव ने खुशखबरी सुनार्इ कि उनकी बहन को लड़का और उसे छोटा भार्इ हुआ है और इसलिए वह यहाँ छट्ठी के मौके पर सभी लोगों को अपने साथ धरमपुर ले जाने के लिए भेजा गया है। इस बीच आगंतुक के लिए शर्बत और जलपान की फरमाइश हुर्इ और ऐन मौके पर सुन्नैर की तलाश शुरू हो गर्इ। राघव की उँगलियों में फँसी कलगी, सुन्नैर बाहर निकलने के लिए कसमसा रही थी। सारे नौकर-चाकर हर कमरे में तलाशकर वापस आ गए मगर सुन्नैर कहीं नहीं मिली। वह अंतिम बार तीसरे पहर नहाने के लिए तालाब जाती नजर आर्इ थी। चौथा पहर बीतने को था; अब तक लौटी नहीं। कहीं डूब तो नहीं... एक आशंका सबों के मन में छा गर्इ। सेवक तालाब की ओर दौड़ाए गए। राघव के दिमाग में झट से तालाब से निकलती वह सुंदरी कौंध गर्इ, कहीं वह सुन्नैर ही तो नहीं थी। कहीं इस हालत में देखे जाने के कारण उसने खुदकुशी तो नहीं कर ली। आव न देखा न ताव, वह भी घोड़े पर सवार होकर तालाब की ओर चल पड़ा। थोड़ी दूर चलने के बाद लगाम खींचने में परेशानी हुर्इ तो समझ आया कि कलगी तो उसके हाथ में ही है। उसने हाथ आगे बढ़ा कर कलगी को फिर से घोड़े के सिर में फँसा दिया। कलगी ने राघव के हाथ से छूटते ही घोड़े के सिर से निकलने की कोशिश शुरू कर दी। मगर उसे उचित अवसर नहीं मिल पा रहा था। आखिरकार राघव तालाब के तट पर जा पहुँचा और सीधे पानी में कूद पड़ा। राघव को पानी में कूदता देख सुन्नैर घबरा गर्इ। झट से घोड़े के सिर से उतरी और रूप बदलकर राघव को पुकार बैठी।

इतनी शाम को पानी में क्यों उतर रहे अजनबी?

राघव ने पलटकर देखा, सामने वही सुंदरी थी।

आपकी ही तलाश में, कहाँ थीं आप?

मैं कोर्इ मछली हूँ जो आप मेरी तलाश में पानी में उतर गए?

मछली नहीं जलपरी होंगी, मैंने तो आपको पानी से ही निकलते देखा था।

मगर मुझे तलाश क्यों रहे थे, यह तो बताइए?

पहली मुलाकात में कुछ बातें अधूरी रह गर्इ थीं।

क्या अधूरा छूट गया था बताइए?

यहाँ?

और कहाँ? यहीं मुलाकात शुरू हुर्इ थी, यहीं खत्म कीजिए और अपने घर को जाइए।

अरे मुझे आपके ही घर जाना है, अपने घर नहीं।

अच्छा?

कोर्इ शक?

आपको कैसे मालूम है मेरा अपना घर कहाँ है? अभी तो यह मुझे भी नहीं मालूम।

सचमुच?

कोर्इ शक?

तो कोर्इ बात नहीं जल्द ही मैं आपको आपके अपने घर ले जाऊँगा, अभी तो अपने पिता के घर चलिए वहाँ सभी परेशान हैं।

आप आगे बढ़िए, मैं पीछे से आती हूँ।

क्यों मेरे साथ इस घोड़े पर चलने में कोर्इ परेशानी है? भरोसा रखिए मैंने जो देखा है उसे पा लेने की हड़बड़ी नहीं है मुझे।

नहीं-नहीं ऐसी बात नहीं।

तो फिर आइए।

राघव ने सुन्नैर को घोड़े पर चढ़ा लिया।

धरमपुर में सात दिन

मौसेरे भार्इ के जन्म की खुशियाँ मनाने धरमपुर पहुँची सुन्नैर के दिन वहाँ ज्यादातर अपने प्रेम संबंध को विकसित करने में और उसके लिए अभिभावकों से वैवाहिक संबंध की स्वीकृति पाने में ही बीते। हालाँकि उसे बहुत जल्द समझ में आ गया कि जिसे वह अपना प्रेम और उसकी जीत समझती आ रही थी वह दरअसल दोनों पक्ष के अभिभावकों की गहरी साजिश थी। दोनों तरफ के लोग इस संबंध के लिए काफी पहले से तैयार थे और इस बात पर राघव से भी सहमति ले ली गर्इ थी। डर अगर था तो सिर्फ सुन्नैर का जो परानपुर के जल संकट के समाधान तक विवाह न करने की कसम खाए बैठी थी और हर प्रस्तावित रिश्ते को सीधे इनकार कर देती थी। अब रामचरित की बातों से जो समाधान समझ आया उससे उसके तेवर भी ढीले पड़ गए और राघव के साथ मिलन के संयोग ने उसके अंदर छुपी प्रणय चिनगारी को और भड़का दिया। अब तक विवाह के सारे प्रस्ताव माता-पिता देते आए थे, इसके उलट इस बार प्रस्ताव सुन्नैर की तरफ से ही आया। इस प्रस्ताव से भला किसको असहमति हो सकती थी। देखा-परखा घर था, समृद्धि की कमी थी नहीं और सबसे बड़ी बात किसी लड़की के लिए इससे अच्छी बात क्या हो सकती थी कि वह माँ के आँचल से निकले तो मौसी की छाया में पहुँच जाए।

मगर जब सुन्नैर को यह बात समझ आने लगी तो इस रिश्ते को लेकर उसके मन का उत्साह घटने लगा। जहाँ अब तक वह राघव की एक झलक पाने के लिए घंटों यहाँ-वहाँ मंडराती रहती थी, अब राघव उसके पास होता तो उसके चेहरे में वह उस राज को तलाशती रहती जिसके लिए वह मर मिटी और अपने जीवन को न्योछावर करने का फैसला कर बैठी। निस्संदेह यह क्षणिक आवेग उसके बचपने की निशानी थी, उसे लगता कि उसके आसपास के लोगों ने उसकी इस आतुरता को देखा-परखा होगा और वे मन ही मन इस बात पर हँसते होंगे। और जब उसने अपने माता-पिता के सामने इस संबंध के लिए प्रस्ताव किया होगा तब उन्होंने जरूर सोचा होगा, आखिरकार उनकी तरकीब सफल हो ही गर्इ।

ऐसा नहीं था कि उसे अपने प्रेम और अपने चयन को लेकर संशय था, मगर जिस बचकाने तरीके से यह सब हुआ वह क्या सुन्नैर जैसी लड़की के अनुकूल था? धरमपुर के इलाके की हरियाली और वहाँ के लोगों की जिंदादिली अभी भी उतनी ही दिलकश लगती जितनी पहले दिन लगी थी। और राघव का व्यक्तित्व भी वैसा ही होगा। अगर बदला कुछ था तो वह सुन्नैर का अपना मन था, ऐसे में इसकी सजा किसी और को देना भी तो उचित नहीं था। मगर अब वह परानपुर लौट जाने के लिए बेचैन थी। अब वह परानपुर के कुंडों की खुदार्इ की बातें करना चाहती थी, जबकि राघव आने वाले दिनों की, विवाह और अपने परिवार की योजना बनाना चाहता था। वह न राघव को मना कर पाती और न ही अपने मन को इन चीजों के लिए तैयार कर पाती। ऐसे में उस रात जो हुआ वह एक बड़ा आघात था।

रात का दूसरा पहर आधा बीत चुका था। खाना खाने और ढे़र सारी बातें कर लेने के बाद सुन्नैर अपनी मौसी के साथ बिछावन पर लेटी नींद का इंतजार कर रही थी। तभी दस्तक हुर्इ, मौसी ने पूछा कौन तो उधर से कोर्इ आवाज नहीं आर्इ। कुछ देर बाद फिर दस्तक हुर्इ। मौसी ने इशारे से कहा - तू पूछ सुन्नैर। सुन्नैर ने पूछा, तो फिर दस्तक हुर्इ। सुन्नैर ने फिर पूछा - कौन? फिर एक बार हल्के से दस्तक हुर्इ। मौसी ने कहा - चली जा, राघव है। कुछ जरूरी बात करना चाह रहा होगा।

इस वक्त?

कोर्इ बात होगी।

सुन्नैर का बाहर जाने का जरा भी मन नहीं था, आखिर कोर्इ भी क्यों न हो, इस वक्त कौन सा पहाड़ टूट पड़ा। मौसी के बार-बार दबाव देने पर वह दरवाजे तक गर्इ। एक बार फिर पूछ लिया। राघव ही था। वह जैसे बाहर निकली, उसका हाथ खींचते हुए राघव उसे अपने कमरे तक ले गया, जो ठीक सामने था। सुन्नैर-क्या बात है, क्या बात है करती रह गर्इ। वहाँ पहुँचकर सुन्नैर ने झटके से हाथ छुड़ा लिया।

क्या बात है?

तुम नहीं समझती हो?

सब समझती हूँ, उचित-अनुचित भी तो समझना चाहिए। मैं अपनी जिंदगी तुम्हारे हाथ में सौंपना चाहती हूँ और तुम इतने अधैर्य हो।

तुम सुन्नैर हो न, इसलिए। तुम समझ नहीं सकती जिसने तुम्हारा वह रूप देखा है वह खुद पर कैसे काबू रख सकता।

इतना कहने के साथ राघव के हाथ उसके शरीर पर भटकने लगे।

देखो, भगवान के लिए अपने आपको सँभालो। नहीं तो...

नहीं तो क्या? धमकी दे रही हो?

हाँ, तुम सुन्नैर को पहचानते नहीं हो, उसे खुद को मिटाने का फैसला लेने में भी ज्यादा वक्त नहीं लगता। इसलिए अभी मुझे जाने दो।

इतना कहकर सुन्नैर उठी और झटके से कमरे से निकल गर्इ। उसके तेवर देखकर मौसी के समझ में काफी कुछ आ गया। सुन्नैर ने तमककर कहा - तो मौसी, तुम्हें तो सब पता था न।

पता नहीं था। मगर इतनी परेशान क्यों हो? मर्द की जात ऐसी ही होती है।

सारे मर्द?

हाँ, लगभग। होता यही है, अब जो औरत ऊँचे चरित्र की होती है वह अपने मर्द को बदलने की कोशिश करती है। बाकी ढल जाती हैं। वैसे भी तुमने आज यही न कमाल किया कि अपना कौमार्य बचा लिया। अब यह सोचो इसे बचाया भी तो किसके लिए एक मर्द के लिए ही न। जो पहली रात को इस गर्व से भर उठेगा कि मैंने ही इस औरत पहली बार भोगा।

अपनी मौसी की बातें सुनकर सुन्नैर चकित थी। साधारण पारिवारिक जीवन जीने वाली उसकी मौसी इस स्तर तक सोचती है और इसके बावजूद वह उसे राघव के आगोश में भेज चुकी थी। मौसी ने फिर कहा - औरतों का जीवन आदर्शों से नहीं चलता है, बल्कि हर कदम पर उसे समझौते करने पड़ते हैं। इसलिए कहती हूँ नीति और आदर्श के चक्कर में पड़ने से बेहतर समझौता करने और समझौते में अपने लिए अधिक से अधिक हासिल करने का हुनर सीखो। औरतों के जीवन में सबसे अधिक यही गुण काम आता है। तुम अब जीवन के एक नए दहलीज को लाँघने जा रही हो। ऐसे में तुम्हें यह सब समझा देना जरूरी था।

सुन्नैर को लगा यह रात बहुत कड़वी है और इस रात के बाद वह बहुत बड़ी हो जाएगी। अगले दिन राघव लगातार सुन्नैर से बचने की कोशिश करता रहा, मगर सुन्नैर के बर्ताव में कोर्इ उद्वेग नहीं था। वह बहुत सामान्य तरीके से लोगों से बातचीत कर रही थी। अब वह हर चीज के लिए तैयार थी और हर बात से असंबध भी। दो दिन तक वह बड़े मजे में धरमपुर में रही, हँसती-खिलखिलाती, हर किसी से चुहुल करती और दो दिन बाद उसी तरह हँसते-खिलखिलाते वह धरमपुर से लौट गर्इ। इस बीच एक दोपहर एकांत पाकर राघव ने उससे क्षमा याचना करने की कोशिश की। जबाव में हँसते हुए सुन्नैर ने कहा - तुमने एक बेवकूफी की, मैंने उसे भुला दिया। अब तुम भी उसे भूल जाओ।

तो क्या अब हम दोनों फिर से वैसे ही हो जाएँगे, जैसे पहले थे।

शायद नहीं। मैंने कर्इ दूसरी बातों को भी भुला दिया है। तुम्हारा शुक्रिया, मैं अब बड़ी हो गर्इ हूँ। तुम भी अब बड़े हो जाओ।

राघव को लगा कि वह किसी और लड़की से बात कर रहा है। उसके होठों की लाली, चेहरे का जादू, भारी स्तनों का कसाव, नितंबों का थिरकना सब कुछ वैसा ही है। मगर अब उस ओर देखने में भी उसे घबराहट होगी।

कोयले वाले पहाड़ों की ओर

वादे के मुताबिक ऐन वक्त पर हाजिर होकर रामचरित दास ने साबित कर दिया कि वे जिम्मेदार भी हैं और भरोसेमंद भी। अगले दिन सुन्नर, कदम पहलवान, सुन्नर का बाल सखा अखिल और दो अन्य युवकों का काफिला उनके साथ कोयला वाले पहाड़ों की तरफ निकल पड़ा। यह छोटा सा काफिला जो अच्छी नस्ल के घोड़ों पर सवार था, तीसरे पहर तक कटिहार पहुँचा और रात वहीं एक धर्मशाला में ठहर गया। अगली सुबह तड़के ही वे लोग मनिहारी घाट की ओर निकल पड़े।

जब वे घाट पर पहुँचे तो उस पार जाने वाले जहाज के खुलने में काफी समय था, अभी जहाज राजमहल से लौट ही रहा था। अब तक छोटी-छोटी नौकाओं के जरिए नदी पार करने वाले परानपुर के नवयुवकों में से सिर्फ सुन्नर ने ही जहाज देखा था। बाकी लोगों के लिए यह कौतूहल का विषय था, एक ऐसी नाव जिस पर सैकड़ों नावों की सवारियाँ और माल-असबाब अँट जाते हैं। सामान से लदी बैलगाड़ियाँ, घोड़े, हाथी सब उस पर सवार हो जाते हैं। ऐसी ही बातें लोगों से सुन-सुनकर वे यहाँ आए थे, आज पहली बार वे यह नजारा देखने वाले थे। गंगा में पहले नावें चलती थी, मगर पिछले कुछ दशकों से सुदूर दक्षिण से आने वाले सौदागरों ने जहाजों का प्रचलन शुरू किया था। ये न सिर्फ यात्रियों को नदी पार कराते थे बल्कि नदियों में धाराओं के साथ और विपरीत बंगाल से काशी और आगे भी दूर-दूर तक जाते थे। कहते हैं ऐसे ही एक जहाज से पंजाब मुलुक के संत गुरु तेग बहादुर कामरूप कामाख्या से अपने देस लौटते वक्त काढ़ागोला के पास ठहर गए थे। आजकल वहाँ पहुँचकर उस गुरु के दरसन करने वालों का रेला उमड़ा हुआ था। इस घाट पर भी कर्इ श्रद्धालु वहीं जाने वाले थे। उन्हें तो खैर राजमहल जाना था इसके लिए सीधा जहाज था। आखिरकार उनका जहाज किनारे लगा और सवारियों की भीड़ उतरी। किराए पर चलने वाली बैलगाड़ियों और घोड़ागाड़ियों के गड़ीवानों ने सवारियों को घेरना शुरू कर दिया।

उन लोगों ने देखा बड़े और मोटे कपड़े का कनात जैसा जहाज में टँगा था, रामचरित बाबू ने बताया इसे पाल कहते हैं। इसी के सहारे हवा की दिशा में जहाज चलता है। अभी जहाज हवा की दिशा में चल रहा था इसलिए इसे टाँग दिया गया था, अब चूँकि उल्टी दिशा में चलना है इसलिए इसे उतार लिया जाएगा। जहाज के अंदर भी बैठने की जगह के उपर छत बना हुआ था। अंदर लोग आराम से टहल रहे थे और खड़े-खड़े एक दूसरे से बतिया रहे थे। रामचरित बाबू ने बताया कि जहाँ वे लोग बैठे हैं उसके नीचे भी एक तल है जहाँ सैकड़ों मल्लाह चप्पू चलाते रहते हैं।

अचानक जोर से भोंपू की आवाज हुर्इ और जहाज चल पड़ा। वे लोग जहाज के किनारे बने बाँस के घेरे को पकड़ कर खड़े हो गए। रामचरित ने बताना शुरू किया कि राकसों की बोली हम लोगों से अलग होती है। कि वे लोग इनसानों जैसे ही होते हैं बस उनका सोचने और जीने का तरीका हमसे अलग है। वे बाहरी लोगों पर बिल्कुल भरोसा नहीं करते, इसलिए किसी लालच के कारण ही तैयार होंगे। उन्हें पैसों का भी अधिक लालच नहीं होता, क्योंकि उन्हें एक रात से अधिक का इंतजाम करने की फिक्र नहीं रहती। वगैरह-वगैरह...

इसी बीच जहाज तट पर पहुँच गया। उस किनारे भी तकरीबन वैसा ही माहौल था। निकलते ही उसी तरह बैलगाड़ी वालों ने घेर लिया। मगर चूँकि उनके पास घोड़े थे ही इसलिए उन्होंने गाड़ियाँ किराए पर नहीं ली। दो-एक कोस का ही रास्ता तय हुआ था कि पहाड़ नजर आने लगे। अब बिल्कुल अलग दुनिया थी। पथरीली धरती, दोनों तरफ पहाड़, नरम इलाकों में चलने के अभ्यस्त घोड़े वहाँ डगमगा जाते थे। हरियाली का नामोनिशान भी बड़ी मुश्किल से नजर आता। पल भर सुस्ताने के लिए पेड़ों का मिलना तो बहुत बड़ी बात थी। परानपुर वाले सोच रहे थे कि ऐसा इलाका भी दुनिया में है, हम लोग भले दुख में हैं मगर अभी भी यहाँ से लाख गुना बेहतर है अपना गाँव। उन लोगों ने रामचरित बाबू से पूछ ही लिया कैसे रह लेते हैं ऐसे इलाके में। रामचरित ने कहा - अभी आपने असली इलाका देखा कहाँ, जहाँ हम लोग रहते और काम करते हैं।

थोड़ी ही देर में रामचरित बाबू का अपना असली इलाका भी आ गया। वहाँ जमीन पर हर जगह कोयला ही कोयला बिखरा हुआ था। कदम पहलवान ने तो आज तक कोयला देखा ही नहीं था। वहाँ तो हवा में भी कोयले के बुरादे ही उड़ते थे। साँस लेने में तकलीफ होती थी। रामचरित बाबू ने उन लोगों को वो जगह भी दिखा दी जहाँ पाताल से कोयला निकाला जाता था। शुक्र यही था कि रामचरित बाबू जहाँ रहते थे वहाँ कोयले का बुरादा नहीं पहुँचता था, नहीं तो कदम पहलवान आज ही गंगा पार कर भाग लेता। पहुँचते-पहुँचते शाम हो ही गर्इ थी लिहाजा उन लोगों ने रात में जमकर आराम करने का इरादा बना लिया। मगर खा पीकर वे लोग जैसे ही बिस्तर पर पड़े, कहीं से मदमा देने वाली ढोलक की थाप सुनार्इ पड़ने लगी। गीत-संगीत के शौकीन कदम का मन मचल उठा। उसने पूछा - रामचरित बाबू! ढोलक की आवाज से तो लग रहा है कि कहीं नाच हो रहा, चलकर थोड़ी देर देख लिया जाए क्या?

नहीं कदम बाबू! इस नाच के चक्कर में मत ही पड़िए तो अच्छा होगा। इस संगीत का मजा बिछावन पर लेटकर ही लीजिए।

क्यों रामचरित बाबू?

यह नाच राकसों की बस्ती में हो रहा है। अगर नाच के वक्त कोर्इ बाहर का आदमी दिख गया तो उसे वे सीधे परलोक भेज देते हैं।

आप भी बड़े डरपोक आदमी हैं रामचरित बाबू। कदम पहलवान को काटकर फेंकना इतना आसान नहीं है।

फिर भी हम कहेंगे कि वहाँ नही जाएँ। बड़े-बड़े पहलवान वहाँ पिद्दी साबित हो जाते हैं।

आप छोड़िए रामचरित बाबू। सुन्नर बाबू आप क्या कहते हैं?

कदम भार्इ, मैं तो यही समझता हूँ कि पराए इलाके में और परार्इ नदी में सोच समझकर और वहाँ के लोगों की सलाह मानकर ही चलना चाहिए।

जब सुन्नर ने भी कदम वापस खींच लिए, तो कदम पहलवान मन मसोस कर रह गया। मगर नींद उसे किसी भी तरह नहीं आ रही थी। जब सारे लोग सो गए तो वह चुपके से निकल पड़ा। फिर वही हुआ जिसका डर था। राकसों का मनमोहक नृत्य देखते हुए कदम पहलवान धर लिए गए और उन्हें मंदिर के सामने के एक पेड़ से बाँध दिया गया। उन्होंने कर्इ बार राकसों को अपनी बात समझाने की कोशिश की, मगर राकसों के पल्ले उनकी एक भी बात नहीं पड़ी और उन्हें भी यह समझ नहीं आया कि राकस अगली सुबह अपने कुल देवता के सामने उनकी बलि चढ़ाने की योजना बना रहे थे। यह तो अच्छा हुआ कि तीसरे पहर सुन्नर की नींद खुल गर्इ और कदम को बिस्तर पर न पाकर उसने तत्काल रामचरित बाबू को जगाया और रामचरित बाबू को माजरा समझने में वक्त नहीं लगा। संयोगवश कदम पहलवान को पकड़ने वाले रामचरित बाबू के ही साथ काम करते थे सो कदम पहलवान को मुक्ति मिल गर्इ, वरना जैसा कि अखिल ने कहा - कदम पहलवान की पहाड़ सी काया का मजा राकस लोग मसाला मिलाकर लेते। बाद में कदम पहलवान ने सुन्नर समेत सभी परानपुरवालों से तीन सत्त करवा लिया कि वे लोग इस घटना का जिक्र गाँव में नहीं करेंगे, बदले में वह उन लोगों को कुश्ती का एक गुप्त दाँव सिखा देगा। तब इस घटना का एक लाभ यह हुआ कि रामचरित बाबू ने दंता राकस से उन लोगों की पहचान करा दी और शाम में मिलने का वादा भी करा लिया।

अगले दिन शाम ढलने से पहले ही रामचरित के साथ परानपुर के पाँचों युवक राकसों के सरदार दंता राकस के दरवाजे पर पहुँच गए थे। पिछली रात के चौथे पहर में तो परानपुर के युवक राकसों की बस्ती ठीक से देख नहीं पाए थे। आज जब उन्होंने इस बस्ती को देखा तो उनका मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। मिट्टी के मकान भी इतने खूबसूरत होते हैं। जैसे सुर्खी-चूने की इमारत हो और साफ-सफार्इ इतनी कमाल कि चीटी भी रेंगे तो साफ नजर आ जाए। कैसे लोग इनको राकस कहते हैं, उनके गाँव में हैं इतने साफ-सुथरे मकान? अखिल ने तो तय कर लिया कि लौटने से पहले मिट्टी से महल बनाने की तरकीब सीख ही लेगा। दीवारों पर बने चित्र भी काफी मनमोहक थे और घर के सामने बनी पत्थर की बैठक तो और कमाल की थी।

दंता सरदार दरवाजे पर ही बैठा था और उन लोगों को भी वहीं बिठा लिया। वाकर्इ दंता दैत्य ही था। जितना चौड़ा उसी के अनुपात में लंबा भी। कदम पहलवान को वह उसी तरह काँख में दबाकर छह महीने रख सकता था जैसे बाली ने रावण को दबा लिया था। रंग इतना काला कि उनके गाँव का करियठवा, जिसको लोग उलटा तावा कहकर चिढ़ाते थे, इसके सामने काफी गोरा लगता था। दंता का काला रंग तिरछी धूप में चमचम कर चमकता था। बाल बहुत छोटे-छोटे और घुँघराले थे, भुट्टे के मोंछ की तरह सुनहले थे। दाँत राकसों की तरह बाहर निकले हुए नहीं थे, मगर जब मुँह खोलता तो दाँतों की सफेदी काले चेहरे के बीच ऐसे चमकती कि रोमांच पैदा हो जाता। आँखे चढ़ी हुर्इ और इतनी लाल थी कि परानपुर के सौ पियक्कड़ भी शरमा जाए। रामचरित तो उससे पहले से ही परिचित थे। दूसरे लोगों का भी उन्होंने बारी-बारी से परिचय कराया। इतनी औपचारिकता से दंता अधीर हो उठा। टूटी-फूटी खड़ी बोली में बोला।

समझ गया, समझ गया। नायक है। मगर काम पड़ा तब तो दंता सरदार के पास आया है, रिश्ता बनाने तो नहीं आया। हम लोग तो राकस हैं न, राकस से तुम लोग दोस्ती करता है क्या? तुम्हारा सौदागर भी तो कोयला निकालने के लिए हमको पटियाया।

अरे दंता सरदार, तुम तो सबको बैमान ही समझते हो। बंगाली सौदागार जायदाद बनाने के लिए तुमसे कोयला निकलवाता है, मगर ये लोग वैसे थोड़े ही हैं। ये लोग तो धरम का काम करवाना चाहते हैं। हजार आदमी के फायदे का काम। इनका काम करोगे तो तुमको पुन्न होगा।

रहने दे, सौदागार के मुंशी। तुम मानुसों का भगवान राकसों को पुन्न बाँटता है क्या? हमको पता नहीं क्या, राकस लोग तो तुम्हारे देवता लोगों का दुश्मन होता है। और तुम जो हजार लोगों के फायदा कहता है उससे राकसों का फायदा तो नहीं होगा न।

दंता सरदार की बातें सुनकर रामचरित बाबू निरुत्तर हो गए।

उदास क्यों होता है मुंशी। हम मना थोड़े ही किया है। मेरा मतलब है तुम दिक्कू लोग जो धरम-करम का घेराबंदी करता है वह बंद करो। काम बताओ, जगह दिखाओ। हम कीमत बताएगा। पसंद आए तो कराना नहीं तो तुम अपने घर, हम अपने घर। हम लोग तो राकस है न, हमको धरम-करम से क्या मतलब है। वैसे भी हमारा अपना भगवान है, वह अलग से हमको पुन्न देता है। हमको चाहिए अनाज, पोचाय (मुहआ से बनी शराब) और... छोड़ो बाद में बताएगा।

तभी घर के अंदर से दंता की घरवाली हिरनी रानी बाहर निकल आर्इ।

तुम काहे इसके चक्कर में है मुंशी। दंता कहीं नहीं जाएगा।

तू अंदर जा, तुझे किसने बीच में बोलने कहा। सरदार हम है कि तुम।

दंता की बातों का हिरनी पर कोर्इ असर नहीं हुआ - मुंशी, तुम्हारे सौदागार ने यहाँ बुलाकर हम लोगों को पोचाय का आदत लगा दिया। अब तुम फिर इसको कहीं और ले जाकर कोर्इ और आदत लगा दोगे। जिंदगी तो हमारी बरबाद होगी। हम इसको कहीं ले जाने नहीं देगा।

इस पर दंता ने हिरनी का हाथ पकड़ लिया और खींचकर दरवाजे के अंदर कर दिया और दरवाजा बंद कर दिया।

बहुत बोलने लगी है। तुमको हमको ले जाना है तो कल चलो। हम जाएगा, नायकजी।

दंता और उसकी घरवाली के झगड़े के कारण वे लोग संशय में पड़ गए। मगर थोड़ी देर चुप रहने के बाद रामचरित ने कह दिया ठीक है दंता। कल सवेरे तैयार रहना।

इतना कहकर वे लोग उठकर जाने लगे। इस पर दंता ने कहा कि अरे मुंशी जी इतनी जल्दी क्या है, एक दिन राकस लोगों के पोचाय का भी मजा ले लो। न चाहते हुए भी उन लोगों को रुकना पड़ा।

मानुष छोकरी मोहनियाँ

अगले दिन सुबह-सुबह वे लोग परानपुर लौट गए। दंता के साथ उसका साथी सोमाय भी था। रास्ते में उन लोगों ने बताया कि काम पाँच कुंडों की खुदार्इ का है, तो दंता ने कहा कि चाहे पाँच कुंड खुदवाना हो या बीस काम तभी होगा जब जगह और कीमत पसंद आएगा। गंगा घाट पार करने पर दंता और सोमाय को भी वैसा ही आश्चर्य हुआ जैसा कदम पहलवान को हुआ था। जमीन इतनी मुलायम कि पैरों में गुदगुदी लगाती है। इतनी समतल कि आँख मूँद कर चलिए। गाछ-बिरिछ इतने कि दिन में भी ठंडा लगे और लोग इतने छोटे और कमजोर कि जिसको चाहे मसलकर रख दे। कैसे जीते हैं ये लोग? दंता और सोमाय एक दूसरे से अपनी भाषा में बातकर एक दूसरे को केहुनी मारकर हँसते रहे। काहे दिक्कू से डरते हो? इसको तो डराकर रखना है। वे लोग जब हवेली पहुँचे तो सूरज डूबने वाला था। दंता राकस गाँव आ गया है यह खबर कुछ ही पल में पूरे गाँव में फैल गर्इ। दंता को देखने लोग हवेली पहुँचने लगे। तमाशा खड़ा हो गया। बहुत जल्द सुन्नर को समझ आ गया कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो दंता चिढ़ जाएगा और रात को ही यहाँ से भाग जाएगा। उसने फाटक बंद करवा लिए। पहरदारों को सजग करा दिया। हवेली के अंदर भी दंता को देखने और उसके बारे में जानने का कौतूहल कम नहीं था। सुन्नैर तो सुन्नैर, उसकी माँ, दादी, नौकर-नौकरानियाँ, सभी हुलक-हुलक कर देख रही थी कि राकस कैसा होता है? एक नौकरानी ने तो सुन्नर से पूछ ही लिया - भैया, ऐसा तो नहीं कि सामने जाने पर दंता हम लोगों को खा जाएगा? सुन्नैर से जब जिज्ञासा सही न गर्इ तो वह सीधे छत पर चली गर्इ और चारदीवारी में बने छेद से देखने लगी। दंता और सोमाय खुले आसमान के नीचे दो चौकियों पर लुढ़के थे। दोनों इतने लंबे चौड़े थे कि कोनिया-कोनी सोने पर भी उनके पैर चौकियों से बाहर निकल जाते थे। दंता बार-बार चौकी पर मुक्का मार रहा था जिससे धम-धम की आवाज हो रही थी। सुन्नैर को डर हुआ कि कहीं वह मुक्के मार-मार कर चौकी को तोड़ न दे। फिर उसने चौकी पर पैर पटकना शुरू कर दिया। अब सुन्नैर से रहा न गया। उसने छत से एक कंकड़ उठाकर दंता के पीठ पर दे मारा। पीठ पर जब कंकड़ गिरा तो वह अचानक उठकर बैठ गया और इधर-उधर देखने लगा। कोर्इ नहीं दिखा तो उसे लगा कि यह उसका वहम होगा। वह फिर लेटकर पैर पटकने लगा। सुन्नैर ने फिर कंकड़ चला दिया। इस बार दंता चौकी से उतरकर खड़ा हो गया और कौन-कौन चिल्लाने लगा? सोमाय भी दुआर के एक कोने से दूसरे कोने तक दौड़कर कंकड़ चलाने वाले को ढूँढ़ने लगा। सुन्नैर को इस खेल में मजा आ रहा था। उसने एक कंकड़ और चला दिया। इस बार दंता बुरी तरह बौखला गया। उसकी आवाज सुनकर सुन्नर और कमल नायक भी आँगन से भागकर दरवाजे पर आ गए। अपने पिता और भार्इ को आता देख सुन्नैर घबड़ा गर्इ और उठकर भागी। तभी दंता की नजर सुन्नैर पर पड़ गर्इ। वह हक्का-बक्का रह गया। इतनी सुंदर औरत उसने अपने जीवन में पहली बार देखी थी। उसे तो यह भी समझ नहीं आ रहा था कि औरत है या कोर्इ जादूगरनी या रूप बदलने में माहिर चुड़ैल। उसके मुँह से हठात निकला - मानुष छोकरी मोहनियाँ। जब कमल नायक और सुन्नर ने भी पूछा कि क्या हुआ तो उसने कहा - हम बाहर में नहीं सोएगा, यहाँ मानुष छोकरी मोहनियाँ है। मानुष छोकरी मोहनियाँ वाली बात किसी के समझ नहीं आर्इ सिवा सुन्नैर के जो खिड़की में छुपकर सारी बातें सुन रही थी, अपनी हँसी दबाने की कोशिश कर रही थी। बहरहाल दंता और सोमाय के सोने की व्यवस्था दरवाजे पर एक कोठरी में कर दी गर्इ, इस बार उन्हें चौकी के बदले दरी दी गर्इ ताकि वे फैलकर सो सकें।

सुन्नैर पूरी शाम खिलखिला-खिलखिला कर हँसती रही।

भैया लोग कहाँ से इस राकस को पकड़ लाए हैं। यह क्या कुंड खोदेगा, इसको तो मानुष छोकरी मोहनियाँ से डर लगता है। जिसको बाहर सोने में डर लगता है वह कैसा राकस?

सुन्नर ने उसे समझाने की कोशिश की कि इसकी बहादुरी थोड़े ही देखनी है। इससे तो कुंड खुदवाना है। मगर सुन्नैर तो दंता का मजाक उड़ाने पर तुली थी।

नकली राकस तो नहीं पकड़ लाए भैया?

ऐसे में सुन्नर को गुस्सा आ गया और उसने अपनी बहन को डाँट दिया। भार्इ का गुस्सा देखकर सुन्नैर चुप हो गर्इ, मगर वह जैसे बाहर गया सुन्नैर फिर शुरू हो गर्इ। ऐसा लग रहा था कि उसे दंता का मजाक उड़ाने की धुन सवार हो गर्इ है। रात खा-पीकर जब वह सोर्इ तब भी दंता का ख्याल उसका पीछा नहीं छोड़ रहा था। उसका जी चाह रहा था कि वह चुपके से जाए और दंता को फिर से परेशान करे। वह राकस को भी डरा सकती है इस ख्याल से वह फूले नहीं समा रही थी। उसने सबके सोने का इंतजार किया और चुपचाप योजना बनाती रही कि इस बार दंता को कैसे डराएगी। उसने सोचा कि क्यों न मानुष छोकरी मोहनियाँ ही बनकर उसको डराया जाए। जब रात आधी बीत गर्इ तो वह चींटी बनकर दंता के कमरे में घुस गर्इ, पहले उसने गुन मारकर सोमाय को ऐसी नींद में सुला दिया कि बज्र भी गिर जाए तो उसकी नींद न खुले। फिर वह अपने असली रूप में आ गर्इ और कमरे की रोशनी को तेज कर दिया। इसके बाद उसने दंता की मूँछ को जोर से खींचा, जैसे ही वह जगा सुन्नैर झट से पीछे आ गर्इ। जगने के बाद वह कौन-कौन चिल्लाने लगा तो सुन्नैर ने जादू से उसकी आवाज छीन ली। अब वह बोल तो रहा था, मगर उसकी आवाज सुन्नैर को छोड़ेकर कोर्इ दूसरा सुन नहीं पा रहा था। उसने सामने देखा तो सुन्नैर मुस्कुराती हुर्इ खड़ी थी। उसने फुसफुसाकर कहा - मैं हूँ मानुष छोकरी मोहनियाँ। सुन्नैर को देखकर दंता का पसीना छूटने लगा। उसने ठोकर मारकर सोमाय को जगाने की कोशिश की, मगर वह तो बेहोश था। दंता ने चाहा कि वह दरवाजा खोलकर बाहर भाग जाए मगर जब उसके रास्ते में सुन्नैर आ खड़ी हुर्इ तो उसकी हिम्मत नहीं पड़ी कि वह उसे रास्ते से हटा दे। दंता बुरी तरह डर गया था, उसे कँपकँपी आने लगी और अपनी चौकी पर ही वह बेहोश हो गया। सुन्नैर को काफी अफसोस हुआ। उसने छूकर देखा दंता का शरीर बुखार से तप रहा था। झट से बाहर से पानी लाकर वह दंता के माथे पर पट्टी करने लगी। जब दंता का बुखार उतरने लगा तो वह अपने कमरे में जाकर सो गर्इ।

अगले दिन सुबह उठते ही दंता राकस ने रट लगा दी, उसे उसके देस पहुँचा दो। यहाँ नहीं रहेगा, यहाँ मानुष छोकरी मोहनियाँ है जो जादू करती है। दंता की हालत देखकर सोमाय भी डर गया। उसने अपने सरदार को कभी इस हालत में नहीं देखा था। परानपुर वाले भी परेशान थे कि कैसा राकस है, इसको भी डर लगता है। रामचरित बाबू ने छूकर देखा तो दंता को उस वक्त भी थोड़ा सा बुखार था। उन्होंने दंता को समझाया कि यहाँ मौसम बदलने के कारण उसे बुखार हो गया है और कोर्इ बात नहीं। उसने बुखार की हालत में ही रात में सपना देखा होगा। वह उसे बुखार उतारने वाली जड़ी पिला देते हैं, शाम होते-होते उसकी तबीयत ठीक हो जाएगी। मगर दंता किसी शर्त पर वहाँ ठहरने के लिए तैयार हो ही नहीं रहा था। सारी मेहनत पर पानी फिर रहा था। उधर, यह सब देखकर सुन्नैर हक्की-बक्की थी। हँसी-हँसी में उसने ऐसी गलती कर दी थी जिसकी सजा अब पूरे गाँव को भुगतनी पड़ेगी। अब वह क्या करे? इस भूल को कैसे सुधारे?

उधर, दंता की बातें सुन-सुनकर सुन्नर को भी लगने लगा कि हो न हो किसी ने जरूर दंता पर टोना किया है। टोना किसने किया है यह पता लगाने के लिए सुन्नर ने ध्यान किया तो पता चला कि दंता के मन में भय किसी और ने नहीं बल्कि उसकी बहन सुन्नैर ने ही पैदा किया है। यह जानकर सुन्नर गुस्से से आग बबूला हो गया। उसने अपनी बहन को अकेले में बुलाया और डाँटते हुए पूछा कि यह तुमने क्या किया, हम सारे लोगों के मेहनत पर पानी फेर दी। सुन्नैर तो अपनी गलती पहले से ही मानकर बैठी थी। उसने अपने भार्इ को सारी बातें सच-सच बता दी। बहन की बातें सुनकर सुन्नर सिर पकड़कर बैठ गया। इस पर सुन्नैर ने कहा - मैंने बिगाड़ा है तो मुझे ही सुधारने का मौका दो। मुझे एक बार दंता से बात करने दो मैं उसे समझा दूँगी।

बहन की बातें सुनकर सुन्नर और बिगड़ उठा - तुम्हारी शादी तय हो गर्इ है और तुम इधर-उधर का काम करना चाहती हो?

तुमको अपनी बहन पर, उसके गुन पर भरोसा नहीं है भाय जो तुम इतना डरते हो। जो सुन्नैर दंता राकस को डरा सकती है, उसे मना भी सकती है। शायद यही विधि का विधान होगा। सोचो न इस काम में अगर मेरी कोर्इ जरूरत नहीं थी तो बाबा हम दोनों को कामाख्या क्यों ले गए?

सुन्नैर की बातें सुनकर सुन्नर सोच में पड़ गया। बात तो बहिन की ठीक है, मगर कैसे उसे खतरे में डाल दे।

अगर मैं भी साथ रहूँ तो क्या दिक्कत है?

फिर मैं कुछ नहीं कर पाऊँगी। तुम लोगों को देखकर मेरे मुँह से बोल नहीं फूटेगा। तुम बेफिक्र रहो, दंता कुछ नहीं करेगा।

आखिरकार सुन्नर को बहन की बात माननी पड़ी और उसने रामचरित बाबू और अपने पिता के सामने सारी बातें रखी। हालाँकि अपने पिता को इस बात के लिए तैयार करने में भी सुन्नर और सुन्नैर को काफी मशक्कत करनी पड़ी। रामचरित बाबू ने भी गारंटी ली, तब वे माने और दंता को कमरे में अकेला छोड़ दिया गया।

परानपुर की बेटी

परानपुर हवेली में आज फिर दरबार सजा था। दुआर के ओसरे पर दरी-जाजिम, गददा-मसनद लगा हुआ था। अँगना में परानपुर की जनता बैठी इंतजार कर रही थी कि आखिर उनके नायकजी ने आज शाम उन्हें क्यों बुलवा लिया है? बात जरूर दंता राकस और कुंड से संबंधित होगी, मगर कुछ अंदरूनी बात जरूर है नहीं तो बीच में बैठक करना जरूरी नहीं था। खुसुर-पुसुर शुरू थी, अनुमान लगाए जा रहे थे। मगर असली बात का पता चल ही नहीं पा रहा था। हवा में उड़ती-उड़ती खबर आर्इ कि दंता राकस मान गया है, आज सुबह ही अपने गाँव लौटा है। बहुत जल्द एक हजार दैत्यों के झुंड के साथ लौटेगा और पाँच दिन में पाँच कुंड खोदकर रख देगा। रामचरित बाबू तो गए ही हैं, साथ में कदम पहलवान और अखिल को भी भेजा गया था कि अगर वहाँ पहुँचने के बाद दंता का मन बदलने लगे तो उसे मनाकर ले ही आना है। राकस लोगों की बोली का भी कोर्इ भरोसा है... इनसान और राकस में बहुत फर्क होता है।

नहाए-धोए, झक-झक कुरता-धोती पहने, सिर पर पगड़ी बाँधे दोनों नायक बाप-बेटे बाहर आए। बरामदे पर बैठ गए और जमीन पर बैठे दो-तीन बुजुर्गों को आग्रह करके ऊपर बुला लिया। आज पहली बार परानपुर वालों ने देखा कि सुन्नर नायक बीच में बैठे थे और उनका मुरेठा (पगड़ी) कमल नायक के मुरेठा से थोड़ा ऊँचा था। लोगों में खुसुरपुर मच गर्इ, बुजुर्गों ने फुसफुसाकर लोगों को बताया यानि अब से सुन्नर ही नायक हुआ और कमल नायक केवल उसको सलाह देंगे। परानपुर हवेली में इसी तरह नायक बदलते आए थे। सारे फैसले अंदर की कोठरियों में खानदान वाले आपस में कर लेते थे। बाहर घोषणा तक नहीं की जाती, लोग हाव-भाव से ही अंदाज लगाया करते थे। कमल बाबू ने भी सही समय पर अपने बेटे को जिम्मेदारी दे दी। लोगों ने मान लिया, सचमुच सही फैसला लिया है, इतना बड़ा काम करना है, सुन्नर को ही करना है। अगर पूरा अधिकार नहीं मिला तो वह कैसे काम करेगा।

मूँछों के नीचे छुपी गर्व भरी मुस्कुराहट लिए सुन्नर ने बैठक की कमान सँभाल ली। वह इस तरह लोगों को संबोधित करने लगा जैसे वह यह काम बहुत पहले से करता आया हो। जैसे उसका जन्म ही इस काम के लिए हुआ हो। शब्दों में कहीं अनुभवहीनता की लड़खड़ाहट नही थी। आवाज में भी झिझक भरी कँपकँपी नहीं थी। अब तो यही करना ही है, शरमाने से क्या फायदा।

तो, भाइयों अब हमारा काम पूरा होने वाला ही है, जैसा कि मैं हमेशा आप लोगों से कहता आया था। दंता राकस को तैयार करा लिया गया है। वह और उसके एक हजार राकस चेले-चपाटी बहुत जल्द यहाँ आ जाएँगे। वे लोग पाँच कुंडों की खुदार्इ करेंगे, पाताल से पानी निकालेंगे। पाँच कुंडों की खुदार्इ में पाँच दिन लगेंगे। इसके बाद आप लोगों को, हम लोगों को पीने के लिए, स्नान ध्यान के लिए और खेत-पथार की सिंचार्इ के लिए पानी की कमी नहीं होगी। हिसाब से खर्च कीजिएगा तो अगली बरसात तक कुंडों में एक तिहार्इ पानी बच ही जाएगा।

फिर उसने पानी हिसाब से खर्च करने की विधियों और उसके फायदे पर लंबा व्याख्यान दिया, जिसमें उसने राजमहल इलाके में देखे अपने अनुभवों का उदाहरण भी पेश किया कि कितने कम पानी में लोग कैसे काम चलाते हैं। कोसी मइया के सदाब्रत के कारण हम लोगों को रईस की तरह पानी खर्च करने की आदत हो गर्इ है। हम लोगों को अब अपनी आदत बदलनी पड़ेगी।

अंत में उसने रामचरित दास, कदम पहलवान, अखिल समेत उन तमाम लोगों का जिक्र किया जिनके कारण यह काम संभव हुआ। कामरूप कामाख्या के तांत्रिक बाबा यानि अपने गुरु को विशेष रूप से याद किया।

फिर उसने कहा कि हवेली वालों ने इस काम के लिए क्या किया है, यह बताने की जरूरत नहीं लोग अच्छी तरह समझते हैं। वह इसका उल्लेख भी नहीं करता अगर उसकी बहन और पूरे गाँव की दुलारी सुन्नैर के जीवन की बात न होती। फिर उसने बताया कि सुन्नैर ने इन कुंडों के लिए कितना बड़ा त्याग किया है। उसकी शादी तय हो चुकी है, धरमपुर का देवपुत्र जैसा दूल्हा उसे मिलने वाला है। शादी का दिन दिखाया जा रहा है। उसको तो घर में रहना चाहिए, सूरज भगवान से भी छुप कर। मगर उसने अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया।

राकसों का सरदार दंता राकस किसी बिध से कुंड खुदार्इ के लिए मान ही नहीं रहा था। उसको हमने सब लोभ-लालच दिया, सोना-चाँदी का, जमीन-जायदाद का, मगर वह नहीं मान रहा था। लौटने को तैयार था, तब बलिहारी उस परानपुर की बेटी की जिसने कामरूप कामाख्या में सीखे ज्ञान को सकारथ कर दिया। उसने अपने प्रेम के बज्जर बाँध में दंता को बाँध लिया। तब दंता ने कहा रात में जब तक कुंड की खुदार्इ होगी सुन्नैर को वहाँ नाचना पड़ेगा और कुंड खुदार्इ के बाद वह उसको ब्याह कर अपने साथ अपने गाँव ले जाएगा। उसकी बात सुनकर तो हम लोगों के तरवा का खून मगज में चढ़ गया। एक बार तो मन हुआ भाड़ में जाए कुंड खुदार्इ, दंता को मारकर यहीं गाड़ देंगे। उसने सुन्नर नायक की बहन से शादी का सपना कैसे देख लिया। मगर तभी सुन्नैर ने इशारे से मुझे बुलाकर एकांती में कहा कि भैया, कुंड खुदवा लेते हैं, इसके बाद शादी करना नहीं करना तो अपने हाथ में है।

तो मेरे भाइयों, मेरी बहन ने इतनी बड़ी कुर्बानी दी है। आप लोग तो उसको रोज दंता राकस से नैन मटक्का, चुहुलबाजी करते हुए देखेंगे। मन में तो जरूर सोचेंगे कि परानपुर हवेली की बेटी कैसी कुलबोड़नी है। है कि नहीं?

क्या बात करते हैं सुन्नर नायक? भीड़ से लोगों की आवाज गनगनाती हुर्इ निकली।

जो ऐसा सोचेगा, उसके सात कुल का नाश हो जाएगा।

सुन्नैर पूरे परानपुर की बेटी है नायकजी, उसके बारे में किसके मन में ऐसा पाप आएगा?

आपने ऐसा कैसे सोच लिया नायकजी?

लोगों की बात सुनकर कमल नायक से रहा न गया।

आज आप लोगों की बात सुनकर हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो गया। सुन्नैर ठीक कहती थी, अगर आदमी सही काम करने के लिए कोर्इ भी खतरा उठाता है तो उसका कभी नुकसान नहीं होता। अब आप लोग इस दुआर से आशीर्वाद देकर जाइए कि यह काम शुभ-शुभ बीत जाए। सुन्नैर की प्रतिष्ठा पर इससे आँच न आए और उसका विवाह धूम-धाम से हो।

उधर, खिड़की के पीछे बैठकर लोगों की बात सुन रही सुन्नैर के आँखों से आँसू की कतार बह निकली थी। सचमुच अपने गाँव के लोगों की बात ही निराली है। एक-एक इनसान उसे अपना हिस्सा मानता है। उस पर जान देने को तैयार रहता है। इन लोगों के लिए वह कुछ भी कर ले कम ही होगा। भैया को कुछ कहने की जरूरत ही नहीं थी। और भैया का व्यवहार भी कितना बदल गया है।

सुन्नैर को याद आ गर्इ उस दिन की बात जब वह दंता से बात कर निकली थी और भैया से बताया था कि दंता ऐसी बातें कह रहा है। अंदर ही अंदर वह काँप रही थी, कि वाकर्इ उसने कितना बड़ा खतरा मोल ले लिया। उस वक्त भइया के मुँह से एक ही सवाल निकला था - मान गया न दंता?

मगर भैया उसकी शर्त क्या मानी जा सकती है?

मैं जानता हूँ, साधारण लोगों के बस की बात नहीं है मगर तुम कर सकती हो। बस पाँच रातें काटनी है, फिर दंता राकस को मैं सँभाल लूँगा। शादी तुम्हारी राघव से ही होगी।

वह उसकी बातें सुनकर ठगी सी रह गर्इ। अब इसका क्या जवाब हो सकता है?

और आज मुझे पता चला कि मुझे किसी को प्रेम बज्जर में बाँधना भी आता है। खैर जो भी होगा मैं कर लूँगी। अब मुझे किसी बात का डर नहीं है, क्योंकि पूरा परानपुर मेरे साथ है।

राकस कुल का झगड़ा

दंता सरदार के घर में कोहराम मचा था। उसकी घरवाली हिरन्नी रानी चीख-चीखकर सबको बता रही थी कि उसकी किस्मत ही खराब है जो इस आदमी के साथ घर बसाया। पहले तो महुआ के पोचाय के चक्कर में यहाँ ले आया अब गंगा पार की मानुष छौड़ी मोहनिया के फेर में पगला गया है। जब से आया है, सुन्नैर-सुन्नैर जपे जा रहा है। असल बाप की बेटी हूँगी तो इसे इस बार गंगा पार करने नहीं दूँगी।

दरअसल, परानपुर से लौटने के बाद दंता ने घर में आकर बता दिया था कि दो-तीन दिन के अंदर फिर से वहाँ जाना है। हिरन्नी ने पूछा - किस बात पर मामला तय हुआ तो भोले-भाले दंता ने सारी बात अपनी घरवाली को बता दी। इस पर हिरन्नी बिफर उठी। दंता सरदार में बंद कर दिया और कुंडी लगाकर बैठ गर्इ। खिड़की से दयनीय सूरत बनाकर दंता हर किसी से गुहार लगा रहा था, कि किसी तरह उसकी मूरख पत्नी को समझाकर उसे बाहर निकालो। उसे बहुत सारा काम करना है, वह अगर तीन दिन के अंदर परानपुर नहीं पहुँचा तो मानुष छोरी मोहनिया सिर पटक-पटककर जान दे देगी।

धीरे-धीरे इस बात की खबर राजमहल में मौजूद पूरे राकस कुल को लग गर्इ। सभी उसके दरवाजे पर जमा होने लगे। औरतों को जमाकर हिरन्नी अपनी बात सुनाने लगी और मर्द दंता की खिड़की के पास जुटने लगे। धीरे-धीरे महिलाओं और पुरुषों के अलग-अलग गुट बनने लगे। महिलाएँ दंता और अपने कुल के दूसरे राकसों के परानपुर जाने का विरोध करने लगी तो पुरुष सुन्नैर से दंता की शादी में हिरन्नी के हस्तक्षेप को नाजायज ठहराने लगे।

पुरुषों का कहना था कि राकस कुल के कानून के मुताबिक कोर्इ भी चाहे मरद हो या औरत किसी से भी प्रीत जोड़ने और शादी करने के लिए स्वतंत्र है। कोर्इ भी आदमी कितनी भी शादी कर सकता है और अगर औरत को यह बात पसंद न आए तो वह भी दूसरे से विवाह कर सकती है। ऐसे में हिरन्नी का दंता को रोकना अनुचित है। जबकि औरतों के मुताबिक अगर दंता किसी राकस कुल की महिला से विवाह करता तो उस पर कोर्इ आपत्ति नहीं थी। मगर मानुष छोरी मोहनिया के मोह में फँसकर हर कोर्इ दूसरी शादी करने लगा तो राकस कुल की औरतों का क्या होगा?

मरदों के पास औरतों के इस सवाल का भी जबाव था। कोयला खदान के कर्मचारी कर्इ बार राकस कुल की लड़कियों को बहला फुसला कर रख लेते हैं। इस पर तो कोर्इ विरोध नहीं करता, फिर दंता सरदार की पसंद का विरोध क्यों? हिरनिन रानी नया नियम बनाने की कोशिश कर रही है।

राकसों का झगड़ा देर तक चलता रहा। फैसला न होता देख दूर से झगड़े का मजा ले रहे बूढ़े-बूढ़ी मैदान में उतर आए। आखिरकार उन्होंने फैसला निकाल दिया। अगर दंता हिरन्नी रानी से उसका अधिकार न छीने तो उसे मानुष छोरी मोहनियाँ लाने दो। अपने कुल के लिए अच्छा ही है। हम लोगों को सब दिन मानुष से ही काम पड़ता है, वह रहेगी तो हम लोगों को कोर्इ ठगेगा नहीं। फिर पुराने लोगों ने भी कहा है, दूसरे कुल जात की घरवाली लाने से कुल सुधरता है। बुजुर्गों की इस राय के बाद तो मरदों ने हो हल्ला करके औरतों को चुप करा ही दिया। फिर दंता सरदार को हिरन्नी के कब्जे से मुक्त कराकर बाहर निकाला गया और योजना बनने लगी कि परानपुर कौन-कौन जाएगा, कैसे जाएगा?

मानुष छोरी मोहनिया के नाम पर सब नौजवान राकस उछल-उछल कर नाच-गा रहे थे। सोमाय एक-एक कर उसकी खूबसूरती का नक्शा बताता और राकस मर्द हर बात पर खुश होकर ताली बजाते।

हिरन्नी रानी से यह नजारा देखा न गया। वह अपने बेटे को उठाकर अंदर चली गर्इ। घर के अंदर से दंता के बेटे ने अपने पिता को पुकारा मगर आज दंता सरदार का ध्यान अपनी घरवाली और बेटे की तरफ नहीं था। कर्इ बार पुकारने पर भी जब उसने पलटकर नहीं देखा तो हिरन्नी ने अपने बेटे को चुप कराते हुए कहा - मत रो बेटा। तेरा बाप तेरे लिए नर्इ माय लाने जा रहा है। वह सोने के कटोर में खीर भर कर तुम्हें खिलाएगी और हाथ के इशारे से चंदा को धरती पर बुलाएगी। माँ की बातों से बेटे का दिल तो बहल गया पर हिरन्नी की आँखें फिर से गीली हो गर्इ।

कुंड खुदार्इ की पहली रात

कुंड खुदार्इ की पहली रात की कथा कहते हुए सुरपति जरा गंभीर हो गए। बोले - पुराने पूर्णिया जिले में कर्इ ऐसे कुंड हैं जिनके बारे में आज भी कहा जाता है कि इन कुंडों को राक्षसों ने अपने दाँत से खोदा है। ऐसे कुंडों को आम तौर पर 'दैता पोखर' के नाम से पुकारा जाता है। लोग-बाग इन तालाबों का उपयोग तो करते हैं, मगर इन तालाबों की खुदार्इ की कहानी पता करने से हिचकते हैं। क्योंकि कहा जाता है कि जो इन तालाबों की खुदार्इ की कहानी जानना चाहता है, या तो बीमार पड़ जाता है या असमय काल कलवित हो जाता है। ऐसा लगता है कि ये कहानियाँ इसलिए फैलार्इ जाती होगी क्योंकि इनके पीछे न सिर्फ दंता राकस बल्कि सुन्नैर नैका और हिरन्नी रानी की दुखभरी कहानियाँ छुपी होती है। कोर्इ समाज इन कहानियों को सामने आने नहीं देना चाहता। खैर...

वह दिन आ ही गया जब परानपुर की धरती पर कुंडों की खुदार्इ शुरू होने वाली थी। गाँव में हलचल मची थी। हर गंभीर और जानकार आदमी व्यस्त था, कोर्इ फुरसत में नजर ही नहीं आता था। अखिल ने महसूस किया कि आज उसका गाँव भी मनिहारी घाट में बदल गया है, जहाँ किसी को किसी की बात सुनने की फुरसत नहीं थी। कुंडों के लिए जगह निर्धारित किए जा चुके थे। चार कुंड गाँव के चारों कोने पर और एक बीचो-बीच। चार सिंचार्इ और नहाने के लिए तो एक बीच वाला पीने के लिए। पूर्णिया से एक पंडित बुलवाए गए थे जो सुबह से ही कुंड का नक्शा बनाने में जुटे थे। घेरा कितना चौड़ा होगा। पहाड़ कितनी ऊँचा होगा, बरसात का पानी किस रास्ते से अंदर जाएगा। नहाने का घाट और जानवरों को पानी पिलाने का घाट अलग-अलग होना चाहिए। सिंचार्इ के लिए पानी निकालने का रास्ता अलग। कुंड के एक कोने पर किसी भगवान का मंदिर होना चाहिए। उनके नक्शे के हिसाब से जहाँ-जहाँ खुदार्इ होने वाली थी वहाँ भी जमीन पर नक्शा खींचा जा रहा था। सारा काम हर हाल में सूरज डूबने से पहले खत्म कर लेना था। क्योंकि रात को दंता और उसके एक हजार राकस खुदार्इ का काम शुरू करने वाले थे।

उधर, दंता और उसके राकसों की देखभाल का काम भी कम बड़ा नहीं था। जब दो राकस ने दो दिन में परानपुर वालों के नाक में दम कर दिया था तो ये तो एक हजार एक राकस थे। सब अलग-अलग मिजाज वाले। सबसे बड़ी समस्या तो यह थी कि इन सबों को एक जगह रखा कैसे जाए। क्योंकि एक बार ये गाँव में घुस गए तो पूरे गाँव को ही उजाड़-पुजाड़ के रख देंगे। इसलिए इनके रहने की व्यवस्था गाँव से बहुत दूर की गर्इ थी और वहाँ महुआ और चावल से बनी शराब और खस्सी के मांस की प्रचुर मात्रा में व्यवस्था की गर्इ थी। उनके मनबहलाव के लिए नाच पार्टियों की भी व्यवस्था की गर्इ थी। वहाँ व्यवस्था सँभाल रहे कदम पहलवान का कहना था कि यही समझ लीजिए भोले बाबा की बारात है। संजोग अच्छा था कि नाच पार्टियों का नाच राकसों को पसंद आ गया था जिस कारण वे बाहर घूमने-फिरने की जिद नहीं कर रहे थे और शराब पी-पीकर झूम रहे थे।

गाँव की औरतें कुंड खुदार्इ से पहले होने वाले भूमि पूजन की व्यवस्था में जुटी थीं। फूल तोड़ना। पिठार पीसना। चंदन और रोली का इंतजाम। प्रसाद के लिए गेंहू और चावल को कूटकर पीसना। फलों की व्यवस्था। मिठाइयों को तलना-सेंकना। पंडित और पुजगरी के लिए धोती रंगकर तैयार करना। पूजा के भी कम झमेले थोड़े ही होते हैं; मगर पुरुष कहेंगे यह भी कोर्इ काम है, हल्लुक मैट बिलायर कोड़े - यानि चालाक बिल्ली तो हल्की मिट्टी कोड़ने का काम ही अपने लिए चुनती है।

इन कामों की व्यवस्था के बाद गाँव में जो लोग बच गए थे उनके पास भीड़ लगाकर यह देखने का काम था कि काम कैसे हो रहा है। फिर इनकी मीमांसा और इस बात की योजना बनाना भी कम बड़ा काम नहीं था कि किस कुंड से उनके खेतों तक सिंचार्इ का पानी पहुँचेगा और उसे किस रास्ते से ले जाना ठीक रहेगा। और रास्ते में जिनके खेत पड़ेंगे उनमें से किसी से उनका झगड़ा तो नहीं चल रहा, नहीं तो आर से पानी भी टपाने नहीं देगा। और पानी आने पर कौन-कौन से फसल उगाए जा सकेंगे और उन्हें कहाँ-कहाँ बेचा जा सकता है। और किसी कुंड में मछली पालने की व्यवस्था हो रही है या नहीं। नायकजी के सामने यह प्रस्ताव भी रखना चाहिए। और सुनते हैं धरमपुर वाले तो पोखरों में मखान भी उगाते हैं। और पाँचों कुंड तैयार हो जाने के बाद सुनते हैं कि धमगिज्जर (जबरदस्त) भोज होने वाला है। और राकसों को देखा, साले राकस, राकस ही हैं, वैसी ही बोली-बानी वैसा ही भेस। नहीं! देखा नहीं, दाँत कितने बड़े हैं - सुनते हैं दाँत से ही कुंड खोदेंगे। नजदीक नहीं जाना उसी दाँत से तुमको भी चिबा जाएँगे।

मगर परानपुर हवेली के दुमंजिला के एक कमरे में आईने के सामने सुन्नैर चुपचाप बैठी थी। यह उसके लिए महज एक आईना नहीं, बचपन का साथी था। उसने जबसे होश सँभाला था हर किसी से अपने रूप की तारीफ ही सुनी थी। इसी तारीफ ने उसे बचपन से ही आईने के सामने बैठने की आदत लगा दी। किशोरावस्था में वह इस आईने के सामने बैठकर निहारा करती थी कि आखिर लोगों को उसके चेहरे में क्या पसंद आता है? कहीं लोग उसका मन रखने के लिए झूठी तारीफ तो नहीं करते हैं? मगर जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गर्इ उसकी समझ में आता गया कि इस सुंदरता की तारीफ का नशा महज छलावा है। यह नशा उसके जीवन को अंदर से खोखला बनाता जा रहा है। इसने उससे जीवन की सरलता छीन ली है और असहजता थोप दी है। उसके सारे मित्र छीन लिए और अकेलापन का उपहार सौंप दिया। इसके बावजूद आईने से उसकी दोस्ती कभी खत्म नहीं हुर्इ, उसके पास कोर्इ दोस्त भी तो नहीं था जिससे वह अपने मन की व्यथा सुना पाती। इसलिए जब भी वह बहुत खुश होती या दुखी होती तो इसी आईने के सामने आ बैठती।

लोग समझते कि उसे बचपन से ही सजने-धजने का शौक है, वही कर रही होगी। पर अगर वह बिंदी लगाती तो आईने को बता रही होती कि देखो मैं कितनी खुश हूँ और अगर काजल लगाती तो आईना समझ जाता कि वह अपने आँसू छुपाने की कोशिश कर रही है। आज भी जो मौका उसके सामने आया था उसने फिर उसे आईने के सामने बैठने को मजबूर कर दिया था। उसके सामने एक तेजी से बीत रहा दिन और कभी खत्म न होने वाली रात खड़ी थी। वह न दिन को रोक पाने में सक्षम थी और न ही रात को सह पाने में। शराब के नशे में धुत्त एक हजार एक राकसों के अश्लील इशारे-फिकरे, भेदती आँखें, किलकारियाँ, छूने और बाँहों में भर लेने की कोशिशें। उसे हर एक चीज के बारे में अभी इसी वक्त सोच लेना और उसका कष्ट इसी कमरे में झेल लेना होगा, ताकि रात को जब यह सब होगा तब मुस्कुरा सके। उसे अपने सारे आँसू इसी अकेले कमरे में बहाने होंगे और वहाँ उनके सुर में सुर मिलाकर ठहाके लगाने होंगे। हालाँकि सुन्नर ने ऐसा इंतजाम किया था कि कोर्इ राकस उसे छू भी न पाए। कुंड की जमीन के चारो ओर उगे दस पेड़ों पर इलाके के सबसे नामी तीरंदाज होंगे जो उसके तरफ बढ़ रहे हाथ को एक तीर में तन से जुदा कर देंगे। खुद उसके पास भी क्या कम गुन थे जो उसे किसी और के सहारे की जरूरत थी, कामरूप कामाख्या की पढ़ी-पढ़ार्इ लड़की थी वह। उसे उसकी मरजी के बगैर भला कौन छू सकता था। मगर यहाँ सवाल उसकी इज्जत और उसकी ताकत का नहीं बल्कि पाँच कुंडों की खुदार्इ का था। पाँच रातें उसे ऐसे काटनी थी कि साँप भी मर जाए और उसकी लाठी भी बच जाए। हाय रे, उसका सुनहरा शरीर। कितने दीवाने थे इस शरीर के। राघव से लेकर दंता तक और उनके हजार राकस तक। कितनी औरतें उसके इस रूप ज्वाला को देखकर जल जाती होंगी, मगर उन्हें क्या पता इस ज्वाला के साथ जीना कितना खतरनाक है। इन लपटों के बीच वह अपने दामन को हर कदम पर बचाती हुर्इ कितनी अकेली है? सवा लाख लुटेरों और डेढ़ लाख पहरेदारों के बीच खड़ी इस सुन्नर के पीठ पर कोर्इ नहीं है। दंता राकस तो चाहता ही है कि सुन्नैर नाचे, मगर दंता राकस के हाथों से उसे बचाने वाले पहरेदार और तीरंदाज भी कहाँ चाहते हैं कि सुन्नैर नहीं नाचे। इस बड़े परिवार और कुल खानदान में कोर्इ क्यों नहीं कहता कि सुन्नैर नहीं नाचेगी? हर किसी के चेहरे पर विवशता के ताले लटके हैं। उसका भार्इ, उसके पिता और तो और उसकी माँ भी। आँखों में दया और होठों पर विवशता। जैसे सुन्नैर का जन्म नाचने और राकसों को मोहने के लिए ही हुआ है। र्इश्वर ने उसका चेहरा गढ़ते वक्त कोर्इ भूल क्यों नहीं कर दी? उफ! वह क्या सोचे जा रही है? उसे खुश होने की कोशिशें करनी चाहिए, क्योंकि उसका यह शरीर अकाल पीड़ित परानपुर में खोदे जा रहे पाँच पतालिया कुंडों की कीमत है। उसकी एक आँख से एक इकलौता आँसू बह निकला, दूसरी आँख सूखी थी क्योंकि वह नैन मटक्का की तरकीब सीखने में व्यस्त थी।

आखिरकर सूरज ढल ही गया और दिन भर काम में जुटे लोगों ने राहत की साँस ली कि ससमय लक्ष्य पूरा हो गया। धीरे-धीरे पूरा परानपुर गाँव चीटियों की तरह घिसटता उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा। नहार्इ-धोई, चटकदार साड़ियों में लिपटी और हाथ में पूजा की थाली लिए औरतें सुर से सुर मिलाकर मगलगान गा रही थीं, जबकि महीनों बाद बक्से से निकाले गए सफेद और सुनहले कुरतों में गाँव के मरदों के कंधों पर उनके बच्चे सवार थे और उनके सवालों की पोटलियाँ खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। परानपुर हवेली से भी चार-चार रथ एक साथ बाहर निकले। सबसे आगे पुराने नायक कमलजी का रथ था फिर नए नायक सुन्नर का उससे पीछे वाले रथ पर परिवार की औरतें दादी और माँ और सबसे आखिरी रथ पर पूजन और प्रसाद सामग्री के साथ सुन्नैर नैका। इन रथों के आगे-पीछे और दाएँ-बाएँ हवेली के नौकरों का हुजूम चल रहा था।

जब यह रेला खुदार्इ स्थल पर पहुँचा तो वहाँ सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं। कुंड के चारो ओर रंगीन पताके लगे हुए थे। खुदार्इ स्थल पर अलग-अलग रंग के फूल और पत्तों से कर्इ निशान बनाए गए थे। बीचो-बीच पूजन स्थल बना था, जहाँ अभी तुरंत घोड़ागाड़ी से उतरकर सुन्नैर पिठार से अर्पण बनाने वाली थी और उसके बाद वहाँ पूजन साम्रगी, प्रसाद और आसन सजा दिए जाते। कुंड खुदार्इ वाले जमीन के चारों ओर रस्से बाँध दिए गए थे ताकि देखने वाले लोग अंदर घुसकर काम को बाधित न कर सकें। दक्षिणी कोने में एक फूस का बड़ा सा चौखड़ा बना था जिसमें हवेली के निवासी और सभी गणमाण्य अतिथि बैठने वाले थे। कुंड का नक्शा बनाने वाले पंडितजी ही कुंड खुदार्इ की पूजा भी कराने वाले थे। हवेली के रथों के पहुँचने और दोनों नायकों द्वारा सारी व्यवस्था का निरीक्षण करने के बाद कार्यवाही शुरू हो गर्इ। सुन्नर नायक पूजा पर बैठ गए और पंडित जी ने हवन कराना शुरू कर दिया।

हवन पूजन के बाद जब प्रसाद वितरित हो रहा था, तब ढोलाही देने वालों ने घोषणा की कि प्रसाद पाने के बाद परानपुर का हर आम ओ खास आदमी खुदार्इ स्थल से वापस लौट जाए और तब तक वापस न आए जब तक हवेली परानपुर की ओर से सूचना न दी जाए। इस दौरान अगर कोर्इ इनसान बिना खास अनुमति के यहाँ भटकता पाया गया उसे गिरफ्तार कर कड़ी से कड़ी सजा दी जाएगी और अगर कोर्इ इनसान यहाँ भटकने के दौरान राकसों का ग्रास बन गया तो इसकी जिम्मेवारी भी हवेली परानपुर की नहीं होगी। इस घोषणा के बाद धीरे-धीरे वहाँ से भीड़ छँट गर्इ और कुंड खुदार्इ के विशेषज्ञ पंडितजी व उनके सहायकों के अतिरिक्त कोर्इ न रहा। एक संदेश वाहक को पहले ही कदम पहलवान के पास भेज दिया गया था कि शाम ढलने के बाद वह दंता सरदार और उसके राकसों को लेकर वहाँ आ जाए।

राकसों को वहाँ तक लाना भी आसान काम नहीं था। हालाँकि उन्हें जिस रास्ते से लाया जाना था वह लगभग निर्जन था। इसके बावजूद दोनों ओर कुछ दूरी पर कर्इ तीरंदाजों को झाड़ियों में छुपाकर बैठा दिया गया था ताकि अगर कोर्इ राकस लीक छोड़कर इधर-उधर भागने या गाँव में घुसने की कोशिश करे तो जहर बुझे बाण से उसका काम तमाम किया जा सके। राकसों के साथ-साथ दोनों तरफ हथियारबंद सिपाही थे उन्हें सही राह पर जबरन ले जाने के लिए। राकसों को यह कहाँ लग रहा था कि वे कुंड खुदार्इ के लिए जा रहे हैं, वे उस मानुष छोरी मोहनियाँ का नाच देखने जा रहे थे जिसने उसके सरदार को मोह लिया था और उससे शादी का वादा किया था। पूरे रास्ते वे देखबौ गे देखबौ मानुष छोरी मोहनियाँ कहते हुए खुशी से उछल पड़ते थे।

दंता जब पहुँचा तो देखा सुन्नैर का कहीं नामोंनिशान नहीं था। इस पर दंता और उसके साथ भड़क उठे, उन्होंने शर्त रख दी कि जब तक सुन्नैर नाचने नहीं आएगी वे काम शुरू नहीं करेंगे। योजना यह थी कि सुन्नैर को रात होने पर बुलाया जाएगा। मगर राकस किसी तरह तैयार नहीं थे। वहाँ मौजूद सारे लोग हार मान चुके, अंत में पंडितजी की तरकीब काम आर्इ, उन्होंने कहा कि सुन्नैर का कहना है जब चाँद निकलेगा वह तभी आएगी, अँधेरे में नाचने का क्या फायदा। इस पर राकस तैयार हो गए और उन्होंने कुंड की खुदार्इ शुरू कर दी।

रात का पहला पहर जब खत्म होने को था सुन्नैर का रथ वहाँ पहुँचा। वह नीचे उतरी और चुपके से उस टीले पर चली गर्इ जो खास तौर पर उसके नृत्य के लिए बनाया गया था। चाँदनी खिल उठी थी। सुन्नैर के साथ पहुँचे साजिंदों ने साज बजाना शुरू किया तो राकसों की निगाहें एक साथ उस मंच की ओर उठी जहाँ लाल और हरे रंग घघरी और चोली में और गुलाबी रंग की झीनी चुनरी ओढ़ी एक मूरत खड़ी थी, चाँदनी की दुधिया रोशनी में उसके बदन पर जड़े तमाम सलमा-सितारे जगमगा रहे थे।

सभी राकसों के मुँह से एक साथ फूट पड़ा - ऐलौ रे ऐलौ! मानुष छोरी मोहनियाँ।

कदम पहलवान, पंडित और उसके सहयोगी तत्काल अपने लिए वहाँ बनी कोठरी में जाकर बैठ गए।

मूरत ने एक पैर आगे निकाल पर धरती पर पटका तो छम्म की आवाज हुर्इ। दानवों ने एक साथ धरती पर कुदाल पटकी-खच्च। मूरत ने फिर छम्म किया, राकसों ने फिर जबाव दिया - खच्च। दम रोके सदमें में खड़ी सुन्नैर को इस छम्म-छम्म और खच्च-खच्च का तुक ठीक लगा। ऐसा लग रहा था जैसे छम्म के ताल पर खच्च का जबाव मिल रहा हो। सुन्नैर के मन का तनाव एक पल में दूर हो गया। उसने झट से अपने सिर पर पड़ा दुपट्टा हवा में लहरा दिया। उसकी एक झलक पाकर राकस निहाल हो गए और जबाव में उन्होंने एक साथ कर्इ बार कुदाल धरती में गड़ा दिए।

सभी राकस एक सुर में गाने लगे -

          हेगे-हेगे मानुष छोरी मोहनिया,
          हेबे-हेबे दंता के कनिया।।

इस बार राकसों के बोल ने सुन्नैर को परेशान नहीं किया। उसे लगा जैसे वह बच्चों के बीच खेल और उन्हें खेला रही हो। उसके हर ताल पर राकस झूम उठते और हर बार जबाव में जरूरत से ज्यादा बार कुदाल चलाते। वे खुशी से जरूर किलक उठते मगर किसी ने एक बार भी अश्लील इशारे नहीं किए। उसके पास आना तो दूर कोर्इ अपनी जगह से इधर-उधर हिलता भी नहीं था। दंता सरदार तो और कमाल था। उसने तो शायद एक बार भी नजर उठाकर उसकी तरफ देखा नहीं था, राकस बंधु उसके शर्मीलेपन का मजाक उड़ा रहे थे। पता नहीं लोग क्यों इन्हें राकस कहते हैं? इनसानों की बस्ती में भी कोर्इ इनके जैसा शर्मीला कहाँ नजर आता है। सुन्नैर को लगा कि अगर सब कुछ इसी तरह चलता रहा तो वह रात भर इनके लिए नाच सकती है।

सुन्नैर के नाच पर मदहोश होकर राकसों ने रात के तीसरे पहर में ही पाताल तक खोद डाला और थोड़ी ही देर में कुंड में पानी छहछहाने लगा। फिर राकस थककर वहीं जमीन पर सो गए और पंडितजी ने सहयोगियों के साथ मोरचा सँभाल लिया। सुबह होते-होते उन लोगों ने अपनी योजना के अनुसार कुंड को सजाकर तैयार कर दिया। सुन्नैर आधी रात बीतने के बाद घर लौट चुकी थी, ब्रह्म मुहूर्त में ही उसे खबर मिल गर्इ। उससे रहा नहीं गया, कुंड में कुलबुलाते पानी के सोते और पंडितजी के सहयोगियों की कारीगरी को देखने फिर से दौड़ी-भागी पहुँच गर्इ। जब पहुँची तो सूरज निकल और चाँद डूब रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कुंड के जल में पिघला हुआ सोना और चाँदी एक साथ घुल रहा हो। देखकर सुन्नैर का मन तिरपित (तृप्त) हो गया। बरसों की साध पूरी हुर्इ। पहले झुककर उसने उँगलियों में उस शुभ जल को भरा। फिर हथेली में भरकर सिर पर छिड़क लिया। पंडितजी ने महसूस किया कि यह कोर्इ और सुन्नैर थी, वह सुन्नैर नहीं जो कुछ प्रहर पहले इन राकसों के सामने नाच रही थी और उसके हर खच्च-खच्च का जबाव अपने घुँघरुओं की छम-छम से दे रही थी। यह तो परानपुर हवेली की लक्ष्मी थी जो हर समृद्धि को संस्कार देने में सक्षम थी। निश्चय ही यह किसी देवपुत्र की ही अधिकारिणी थी, वैसे भी जिस देवपुत्र को इसका साहचर्य हासिल होगा वह अपनी किस्मत को न सराहा तो मूर्ख ही होगा। कुंड के तट पर कुछ देर तक नमन की मुद्रा मंम खड़े रहने के बाद वह किसी मछली की तरह पानी में उतर गर्इ। उसके हाथ में किसिम-किसिम के पुरइन के पौधे थे। उन्हें एक-एक कर कुंड के हर कोने में उसने फैला दिया। तब तक राकसों की नींद सूरज की रोशनी से खुल गर्इ थी और वे मुँह बाए इस नजारे को देख रहे थे। रात भर की उनकी मेहनत का वह खूबसूरत नजारा और उसमें किल्लोल करती वह जलपरी।

राकसों को जगा देखकर पंडितजी और कदम पहलवान भयभीत हो उठे। कहीं ये लोग सुन्नैर से कोर्इ अभद्र व्यवहार न कर बैठें। मगर सुन्नैर के मन में जैसे कोर्इ भय था ही नहीं। बाहर निकलने पर जब उसने इन राकसों को जगा देखा तो अपने कदम उसी दिशा में बढ़ा दिए। वह धरती पर बैठे दंता सरदार के ऐन बगल से गुजरी और उसकी ठुड्डी को हौले से छूते हुर्इ आगे निकल गर्इ। कदम और पंडितजी दोनों हैरत से भर गए क्योंकि सुन्नैर के इस बर्ताव पर राकसों ने सिसकारी तक नहीं ली। जैसे सुन्नैर ने उनपर कामरूप कामाख्या का जादू चला दिया हो।

राकसों को वहाँ से हटाकर उनके निवास स्थल तक पहुँचाने के बाद ढोलाही वालों ने गाँव वालों को सूचित कर दिया कि मइया की कृपा से पहला कुंड बनकर तैयार हो गया है। इसके बाद तो जैसे गाँव में हंगामा मच गया। हर कोर्इ, बड़ा से बड़ा, छोटा से छोटा जो जिस हालत में था कुंड की तरफ भागा। किशोर और नौजवान इस तरह दौड़ते जा रहे थे कि सीधे कुंड में ही छलाँग लगा देंगे। मगर तभी एक बुजुर्ग महिला सबों का रास्ता रोककर खड़ी हो गई।

अभी कोई पुरुख नहीं घुसे। अभी पोखर कुमायर है...

मतलब...

मतलब... कोई मरद सामने आए... पोखैर से बियाह करे...

पोखर से बियाह?

यह सवाल न सिर्फ परानपुर के युवकों ने उस बूढ़ी से बल्कि कथा सुन रहे लोगों ने सुरपति से भी कर डाला। सवाल पूछने वालों में इस बार खुद विश्वंभर भी थे। न जाने कैसे अब तक यह रोचक जानकारी उसकी निगाह से बची थी।

जी हाँ, कुंडों का विवाह। न सिर्फ कुंडों, बल्कि कुओं का भी विवाह था। विश्वंभर बाबू आपने तो पोखरों और इनारों (कुओं) के बीच में लगा लकड़ी का खंबा देखा ही होगा, जिसे हम गाँव वाले जाइठ कहते हैं। यह जाइठ उसी तरह जल स्रोतों के विवाहित होने की निशानी है, जैसे महिलाओं के सीथ (माथे के सामने वाला वह हिस्सा जो बाल सँवारने के बाद दो अलग दिशाओं में सजी लटों की विभाजन रेखा होता है) में सिंदूर। माना जाता रहा है कि बिना विवाह ये जल स्रोत शुद्ध नहीं होते। इनका जल न पीने के इस्तेमाल में लाया जा सकता है और न ही किसी शुभ कार्य में। इसलिए निर्माण के तत्काल बाद इनका विवाह होता था। सबसे रोचक बात तो यह है कि विवाह किसी युवक से होता था। और बाद में वह युवक पूरे गाँव का दामाद हो जाता था। पूरा गाँव उसकी खातिरदारी जमाई मानकर ही करता था। मैंने ऐसे दो-तीन लोगों को खुद देखा है जो अपने ही गाँव में दामादजी कहकर बुलाए जाते रहे हैं। खुद उनके घरवाले यहाँ तक कि माता-पिता भी उन्हें दामादजी ही कहते थे। उनकी पत्नी को दूसरी पत्नी का दरजा मिलता।

कमाल है आज हम पर्यावरण संरक्षण का नारा देने के बाद भी प्रकृति कभी इस तरह का संबंध स्थापित नहीं कर सकते जैसा उन दिनों था। यह श्रोताओं की सामूहिक राय थी। बहरहाल सुरपति ने चर्चा को विराम देते हुए कहानी को आगे बढ़ाया।

उस बूढ़ी ने जब परानपुर के नवयुवकों को विवाह की बात बताई तो सभी हँसने लगे। मगर बाद में पंडित ने भी समर्थन किया। अब सभी नौजवान दूल्हे के रूप में एक दूसरे का नाम प्रस्ताविक करके मजाक करने लगे। इस पर पंडितजी नाराज हो गए। बोले, मजाक की बात नहीं है बाबू लोग। पोखर का वर वही बनाया जाना चाहिए जिसका चरित्र और आचरण बेहतर हो। क्योंकि उसी के कर्म पर पोखर का भविष्य निर्भर करेगा। तय हुआ कि अखिल को वर बनाया जाए। चट मँगनी-पट ब्याह हुआ। फिर भोज भी।

लोग बाग कुंड से नहाकर लौट ही रहे थे कि शोर मच गया कि कुछ राकस झुंड से भाग निकले हैं और गाँव की तरफ ही आ रहे हैं। खबर सुनते ही लोगों में दहशत फैल गर्इ। जी-जान छोड़कर इधर-उधर भागने लगे, जिसको जहाँ मौका मिला वह वहीं छुप गया। क्या पता राकस कहाँ उदित हो जाए? फिर खबर उड़ी कि राकस लोग लखन मालाकार के घर में घुस गए हैं। घर में कोर्इ मर्द नहीं था, औरतें डर से कमरे में घुस गर्इं और अंदर से किंवाड़ बंद कर लिया। राकस लोग आँगन में जमे हुए थे और खाना माँग रहे थे। डर से औरतें दरवाजा नहीं खोल रही। इस बीच गाँव के लोगों ने लखन के घर को घेर लिया, मगर किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि राकसों से मुकाबला करने के लिए आँगन में घुसे। किसी ने सुझाया कि हवेली जाकर सुन्नर बाबू को कहेंगे तो तीरंदाज लोग आ जाएँगे, तभी इन राकसों को ठिकाने लगाया जाना संभव है।

संदेश पहुँचा ने वालों ने हवेली पहुँचकर सूचना दी तो सुन्नर सोच में पड़ गया। अगर तीरंदाजों को भेजकर राकसों को मरवा देता है तो राकस लोग कुंड खुदार्इ तो बंद कर ही देंगे, इसके बाद जो उत्पात मचाएँगे उसको सँभालना मुश्किल होगा। अगर राकसों को छोड़ दिया तो वे लोग मालाकार के घर क्या करेंगे इसका भी ठिकाना नहीं। सुन्नर सोच में पड़ा था कि सुन्नैर झट से घर से निकल पड़ी। पहले तो सुन्नर को समझ ही नहीं आया कि सुन्नैर कहाँ और क्यों निकली? जब बात उसके पल्ले पड़ी तो आवाज देना बेकार था, वह काफी दूर निकल चुकी थी। झटककर वह भी पीछे-पीछे निकल पड़ा। सुन्नर जब तक वहाँ पहुँचा, सुन्नैर लखन के आँगन में घुस चुकी थी। बाहर खड़े लोग सन्न रह गए कि सुन्नैर ने ये क्या किया और राकस लोग अब उसका क्या करेंगे? मगर थोड़े ही देर में वह उन राकसों के साथ बाहर आ गर्इ। उसने आसपास खड़े लोगों से कहा कि कोर्इ इन राकसों पर प्रहार न करे। फिर उसने राकसों को उनके झुंड तक पहुँचा दिया। लोगों को बाद में पता चला कि ये राकस लोग उनका गाँव घूमना चाहते थे और इसी विचार से घेरा तोड़कर भाग आए थे। उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि उनके गाँव जाने से इतना बड़ा हंगामा हो जाएगा।

सुन्नैर ने लौटकर बताया कि जब मालाकार की औरतों ने इन्हें देखकर दरवाजा बंद कर लिया तो इन्हें बहुत दुख हुआ। वे दरवाजा खटखटा इसलिए रहे थे ताकि उन्हें समझा सकें कि उनका इरादा गलत नहीं। मगर दरवाजा खटखटाने के बाद मालाकार की औरतें और डर गर्इं। उन्होंने खिड़की से चिल्लाकर काफी भीड़ जमा करा लिया। तब तो राकस भी घबराने लगे। लोग सोच रहे थे कि राकस उन्हें खा जाएँगे, जबकि राकस इस डर से परेशान थे कि कहीं गाँव वाले उन्हें मार न डालें। यह सब सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि राकस लोगों को हम लोगों से घुलने-मिलने का मौका नहीं मिला। उन्हें अलग रखा गया। वे लोग पागल थोड़े ही हैं कि किसी को मारकर खा जाएँ। वे यहाँ आए हैं तो इस गाँव को देखने-समझने का मन क्यों न हो? इसलिए मैंने वादा कर दिया है कि अंतिम दिन उन लोगों को पूरा गाँव घुमा दूँगी और सब लोगों से परिचय करा दूँगी।

सुन्नैर का साहस और उसका परिणाम तो लोगों को ठीक-ठाक लगा, मगर राकसों को गाँव घुमाने का प्रस्ताव अधिकांश लोगों को नहीं जँचा। राकसों से कैसा मेलजोल, भेट-मुलाकात और परिचय। उन लोगों के पास कोर्इ तहजीब है, कोर्इ ठिकाना है कब किसी को चबाकर निगल जाए। हवेली की बेटी है, कुंड खुदवा रही है तो क्या जो मन में आएगा सो करेगी? अपने घर ले जाए, हम लोगों को भेट-मुलाकात और परिचय नहीं करना। मगर कोर्इ मुँह पर विरोध न कर सका।

थोड़ी देर में शाम हो गर्इ। आज दक्षिणी कोने में कुंड खोदा जा रहा था। आज भी चाँद उगने पर सुन्नैर नाचने पहुँची और राकसों ने तीन पहर रात में खोदकर कुंड तैयार कर दिया। सुबह फिर सुन्नैर ने नए कुंड में पुरइन के पौधे छोड़ दिए।

सिर पर ब्याह

सुन्नैर के धरमपुर से लौटने के दो-तीन बाद की बात है एक दिन अचानक राघव की माँ चक्कर खाकर गिर पड़ीं। उन्हें कभी कोर्इ रोग था नहीं, ऐसे में अचानक इस तरह की घटना से परिवारवाले घबड़ा गए। फटाफट इलाके के सबसे प्रसिद्ध वैद को बुलवा लिया गया। नाड़ी परीक्षण के बाद वैदजी ने कहा कि ये किसी बात को लेकर अत्यधिक चिंतित रहती हैं, अतः अगर आप लोग इनकी लंबी आयु की इच्छा रखते हैं तो इनके आसपास हँसी-खुशी का वातावरण बनाए रखें। हँसी-खुशी की बात जब आर्इ तो घर वालों ने सोचा कि क्यों न लगे हाथ जितनी जल्द हो सके राघव और सुन्नैर का ब्याह ही करवा दिया जाए। वैसे भी तय रिश्ते को यथाशीघ्र मूर्त रूप दे देना ही अच्छा होता है। फिर क्या था, झटपट पंडित बुलाए गए और सबसे नजदीक वाली तारीख निकलवा कर राघव के चाचा और सुन्नैर के मौसा आनंद ठाकुर को परानपुर भेज दिया गया। परानपुर पहुँचकर मौसाजी ने जब सारी बातें वहाँ के लोगों को बतार्इ तो हवेली के लोगों को समझ ही नहीं आया कि इस खबर पर खुश हुआ जाए या उदास। दरअसल मौसाजी उसी दिन परानपुर पहुँचे थे जिस दिन तीसरे कुंड की खुदार्इ होनी थी। और वह सिर्फ तीन दिन बाद की तारीख बता रहे थे यानी पाँचवें कुंड की खुदार्इ पूरा होने के महज एक दिन बाद। हवेली की इकलौती लाड़ली सुन्नैर की शादी की तैयारी सिर्फ एक दिन मैं कैसे हो? इस ब्याह को लेकर उन लोगों के कैसे-कैसे अरमान थे। कटिहार से बाजा आएगा, पूर्णिया से रोशनी करने वाले, एक-एक व्यंजन बनाने के लिए अलग-अलग हलवार्इ होंगे जो उसी व्यंजन बनाने के माहिर होंगे। केवल ऐसे हलवाइयों की सूची बनाने में ही दस-पंद्रह दिन लगने वाले थे। पंडित दरभंगा और मधुबनी से बुलवाने की योजना था। साड़ी गंगा पार के रेशम बुनकरों के यहाँ से लाना था। जेवर का तो अभी पता भी नहीं लगाया जा सका था कि कहाँ के सुनार ज्यादा हुनरमंद हैं। निमंत्रण भेजने में ही बीस-पच्चीस दिन का समय चाहिए था। जबकि लड़के वाले तीन दिन बाद बारात लाना चाहते थे। अब लड़के वालों की बात भला कैसे काटी जाए। उसमें भी जब वे यह कह रहे हों कि शादी की व्यवस्था और दान-दहेज पर हम कोर्इ टीका-टिप्पणी नहीं करेंगे, आपसे जितना और जैसा संभव हो कर दीजिएगा। राघव की माँ की बीमारी की बात ने भी लोगों को मुँह की बात मुँह में ही रखने को मजबूर कर दिया। बार-बार सुन्नर के मन में आवेग उठता कि हवेली में इतने दिनों बाद बारात आएगी और उनके स्वागत-सत्कार की व्यवस्था भी ठीक से नहीं हो पाएगी। ऐसे में तो नायक खानदान का नाम ही डूबेगा। देखने वाले जरूर सोचेंगे कि नए नायक की जिम्मेदारी सँभालते ही हवेली की दीवारें दरकने लगीं। उसने भी तय कर लिया कि इस बार दुनिया देख लेगी कि तीन दिन में ही परानपुर हवेली वाले कैसी व्यवस्था करते हैं।

मौसाजी खबर सुनाकर ही लौट गए क्योंकि उन्हें अपनी व्यवस्था भी करनी थी। उन्हें किसी ने रोका भी नहीं। हवेली के लोग तो चाह ही रहे थे कि वे जल्द लौट जाएँ और उन्हें सुन्नैर और दंता राकस वाले प्रकरण की उन्हें बू तक न लगे। सुन्नर हवेली की कीर्ति पताका फहराने में जुट गया और घर के बुजुर्ग सुन्नैर के माता-पिता और दादी अपनी इकलौती के ब्याह के सपने सँ जोने में। इस बीच किसी की नजर नहीं गर्इ कि सुन्नैर इतनी अच्छी खबर सुनकर खामोश क्यों हो गर्इ है? वह चुपचाप अपने अकेलेपन के साथी आईने के सामने जाकर बैठ गर्इ थी।

आईने ने कहा - बधार्इ हो सखि! आखिर वह शुभ घड़ी आ ही गर्इ।

हाँ! आना तो था ही मगर इतनी जल्दी, यह सोचा न था।

सचमुच! लड़के वाले तो सिर पर आकर खड़े हो गए। कितने अरमान होंगे तुम्हारे घरवालों के और तुम्हारे भी। अब बताओ तीन दिन में कोर्इ क्या कर पाएगा?

मेरे मन में कोर्इ अरमान नहीं था ब्याह को लेकर।

क्यों? सोचने का समय नहीं मिला?

पता नहीं? हाँ! शायद तुम ठीक कहते हो, मुझे समय चाहिए था। और अधिक समय। मगर अरमानों की सूची बनाने के लिए नहीं बल्कि यह तय करने के लिए कि मेरे लिए यह विवाह उचित होगा या नहीं?

क्या कहती हो? क्या तुम धरमपुर वाली उस घटना को अब तक दिल से लगाए बैठी हो?

शायद? मगर वही नहीं, उसके अलावा भी कर्इ बातें हैं?

हाय रे लड़कियाँ! तुम लोग वाकर्इ भ्रम का शिकार होती हो। तुम्हें दरअसल मालूम ही नहीं होता है कि तुम्हें चाहिए क्या और जो मिल रहा होता है उसे अस्वीकार कर देना और गले में फँदा लगाकर कुएँ में कूद जाना तुम लोगों को हमेशा पसंद आता है।

बकवास? वैसे कुएँ में कूदने वाली मिसाल मेरे समझ में नहीं आर्इ।

जैसे दंता राकस से ब्याह कर लेना।

कहकर आईना ठहाके लगाकर हँसने लगा।

तो क्या दंता राकस से ब्याह करना कुएँ में कूदना है?

सुन्नैर ने भी चुटकी लेते हुए कहा।

कम से कम तुम्हारे जैसी लड़की के लिए।

और राघव जैसों से शादी करना सीढ़ी लगाकर स्वर्ग में चढ़ना है?

नहीं वैसा नहीं है। मगर तुम्हारे लिए अगर सही लड़का तलाशा जाए तो वह राघव ही होगा।

यानी उचित वर?

हाँ!

और मैं इस अवसर को हासिल करके जीवन भर की उसकी गुलामी कबूल कर लूँ। वह जो-जो चाहे करती जाऊँ और उसकी हवेली में कैद होकर अपने आपको यह मानने पर मजबूर करूँ कि यही जीवन है, एक बेहतर जीवन।

क्या कह रही हो?

नहीं! मैं जीवन की असलियत बता रही हूँ और हालाँकि इसे बदलने की ताकत कम से कम मुझमें नहीं है, वरना दंता जैसा दूल्हा हर हाल में राघव से अच्छा है। जीवन भर मेरे पाँव पखारेगा। मुझे किसी चीज की तकलीफ नहीं होने देगा। कभी मुझ पर रौब नहीं गाँठेगा।

कहते-कहते सुन्नैर को हँसी आ गर्इ।

तो क्यों नहीं कर लेती दंता से शादी?

कर लेती। बस मुझे उसकी पोचाय पीने की आदत पसंद नहीं है। और... उसका चेहरा पसंद नहीं है। और... उसकी आवाज पसंद नहीं है। और... उसका कोयले जैसा गोरा रंग पसंद नहीं है। और... उसके कपड़े पसंद नहीं हैं। और... उसकी आँखें अच्छी नहीं लगती। दाँत और नाक भी कुछ खास नहीं हैं। बाकी चेहरा तो मिला-जुलाकर ठीक ही है।

बस! बस! अब चुप करो। ज्यादा ठिठोली ठीक नहीं। तुम बस भाव खा रही थी, मुझे लगा तुम परेशान हो?

नहीं, मैं सचमुच परेशान हूँ। और वह भी दंता को लेकर। मैं जो उसे धोखा दे रही हूँ, उससे मुझे डर लगने लगा है। अभी मैंने तुम्हें बताया न कि मुझे उसमें क्या-क्या पसंद नहीं है। अब मैं तुम्हें बताती हूँ कि मुझे उसकी कौन सी बात पसंद है। वह है उसकी सच्चार्इ और उसका भोलापन। उसे पूरा विश्वास है कि मैं उससे शादी कर लूँगी, मैं उसे धोखा नहीं दे सकती। दरअसल वे इस बात की उम्मीद ही नहीं रखते कि कोर्इ वादा करके मुकर भी सकता है। अब अगर ऐसे में मैंने उसे धोखा दे दिया तो यह बात मेरे दिल को जीवन भर सालती रहेगी। मैं इस अपराधबोध से उबरना चाहती हूँ, तभी मैं राघव से शादी कर पाऊँगी और एक खुशहाल जीवन जी पाऊँगी।

तो क्या करोगी?

कुछ समझ नहीं आ रहा। पर आज ही कुछ करना होगा।

सँभलकर सुन्नैर कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए।

ध्यान रखूँगी।

तीसरी रात पूरबी कोने में कुंड खोदा जाने वाला था। दो कुंडों की खुदार्इ सफलतापूर्वक संपन्न हो जाने के बाद परानपुर वासी काफी हद तक आश्वस्त हो चुके थे। अब न उन्हें राकसों का डर सताता था और न ही कुंडों की खुदार्इ को लेकर मन में कोर्इ संदेह था। ऐसे में सुन्नैर के विवाह की तैयारियों पर ही सबों का ध्यान केंद्रित हो गया था। सुन्नर ने पंडितजी और कदम पहलवान के समूह को छोड़कर बाकी तमाम लोगों को कुंड खुदार्इ के काम से हटा लिया और उन्हें विवाह की तैयारियों में जोत दिया।

उस रोज समय पर खुदार्इ शुरू हो गर्इ और सुन्नैर भी समय पर हवेली से आ गर्इ। मगर उसके छम-छम में आज वो बात नजर नहीं आ रही थी। उसके नृत्य के लय में शिथिलता थी और उसका चेहरा भावहीन। दंता समेत सभी राकसों ने इस बात को महसूस किया और इसका नतीजा यह हुआ कि उनकी खुदार्इ की गति भी शिथिल हो गर्इ। मगर इस समस्या पर सुन्नैर की नजर जा ही नहीं रही थी। पंडितजी ने भी यह देखा, मगर इस बारे में सुन्नैर से कैसे बात करे समझ ही नहीं आ रहा था। आखिरकार उन्हें एक संदेशवाहक को सुन्नैर के पास भेजना पड़ा, जिसने इशारा किया तो सुन्नैर को समझ आया कि रात का दूसरा प्रहर खत्म होने वाला है मगर अब तक कुंड की आधी खुदार्इ भी नहीं हो पार्इ है। इसके बावजूद उसे यह समझ नहीं आया कि राकसों में आर्इ सुस्ती का कारण उसकी अपनी शिथिलता और अनमनापन है। उसे तत्काल नाचना बंद कर दंता की ओर कदम बढ़ा दिया और बड़े अधिकार के साथ सवाल कर दिया कि आज तो तुम लोग बड़े सुस्त हो, ऐसे में रात भर में कैसे कुंड तैयार होगा?

सुन्नैर के इस सवाल पर दंता ने बड़ा रूखा जवाब दिया - नहीं होगा तैयार कुंड तो हमारा क्या बिगड़ेगा? हम तो ऐसे ही काम करेंगे?

दंता का जबाव सुनकर सुन्नैर सन्न रह गर्इ। आज जरूर कोर्इ विशेष बात है। कदम भैया ने पोचाय की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की होगी, तभी...!

सुन्नैर के इस व्यंग्य ने दंता के धैर्य का रहा सहा बाँध भी तोड़ दिया। बोला - अब दंता थक गया है, अब काम नहीं होगा। और उसने अपने तमाम साथियों को काम बंद करने का आदेश दे दिया।

दंता के इस बर्ताव से सुन्नैर अवाक रह गर्इ। लगातार घुलने-मिलने और हमेशा उनके पक्ष में बातें करने के कारण वह राकसों पर अपना विशेषाधिकार समझने लगी थी। उसे लगता था कि अब उसके और राकसों के बीच औपचारिकता की जरूरत नहीं। मगर दंता ने आज सबके सामने बात काटकर उसकी हेठी करवा दी। कोर्इ और मौका होता तो वह सीधा जबाव देती कि बंद कर दो काम, तुम्हारी जरूरत नहीं। मगर यहाँ सवाल सिर्फ उसका नहीं पूरे गाँव और समाज का था। यह सोचकर उसने मुँह पर ताला लगा लिया और कोने में जाकर बैठ गर्इ। उसने तय कर लिया भले ही वह राकसों को कोर्इ कड़ा जबाव नहीं देगी मगर उनकी खुशामद भी नहीं करने जाएगी। मुँह फुलाए, बैठे-बिठाए काफी वक्त गुजर गया। पंडितजी परेशान थे, न जाने किसने उन्हें मति दी कि सुन्नैर को इस बावत इशारा करवा दिया, अब तो काम ही ठप हो गया। भले ही रफ्तार धीमी थी मगर काम तो चल ही रहा था। अब पता नहीं क्या होगा, उनकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि आगे बढ़कर किसी पक्ष से गतिरोध तोड़ने का आग्रह करे। आखिरकार गतिरोध टूटा और वह भी दंता की पहल पर। वह उठकर सुन्नैर के पास गया और बोला - उठो और अपना काम शुरू करो। हमारा थकान खतम हो गया है। अब हम लोग काम शुरू करेगा।

और सुन लो! आगे से बीच में मत बोलना तुम्हारा काम धीमा है, सुस्त है। हम तुमको बोलने जाता है कि तुम्हारा नाच धीमा है?

अच्छा तो यह बात है? दंता की बात सुनकर सुन्नैर को हँसी आ गर्इ।

दंता के जाने से पहले सुन्नैर ने कहा - काम खत्म होने पर तुमसे कुछ बात करना है?

पंडितजी ने महसूस किया कि इस बार राकसों का रुख बदल गया है। बचा हुआ काम आधे प्रहर में ही पूरा हो गया। और अब दंता सुन्नैर के सामने था।

बोलो क्या?

उसके चेहरे पर उत्साह भरी मुस्कान थी। सुन्नैर के जुबाँ पर आर्इ बात फिर मन के कोने में जा छिपी। इसे कैसे बताया जाए? क्या यह सुन्नैर की बातों का मर्म समझ पाएगा?

क्या कहना है रे मानुष छोरी मोहनियाँ?

तुम मुझे मानुष छोरी मोहनियाँ कहना बंद करो, मेरा नाम नहीं है क्या?

सुन्नैर की बात सुनकर दंता से कुछ बोलते नहीं बना।

सुन्नैर कह कर पुकारो।

नहीं कह सकता।

क्यों?

मेरे साथी सुनेंगे तो हँसेंगे। होने वाली घरवाली का नाम लेता है।

दैया रे दैया। इतना शर्मीला है मेरा होने वाला दूल्हा।

नहीं! ऐसी बात नहीं है। शादी के बाद नहीं शरमाता, हिरन्नी से जाकर पूछ लो।

दंता के इस बात पर तो सुन्नैर को जोर की हँसी आ गर्इ। जब हँसी रुकी तो याद आया कि उसे तो कितनी गंभीर बातें करनी थी और वह क्या-क्या बक रही है। उधर, सुन्नैर की हँसी सुनकर दंता और शरमा गया। मगर वह जितना अधिक शरमाता उतना बेशर्म दिखना चाहता। उसे डर था कि कहीं शर्मीलेपन के कारण सुन्नैर उसके बारे में कोर्इ गलत राय कायम न कर ले।

दंता ने दम लगाकर कहा - ऐ लड़की! तुमको कुछ कहना था न।

उसकी आवाज में तो जोर था मगर बोली लड़खड़ा रही थी। अब तो हाथ-पाँव भी काँपने लगे थे। सुन्नैर को यह सब साफ-साफ नजर आ रहा था। उस तय कर लिया कि अब किसी और रोज ही बात कर लेगी, आज दंता को छोड़ देना ही उचित होगा।

कोर्इ खास बात नहीं थी, जाओ बाद में बात कर लूँगी।

दंता को लगा कि सुन्नैर ने उसकी कमजोरी को भाँप लिया है। मगर दंता भी आज साबित करके रहेगा कि वह असली मर्द है।

नहीं अभी कहो। बाद में क्यों? दंता को क्या बच्चा समझती हो, जैसे मन होगा वैसे खेलाओगी।

नहीं! बच्चा क्यों समझूँगी तुम तो सरदार हो, राकसों के राजा।

ठीक है! ठीक है! जो कहना है साफ-साफ कहो।

कह दूँ?

हाँ! हाँ!

बात सुनने के बाद अपनी बात से पलटोगे तो नहीं? तुम तो मर्द हो।

कोर्इ शक है?

खैर, तुमको जो करना होगा वह करना। मैं नहीं रोकूँगी। मगर अब तुमसे और झूठ नहीं बोल सकती। पहले मैं तुम्हें राकस समझती थी और अपने स्वार्थ में अंधी हो गर्इ थी इसलिए तुम्हें धोखा देने का फैसला कर लिया। मगर अब मैं तुम्हें जानती हूँ, इसलिए तुम्हें और अँधेरे में रखना मुझे उचित नहीं लगता।

इतना कहते-कहते सुन्नैर की बोली की शरारत कहीं बिला गर्इ।

रहने दो, बाद में बात करना।

दंता बोल उठा।

नहीं! अब तो मैं आज इसे कहे बिना नहीं रह पाऊँगी।

मैं कहता हूँ न, बाद में बताना। मैं अभी सुन नहीं सकता।

नहीं! तुम्हें आज ही सुनना ही पड़ेगा।

मुझे पता है। तुमको क्या कहना है।

नहीं तुम इस बारे में सोच भी नहीं सकते हो।

क्यों? हम लोग जानवर हैं? समझ नहीं सकते कि आसपास क्या हो रहा है?

मतलब?

गाय-बैल, हाथी-घोड़ा हैं क्या? तुम्हारे सारे लोग शादी की तैयारी कर रहे हैं और मेरे समझ में नहीं आएगा।

तुम्हें मालूम है, कल रात हम लोगों के बीच इस बात को लेकर खूब बहस हुर्इ कि मानुष लोग धोखा दे रहा है। सुन्नैर की शादी कहीं और करा रहा है। तब मैंने कहा कि किसी और से नहीं मेरे साथ होने वाले शादी की तैयारी चल रही है। तब जाकर सब शांत हुआ।

मुझे पहले दिन से मालूम था कि तुम लोग धोखा दोगे। कौन मानुष अपनी बेटी की शादी राकस से कराता है? दबाब में तैयार तो हो जाएगा, मगर ताल-भाँज तो करेगा ही। पहले मैंने सोचा था कि हम लोग एक हजार एक राकस हैं, तुमको लेकर भाग जाएँगे। मगर...?

मगर? सुन्नैर दंता की बातों से चकित थी।

वही बात। अब मैं भी तुमको जान गया हूँ, तुम्हारे साथ बुरा नहीं कर सकता। तुम मेरे घर में खुश नहीं रहोगी, जानता हूँ। रोज सोचता हूँ, जिस घर में तुम्हारा ब्याह होगा उस के यहाँ नौकरी कर लूँगा। इतनी अच्छी तो तुम हो ही कि अपने गाँव में कुंड खोदने वाले को अपनी ससुराल में नौकरी दिला दोगी। क्योंकि...?

क्योंकि...?

क्योंकि, अब अगर एक दिन भी तुमको नहीं देखा तो...

सुन्नैर और आगे सुन नहीं पार्इ। आँखें पोछती हुर्इ भाग गर्इ।

बीस जोड़ साड़ी और दस भरी सोना

आज सुन्नैर की सुबह काफी देर से हुर्इ। खिड़की से धूप अंदर घुस आया था। हालाँकि जब से कुंडों की खुदार्इ शुरू हुर्इ थी, रात भर जगना और सुबह देर तक सोते रहना सुन्नैर के जीवन का हिस्सा हो गया था। मगर आज जब एक नौकरानी यह कहते हुए उपर आर्इ कि जल्दी नीचे चलिए, गंगा पार से रेशमी साड़ी बेचने वाला सौदागर आया हुआ है, माताजी आपको बुला रही हैं तो सुन्नैर चकित रह गर्इ। वह इतनी देर तक सोती रह गर्इ। उसके लिए वक्त का अंदाजा लगाना मुश्किल था, धूप कड़ी हो चुकी थी। उसने दार्इ से पूछा - बाबूजी ने पूजा कर लिया?

जब दार्इ ने जवाब में हाँ कह दिया तो सुन्नैर को लगा कि उसे खुद को ही डाँट पिला देना चाहिए। सारे घरवाले परेशान हैं और वह खर्राटे लेकर सो रही है। तभी उसके हाथ उसकी आँखों पर पड़े। आँखें सूजी हुई थीं, सोते वक्त क्या वह रोर्इ थी। मगर क्यों ऐसा हुआ? उसने याद करने की कोशिश की कि सोने से पहले वह किस बारे में सोच रही थी। उसे रात में दंता से हुर्इ अपनी बात याद आर्इ। हाय रे दैया! ऐसे होते हैं राकस। दुष्ट-बदमाश-पापी-दुराचारी-अत्याचारी-कुकर्मी। और भी कोर्इ विशेषण होता तो उन्हें दे ही दिया जाता। कम ज्ञानी और कम सामर्थ्यवालों को कुछ भी घोषित किया जा सकता है। जैसे औरतें नर्क का द्वार होती हैं, मगर उस द्वार में प्रवेश करने का मजा छोड़ने के लिए कोर्इ महान, ज्ञानी और पुण्यात्मा तैयार नहीं है। इन्हीं विचारों में डूबी सुन्नैर नीचे उतरी तो आँगन में मजमा लगा था। माँ-दादी, आसपास की औरतें और ढेर सारी नौकरानियाँ साड़ी वाले को घेर कर बैठी थी और उसने साड़ियों को खोल-खोलकर अंबार लगा दिया था। औरतें थीं कि उन्हें कोर्इ साड़ी जँच ही नहीं रही थी, किसी का आँचल अच्छा था तो जमीन नहीं, जमीन अच्छा मिलता तो कढ़ार्इ का काम औसत लगता। सुन्नैर को देखकर सारी औरतें एक साथ चिल्ला उठीं - ऐ साड़ी वाले। देख लो यह है लड़की! अगर इसके टक्कर की कोर्इ साड़ी हो तो दिखाओ नहीं तो समेट कर रास्ता नापो।

साड़ीवाले ने देखा तो उसकी नजर भी तारीफ कर उठीं - सचमुच आपकी लड़की तो बहुत खूबसूरत है। इसके जोड़ की साड़ी मिलना मुश्किल है, मगर मेरे पास जो साड़ियाँ हैं उससे अच्छी मिलना भी मुमकिन नहीं है। आजकल अच्छे बुनकर मुर्शिदाबाद का रास्ता पकड़ने लगे हैं, इसलिए अपने इलाके में अच्छी साड़ियाँ तैयार ही नहीं हो पा रही है।

अनायास अपनी सुंदरता के इस जिक्र से सुन्नैर असहज हो उठी। उसके मुँह से निकल पड़ा - मेरे लिए इतनी अच्छी साड़ियों की क्या जरूरत? दंता के गाँव में कौन इसका मोल समझेगा?

सुन्नैर की बात पर औरतों के झुंड में जोरदार ठहाका गूँज उठा। पहले तो सुन्नैर को इस अनायास की हँसी की वजह का पता नहीं चला, मगर जब गौर किया तो समझ आया कि पता नहीं कैसे उसके मुँह से राघव के बदले दंता का नाम निकल गया। औरतें समझ रही हैं कि उसने जान-बूझकर मजाक किया है। ऐसे में उसने भी अपने चेहरे पर भेद भरी मुस्कान ओढ़ ली ताकि लोगों को उसकी इस गलती का पता न चले। औरतों ने उसे भी साड़ी पसंद करने के लिए बिठा लिया, मगर उसके मन में यही सवाल कौंध रहा था कि आखिर उसके मुँह से राघव के बदले दंता का नाम क्यों निकल गया? परसों राघव से उसकी शादी होने वाली है और वह दंता के बारे में सोच रही है? राघव, जो कभी उसे देवपुत्र जैसा लगता था आज उसकी कोर्इ बात उसे क्यों नहीं लुभाती? वह उसके आलिंगन के बदले दंता के साथ होने वाले अन्याय के बारे में सोच रही है? उसे अब दंता का ख्याल अपने मन से निकाल देना चाहिए, क्योंकि यह न तो उसके जीवन के लिए उचित है और न ही दंता के लिए। लगता है दंता उसे आसानी से भुला नहीं पाएगा और इस अपराध का कारण वह खुद होगी। दंता ने उसके लिए और उसके गाँव के लिए बहुत बड़ा काम किया है, बदले में वह उसे धोखे के सिवा क्या दे रही है? यह पाप उसके जीवन पर अच्छा असर नहीं डालेगा। ख्यालों की भीड़-भाड़ ने उसे किसी बात पर एकाग्र नहीं होने दिया।

तभी बड़ी तेजी से सुन्नर अंदर आया, उसके पास आकर बोला - तुरंत मेरे कमरे में आओ। बहुत जरूरी बात है। सुन्नैर उसके साथ ही उसके कमरे में चली गई।

तुम आग से खेलने लगी हो। फेर में पड़ जाओगी, सँभल जाओ।

मतलब?

मुझे लगता है तुम समझ रही हो। सारी बातें खोलकर नहीं की जानी चाहिए।

नहीं, मुझे लगता है हमें खुलकर बात कर लेना चाहिए। किसी के मन में कोई बात रह जाए, यह ठीक नहीं।

कई दिनों से दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति जो दुराव आ गया था, वह बातचीत में साफ नजर आ रहा था। सुन्नैर को याद आया यह वही भाई था जो उसके आँसू पर दुनिया में आग लगाने को तैयार रहता था।

तुम कल दंता सरदार से जिस तरह बात कर रही थी, उससे खानदान की इज्जत पर बट्टा लगता है।

खानदान की इज्जत पर तो कई बातों से आँच आती है। खैर... तो तुम्हें पंडित जी ने बताया?

मैं रोज उनसे रात भर की तफसील लेता हूँ।

यानी, मेरी जासूसी कराते हो?

कराना पड़ रहा है। इन दिनों तुम्हारे एक भी लक्षण ठीक नहीं।

भाई, तुम परानपुर के नायक जरूर बन गए हो, अभी मेरे बाप नहीं बने। मुझे क्या करना है और कैसे करना है इसमें कभी बाबूजी ने भी इतना दखल नहीं दिया।

मैंने बाबूजी से वादा किया है, तुम्हारी शादी बिना किसी विवाद के कराना मेरा दायित्व है। मगर तुम जिस राह पर हो ऐसा लगता है अपने लिए खुद काँटे बो रही हो।

धन्यवाद कि तुम मेरी शादी की फिक्र कर रहे हो। मगर ऐसा लगता है कि कुछ ज्यादा ही फिक्र कर रहे हो। धरमपुर के महल की नौरी (नौकरानी) बनने के लिए मैं मरी नहीं जा रही। शादी टूटनी है तो टूट जाए।

नौरी नहीं रानी बनने जा रही हो तुम। ठीक से बोलना सीखो।

रानी और नौकरानी में अधिक फर्क नहीं होता मेरे भाई।

तो क्या दंता की पटरानी बनना चाहती हो?

हर तरफ एक ही सवाल। सुन्नैर भिन्ना गई।

क्यों? तुम्हारी पगड़ी नीची हो जाएगी?

बकवास करती हो। मुझे बहस नहीं करना। मेरी बात सीधी तरह समझ आए तो ठीक। वरना... ? सुन्नर नाक फड़काते हुए बाहर जाने लगा।

अच्छा तो नौबत यहाँ तक आ गई। तुम्हारा वरना भी देख ही लूँगी...

वह सुन्नर के पीछे-पीछे आँगन तक आई। आँगन में पहले की ही तरह साड़ियों का मजमा लगा था। साड़ियों के पहाड़ को देखकर उसे उबकाई सी आई। बीस गोटेदार साड़ियाँ और दस भरी सोने के गहने। क्या यही है एक औरत की पूरी जिंदगी की कीमत। उसे नहीं बेचना है खुद को।

कभी नहीं... वह चीखी और पछाड़ खाकर गिर गई।

आँगन में कोहराम मच गया। साड़ी वाला सामान समेट कर चुपचाप निकल गया। सुन्नैर को उसके बिस्तर पर लिटाया गया। वैद जी बुलाए गए। नाड़ी जाँच कर उन्होंने नींद में कमी का मर्ज बताया। औरतों के झुंड से फुसफुसाहट निकली - जरूर होगा। मुझौंसी कुंड के चक्कर में जान दे रही है। लगता भी है कि परसों इसकी शादी है? देह कैसा हो गया है। वैदजी ने एक जड़ी देकर सुन्नैर को सुला दिया।

हिरन्नी का बेटा आज उससे सँभाले नहीं सँभल रहा था। बार-बार बाप के पास जाने की जिद कर रहा था। हिरन्नी उसे कैसे समझाए कि अब वह बाप का मोह छोड़ दे। उसका बाप शायद ही कभी उसे पहले जैसे दुलार कर पाएगा। चार साल के बेटे को समझा रही है हिरन्नी रानी।

रे बेटा। तुम्हारा बाप तुम्हारे लिए दूसरी माय लाने गया है।

कैसी है दूसरी माय?

मानुष कुल की है बेटा सुनते हैं बहुत सुंदर है। उसका नाम भी सुन्नैर है।

तुमसे भी सुंदर?

हाँ, बहुत सुंदर।

तुमसे ज्यादा दुलार करेगी?

हाँ, तुमको रोज चाँदी के कटोरे में दूध-भात खिलाएगी। गीत भी सुनाएगी।

हिरन्नी के आँखे से आँसू झरने लगे।

नबकी माय आएगी तो तुम्हारा बाप तो भूल ही जाएगा। चाँदी के कटोरे में दूध-भात खाकर तुम भी मेरे पास नहीं आओगे।

सोने आऊँगा माय। दूसरी माय के पास सोने में डर लगेगा।

जरूर आ जाना बेटा। हमको भी अकेले सोने में डर लगेगा।

बातों से हिरन्नी का बेटा थोड़ी देर के लिए जरूर बहल गया, मगर हिरन्नी को मालूम था कि वह कुछ देर बाद ही फिर से रोने लगेगा। दरअसल परेशान उसका बेटा नहीं था वह खुद थी। और वह जब तक वह परेशान रहेगी बेटा भी बिलखता ही रहेगा। माँ खुश नहीं रहेगी तो बच्चा कैसे खुश रहेगा और जहाँ तक हिरन्नी के खुशी की बात है वह तो तभी से गायब है जब से उसने मानुष छोरी की बात सुनी है। आखिर यही तो वह दंता था जो कुछ साल पहले तक उसके आगे नाक रगड़ता था। जान देने के लिए तैयार रहता था। यह जरूर है कि पूरे राकस कुल में दंता जैसा बलशाली और रंगत वाला दूसरा जवान नहीं था, कुल की कितनी ही छोरियाँ उसके साथ घर बसाना चाहती थी। जबकि दंता खुद उसे चाहता था। उसे दंता शादी से पहले बहुत ज्यादा पसंद नहीं आता था। मगर दूसरा कोई उससे अच्छा नहीं था वह जिसकी हो जाती। शादी के बाद पासा पलटने लगा, वह जितना दंता के करीब आना चाहती, वह उससे दूर भागता रहा। अब उसे साथियों के साथ हंगामा करना, पोचाय पीना, दूसरी औरतों के साथ चुहुल करना अधिक पसंद आने लगा। आखिर ऐसा क्यों हुआ? ठीक वैसे ही जैसे इस सुंदर घर को बनाने के बाद दंता ने किया। जब तक नहीं बना था वह इसके लिए पागल-पागल रहता था। जैसे इसके बिना दुनिया में कुछ है ही नहीं, अब वह सिर्फ रात काँटने यहाँ आता है। कहता है घर तो जेल है।

कहने को तो वह भी किसी और के साथ घर बसा सकती है। न कोई रोक सकता है और न ही हँसी उड़ा सकता है। मगर क्या कभी वह ऐसा कर पाएगी? अगर कर भी पाई तो वह कौन होगा जो सरदार की घरवाली से लगन लगाएगा? अगर मिल भी गया तो क्या वह उसे जँचेगा? क्या वह अपनी खुशी के लिए अपने बेटे की किस्मत उजाड़ सकती है? अभी तक तो उसी की सरदारी पक्की है... सोचते-सोचते हिरन्नी सो गई।

राघव की आँखों की नींद उड़ गई है। उसके समझ नहीं आ रहा कि यह शादी उसके जीवन में खुशियों की बहार लेकर आएगी या गम का पहाड़। उसने अपने अनुभवी दोस्तों से सुन रखा था कि खूबसूरत लड़कियाँ निहारने और मौका मिले तो भोग लेने को लिए होती हैं। मगर शादी के लिए कभी नहीं। वे ऐसे खंडहर की तरह होती हैं जहाँ सिर्फ भूत बस सकते हैं। उनका कोई दोस्त नहीं होता और ताउम्र उन्हें यही लगता है कि उन्हें और बेहतर जीवन साथी मिल सकता था। यानी उनका कोई भी चयन अंतिम नहीं होता है। मगर उस वक्त वह इन बातों को महज मजाक के तौर पर लेता था। आज एक-एक बात सच साबित हो रही है। सुन्नैर के बर्ताव ने साबित कर दिया है कि वह राघव को लगभग अस्वीकार कर चुकी है। अब वह तमाम उम्र उसके साथ उसे तनाव देते हुए जिएगी। मगर अब क्या किया जा सकता है? सिर्फ तीन दिन बाद शादी है। हैरत की बात तो यह है कि इतना सब कुछ जानने समझने के बावजूद अगर उसके पास मौका हो तब भी इस शादी से इनकार नहीं कर सकता। वह सिर्फ और सिर्फ इस रिश्ते को अधिक से अधिक खुशगवार बनाने की कोशिश करने के लिए अपने दिल के हाथों मजबूर है। उसे पता है, इसका एक ही अर्थ है। अब तमाम उम्र सुन्नैर की गुलामी और खुशामद में बीतने वाले हैं। बदले में सुन्नैर से वह सिर्फ एक ही चीज माँगेगा, वह इस राज को राज ही रहने दे कि वह उसे पसंद नहीं करती।

सुन्नैर जब जगी तो अँधेरा हो चुका था। ठीक-ठाक नींद आ जाने के कारण उसका मन प्रफुल्लित लग रहा था। पास में बैठी दासी ने उसे याद दिलाया कि चौथे कुंड की खुदाई का काम उसके कारण अब तक शुरू नहीं हो पाया है। वह झटपट तैयार होकर निकल पड़ी।

खुदाई स्थल पर एक और सुखद अहसास उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। पंडितजी ने बताया, अब राकस लोग उसका नृत्य देखे बगैर ही खुदाई करने को तैयार हैं। वे बस इतना चाहते हैं कि सुन्नैर वहाँ बैठी रहे। यह जरूर दंता की मेहरबानी है। सोचकर सुन्नैर मुस्कुराई। मैं बैठी क्यों रहूँ? क्यों मुझे बिठाए रखना चाहता है दंता? सुन्नैर की मुस्कुराहट और बढ़ती चली गई। मगर इतना मुस्कुरा क्यों रही है वह... एक पराया मर्द... वह भी राकस उसे निहारने के लिए रात भर बिठाए रखना चाहता है और वह मुस्कुरा रही है... छि... छि... क्या सोच रहे होंगे पंडितजी? क्या हो गया है उसे?

अजीब है इन लोगों का मन मिजाज भी...

पंडितजी को सुनाते हुए वह अपनी जगह पर जाकर बैठ गई।

राकस लोग दनादन धरती कोड़ रहे थे। बीच-बीच में उसकी तरफ देख भी लेते थे। बैठे-बैठे बोर हो गई तो उठकर राकसों के बीच घूमने लगी। दंता के पास पहुँची तो उसकी ठोढ़ी को छूकर दुलार कर दिया। दंता शरमा गया। थोड़ी देर बाद वह फिर दंता के पास चली आई सोचा थोड़ा चुहुल कर लिया जाए।

दूल्हे राजा कल तो आप बारात के साथ लौट जाइएगा?

दूल्हे राजा का संबोधन सुनकर दंता के होठों पर मुस्कान दौड़ गई।

मगर अपनी दुलहिन को कैसे ले जाइएगा, डोली तो साथ लाए नहीं हैं?

गोद में उठा कर ले जाएँगे, और कैसे ले जाएँगे...

जबाव सुनकर सुन्नैर हैरत में पड़ गई। उसे उम्मीद नहीं थी कि दंता यह जबाव दे सकता है। एक पल के लिए वह सोच में पड़ गई। फिर बोल पड़ी...

सचमुच?

मैं मजाक नहीं कर रही। मुझे कल सचमुच अपने साथ ले चलो।

दंता ने देखा, सुन्नैर का चेहरा गंभीर था। वह झूठ नहीं बोल रही थी।

तुम पर मुझे अधिकार महसूस होता है इसलिए कह रही हूँ। मुझे यहाँ से ले चलो। हालाँकि मैं तुमसे शादी नहीं करूँगी। तुम पहले से शादीशुदा हो और मैं किसी का घर नहीं उजाड़ सकती पर मैं तुम लोगों के साथ ज्यादा खुश रहूँगी। मुझे यहाँ से ले चलो। कल काम खत्म होने के बाद मैं तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूँ। मेरे गाँव के लोग घेर-घार करेंगे। तुम्हें रोकने की कोशिश करेंगे, मगर तुम लोगों से नहीं जीतेंगे। मैं धरमपुर के देवपुत्र से शादी नहीं करना चाहती दंता। तुम्हीं उस नर्क से मुझे बचा सकते हो। मुझे ले चलो। मैं वहाँ तुम्हारे कुल खानदान के बच्चों को पढ़ाकर अपना जीवन काट लूँगी। मुझे ले चलो।

दंता अवाक होकर सुन्नैर की बात सुन रहा था।

तुम कुछ बोल नहीं रहे दंता। मैं तुमसे भीख माँगती हूँ, मुझे अपने साथ ले चलो...

चुप रहो... जैसा तुम कहोगी, वही होगा...

वह अपनी आँखें पोछने लगा।

छि... मर्द कहीं रोते हैं... अब मैं जाती हूँ... कल... ।

आखिरी दिन-आखिरी रात

पाँचवें दिन जब सुन्नैर की नींद खुली तो उसने महसूस किया कि वह अपने बिस्तर से उठ नहीं पा रही है। जल्द ही उसकी समझ में आ गया कि भाई ने उस पर टोना कर दिया है। अब वह अपने ही भाई की कैद में है। मगर क्यों? क्या दंता से हुई बात और राकसों के साथ भाग जाने की उसकी योजना का पता भाई को चल गया? जरूर, वरना भाई यह कदम नहीं उठाता। क्या उससे सम्मोहन विद्या के जरिए बात किया जाए? मगर क्या बात करे, अब इन सब का क्या फायदा है? भाई को खानदान की इज्जत और अपनी मूँछ बचानी है, अब भला वह अपनी बहन की भावनाओं की परवाह क्यों करेगा। दंता को भगा ले जाने का न्योता देकर वह खुद भी क्या इतनी दूर नहीं निकल गई है, जिसके बाद बातचीत के तमाम रास्ते बंद हैं? अब तो सिर्फ लड़ाई है और लड़ाई में एक ही विकल्प होता है... जीत?

सुन्नर को किसी ने कुछ नहीं बताया था। दरअसल पिछले दिन बहन से तीखी झड़प होने के बाद उसने खुद सुन्नैर पर ध्यान रखना शुरू कर दिया था। उसने गुप्त विद्या के जरिए दंता और सुन्नैर की बातें सुन ली थी। उसे अपनी बहन के स्वभाव का अंदाजा था। एक क्षण में बड़ा से बड़ा फैसला करने वाली सुन्नैर राघव बदले दंता राकस को अपनाने को तैयार हो जाए यह कोई असामान्य बात नहीं थी। कोई भी फैसला लेने से पहले वह आगे-पीछे की परिस्थितियों पर विचार नहीं करती। खैर यह कोई बड़ी बात नहीं, इसीलिए तो ईश्वर ने उसे स्त्री बनाया है। उसे क्या परानपुर का नायक बनना है जो आगे-पीछे सोचने की बुद्धि की जरूरत होगी। उसे तो अपने लिए फैसला भी करना ही नहीं है। अभी उसके फैसले हम लोग कर रहे हैं, बाद में पति करेगा। परेशानी सिर्फ इतनी है कि माँ-बाबूजी के लाड़ ने उसे मनमौजी बना दिया है। वह बात समझती तो है ही नहीं, अदब भी भूल गई है... बहस करने लगी है। नहीं तो एक बार कह देता नहीं जाना है राकसों के पास... तो क्या मजाल थी कि कदम बाहर निकाले... मगर अब कहूँगा तो तर्क करेगी... ताने देगी... जिद्दी... बेवकूफ... और उसके हालात भी कैसे हैं... अपनी ही बहन पर तंत्र-मंत्र चलाना पड़ रहा है। उसे कैद करना पड़ रहा है... अब कोई समझे न समझे आने वाला वक्त जरूर इनसाफ करेगा कि उसने यह फैसला किन हालातों में लिया।

उसने पहले ही घर वालों को बता रखा था, सुन्नैर तो मनमौजी भी है, बिना सोचे-विचारे कुछ भी कर लेती है। कल उसकी शादी है और आज उसे कैसे राकसों के बीच भेजा सकता है। इसलिए मैने कुछ ऐसा कर दिया है कि वह अपने बिस्तर से उठ न पाए। जहाँ तक राकसों को सवाल है उन्हें तो मैं सँभाल लूँगा। आज भर की बात है। कल राकस भी विदा जाएँगे और परसों सुन्नैर अपने घर... फिर सब ठीक हो जाएगा।

मगर सब कुछ इतना आसान नहीं रहा। नए नायकजी का गणित दिमाग में भले ही साफ-सुथरा लग रहा था, धरती पर आते ही उलझने लगा।

दिन का पहला पहर बीता था, राघव को अचानक लगा कि कोई उसे पुकार रहा है। पहली बार उसने ध्यान नहीं दिया, जब दो तीन बार और ऐसा ही हुआ तो उसे लगा कि वह वहम का शिकार हो रहा है। कुछ देर उसने इस बात से अपना ध्यान हटाने की कोशिश की, मगर आधा पहर बीतते-बीतते उसके हालात बेकाबू हो चले थे। उसे लगने लगा कि अगर वह आज के आज परानपुर नहीं पहुँचा तो अपना दिमागी संतुलन खो बैठेगा। परानपुर पहुँचो, परानपुर पहुँचो की रट जोर-जोर से उसके दिमाग में ढोल बजा रही थी। उसने निकलने की तैयारी कर ली, परेशानी यह थी कि वह इस बात को किसी को बताए या नहीं। वह जिससे कहता वही उसे मना कर देता, कल शादी है आज यह बावरापन कैसा... और कहता भी तो कैसे... उससे खुद इतनी शर्मनाक बात जुबान से निकाली नहीं जाती... मगर बगैर कहे जाए भी कैसे... घरवाले परेशान हो जाते... उसने सबसे आसान रास्ता चुना। पत्र लिखा और दरबान को यह कहकर दे दिया कि दो पहर बीतने के बाद उसकी भौजाई को दे दे। रात अभी उतरी ही थी वह सुन्नैर के दरवाजे पर था।

हवेली वालों का हैरत में पड़ना स्वाभाविक था, मगर उसने जवाब सोच रखा था। एक साधु ने आज सुबह उसे बताया कि अगर आज शादी नहीं हुई तो दोनों का जीवन नरक हो जाएगा। वह घर पर भी किसी को बता नहीं पाया। साधु बड़ा कमाल का था, उसके आगे-पीछे की सारी बातें उसे जुबानी याद थी।

उसका जवाब सुनकर घर में लेटी सुन्नैर मुस्कुराई। उसका दाँव सटीक रहा। सुन्नर के चेहरे पर तनाव खिंच आया, सुन्नैर यह सब करने लगी है। मगर वह यह सब करके चाह क्या रही है? होने वाला दामाद खुद चलकर आया था और मजबूरी बता रहा था, टालना किसके बस में था। बिना ढोल-बाजा-बारात शादी की तैयारी शुरू हो गई।

इस बीच नए नायकजी के सामने एक और समस्या उठ खड़ी हुई थी। राकसों ने कुंड खोदने से इनकार कर दिया था। पूछ रहे थे, सुन्नैर क्यों नहीं आ रही है। भाड़ में जाए राकस, नहीं खुदवाना है और कुंड। हम लोग चार से ही काम चला लेंगे, मगर राकसों को विदा कैसे कराया जाए। बिना सुन्नैर के वे जाने को तैयार थोड़े होंगे और रात के अँधेरे में मारक बाण भी काम नहीं करेगा। सुबह तक का समय उसे चाहिए था। घोड़े पर सवार होकर वह खुद राकसों के पास पहुँच गया।

क्यों भाई, काम क्यों रोक दिया? आज तो दो कुंड खोदना है।

आँय, दो कुंड। चार तो खोद दिया, एक ही तो बचा है।

तुम भूल जाता है दंता सरदार। आखिरी रात दो कुंड खोदने का बात था।

दो क्या चार खोद देगा, मगर तुम्हारा बहिन क्यों नहीं आया।

आज भर उसको घर में रहने दो, कल तो तुम्हारे साथ चला ही जाएगा।

नायकजी, तुम कोई फरेब तो नहीं कर रहा। झूठ बोला तो तुम्हारा परानपुर लूट के ले जाएगा हम लोग समझा कि नहीं।

अरे दंता सरदार। तुम भरोसा रखो, सुबह होते-होते सुन्नैर यहीं होगी। अब मैं जाता हूँ, बहुत काम करना है। काम शुरू कर दो।

बहस की संभावना को टालकर सुन्नर ने निकलने में ही भलाई समझी। सुन्नैर ने घर बैठे ही भाई के इस फरेब को देख लिया था।

तय हुआ कि फिलहाल आज बिना किसी को बताए केवल रस्में पूरी कर ली जाएगी। विश्वस्त पंडित और नाई बुलाए गए और विवाह की रस्म शुरू कर दी गई। पूरे विवाह के दौरान सुन्नैर गठरी बनकर बैठी रही। बिना गीत नाद के संपन्न इस विवाह में बमुश्किल एक पहर का समय लगा। अभी ब्रह्म मुहूर्त भी नहीं हुआ था। दोनों एक कमरे में थे।

तो तुम आ ही गए?

तुमने ही पुकारा था? मुझे लग रहा था।

हाँ...।

पूछूँ, क्यों?

मत पूछो। अभी इस पल को जी लो, यह पल दुबारा नहीं आनेवाला।

सच है। बाद में तो बताओगी।

बाद का फैसला कौन कर सकता है। समय पर किसका वश है?

उलझी बातें करने की इसकी आदत गई नहीं। राघव ने खुद को किसी तरह रोका, नहीं, आज कोई कड़वी बात नहीं। कुछ अच्छा ही होने वाला है, वरना सुन्नैर उसे इस तरह पुकारे यह तो एक सपना ही था।

तुम मुझे प्यार करना चाहते हो न। करते क्यों नहीं? आज मैं पूरी तरह तुम्हारी हूँ।

आज? हमेशा के लिए कहो...

एक ही बात है। आज ही हमेशा है और हमेशा ही आज। खैर तुम इन बातों में मत पड़ो। तुमने मुझसे उस रात यह शरीर माँगा था...।

शायद मैं अपनी बात ठीक से नहीं कह पा रही हूँ... मुझे यह सब आता नहीं है न... शायद मेरी बात तुम्हें बुरी लग रही होगी... शायद मैं मेरी बातें प्यार करने की इच्छा को जगाने के बदले बुझा रही है... शायद मुझे बोलना बंद कर देना चाहिए... शायद ऐसे मौके पर मौन बेहतर काम करता है... उससे भी बेहतर उँगलियाँ... मुझे तुम्हारे एहसान का बदला चुकाना है... तुम मेरी पुकार पर कितने योजन से तीन पहर में मेरे पास आ पहुँचे। तुम मेरे लिए अपना सब कुछ देने के लिए तैयार हो। बदले में मुझे भी अपना सब कुछ दे देना चाहिए। कम से कम वह सब तो जरूर जो तुम्हें मुझसे चाहिए।

मेरी मदद करो राघव। मुझे उऋण होना है। मुझे प्रस्ताव करना नहीं आता, मगर तुम मेरी मदद करो। तुम्हारे अलावा मैं किससे कह सकती हूँ। पिता ने मुझे तुम्हारे हवाले कर दिया है।

ऐसी बातें तो कोई मदिरा के नशे में धुत्त होकर ही करता है। राघव सोच में पड़ गया। क्या हो गया सुन्नैर को?

तभी अचानक सुन्नैर हड़बड़ा उठी। ऐसा लगा जैसे उसके शरीर में बिजली दौड़ गई हो।

नहीं। यह तुमने गलत किया भाई। एहसान का ऐसा बदला...

सुन्नैर ने देखा सारे राकस धू-धूकर जल रहे थे। सुन्नर ने सुबह होते ही उनपर मारक बाण चला दिया था। वह गश खाकर बेहोश हो गई। पानी के छींटे डालकर राघव ने सुन्नैर को होश में लाया।

होश में आते ही सुन्नैर ने कहा, नए कुंड में चलोगे? चलो वहीं प्यार करेंगे।

तो ऐसी होती है सुन्नैर नायिका। एक पल में तोला, दूसरे पल माशा। इन हालातों में भी राघव के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई।

मगर नाव की व्यवस्था तो होगी न। नौका में प्रेम का आनंद ही कुछ और है।

हाँ। मगर अब जल्दी चलो।

नए खुदे कुंड में माया से बनी नैया पर सवार दोनों बीच में पहुँच गए थे। राघव कुछ गुनगुना रहा था। ठोढी पर हथेली रखे सुन्नैर कहीं देख रही थी या सोच रही थी यह समझ पाना राघव के लिए मुश्किल था। मगर वह इस रंग में भंग नहीं डालना चाह रहा था। सुन्नैर किसी यक्षिणी की मूरत की तरह लग रही थी। सब कुछ बहुत सुंदर था, राघव को लग रहा था कि उसने आखिरकार सब कुछ पा लिया है। तभी यक्षिणी की मूरत हिली, आँखें उसकी ओर मुड़ी।

तुम खुश हो?

हाँ, बहुत।

तुम मेरे लिए अपने प्राण दे सकते हो।

माँग कर देखो।

माँग लिया।

कहकर सुन्नैर ने अपनी साड़ी का पल्लू राघव के गले में डाल दिया।

दोगे न?

पल्लू का दबाव राघव के गले पर कसने लगा। वह अवाक था, न कुछ कह पा रहा था, न ही विरोध कर पा रहा था। कुछ ही देर में वह नहीं था, तड़पता हुआ उसका शरीर शांत हो चुका था। सुन्नैर घूर कर कुछ देर तक उस शरीर को देखती रही। फिर उसने कुंड में छलाँग लगा दी। वह नीचे उतरती गई... उतरती गई बहुत नीचे।

दो दिन तक कुंड को परानपुर हवेली के सिपाही घेरे रहे। लोगों का आना-जाना प्रतिबंधित था। लाशें निकाली गईं। तीन दिन बाद अपने पति को ढूँढ़ती हिरन्नी रानी परानपुर पहुँची, उसने अपने पति को हाथ फैलाए खड़े देखा जो गुलमोहर का पेड़ बन चुका था। कुंड के पास एक कटोरी में दूध-भात रखा था। रोती हुई हिरन्नी ने अपने बेटे से कहा, कहती थी न तेरी नई माय तुझे दूध-भात खिलाएगी। खा ले...

इस दौरान हवेली का फाटक महीनों बंद रहा। सालों इस कहानी की चर्चा उठते ही लोग चुप हो जाते थे। मगर आज उस इलाके के लोग सुन्नर नायक का नाम बड़े उत्साह से लेते हैं। कहते हैं, उसी के प्रताप से परानपुर में हरियाली लौटी।




परिशिष्ट : तटबंध के पिंजरे में लाखों जिंदगानियाँ

यह उन लाखों कोसीवासियों के दुख की कहानी नहीं है जिन्होंने 2008 में कुछ महीने कोसी की बलखाती लहरों के थपेड़ों के बीच गुजारे बल्कि यह उन दूसरे लाखों लोगों की दास्तान है जो चालीस साल से इस नदी के थपेड़ों से जूझ रहे हैं। बाढ़ से मुक्ति के नाम पर हुए प्रयोग में सरकार ने इस नदी को जब तटबंधों के बीच कैद किया तो उस पिंजरे से वह इन लाखों लोगों को बाहर निकालना भूल गई। पिछले पचास से अधिक सालों से पिंजरा बंद है और सामने भूखी बाघिन। लोग बार-बार पिंजरे के उस कोने में दुबकते की कोशिश करते हुए जी रहे हैं जहाँ बाघिन का झपट्टा या उसकी निगाह न पहुँचे। यह दास्तान उन्हीं लाखों कोसी पीड़ितों की है।

17 अगस्त 2008 पचास से अधिक सालों से तटबंधों के बीच कैद कोसी नदी ने खुद को इस कैद से पूरी तरह आजाद कर लिया और बिल्कुल नए इलाके में बहने लगी। पूरी की पूरी 1 लाख 71 हजार क्यूसेक जल प्रवाह वाली इस नदी ने सिल्ट से भर चुके अपने पुराने रास्ते और 16 फीट ऊँचे तटबंध को तोड़कर नया रास्ता बना लिया यह सोचे बगैर कि उस राह में खेत है या मकान है या कस्बा है या गाँव। यह सोचना उसका काम था भी नहीं, यह तो सरकारों, नीति नियंताओं और उन्हें लागू करने और उनकी देखभाल करने वाले अभियंताओं का काम था। मगर उन लोगों ने पिंजरे में बंद बाघिन को वैसी सुविधाएँ नहीं दी जिससे उसका मन पिंजरे में लगा रहे (वैसे किसका मन पिंजरे में लगता है, आजादी किसको प्यारी नहीं होती), तो उस बाघिन का बाहर निकल आना तो इसी बात पर निर्भर था कि वह कब पिंजरे को तोड़ पाती है। बहरहाल ऐतिहासिक आपदा आई और छह-सात महीने तक उत्तर-पूर्वी बिहार के तकरीबन साढ़े पाँच सौ गाँवों में ठहरी रही। आपदा बड़ी खबर बनी और उस खबर ने करोड़ों की राहत सामग्री और हजारों मददगारों को आमंत्रित किया। वैसे तो जब लोग मुसीबत में हों तो ऐसी बातें करना उचित नहीं होता, मगर कोसी नदी के सबसे बड़े विशेषज्ञ दिनेश कुमार मिश्र ने उस वक्त ही यह सवाल उठा दिया कि क्या यह मदद उन साढ़े तीन सौ गाँव के लोगों को मिल पाएगी जहाँ अगले साल ऐसी ही बाढ़ आएगी औैर हर साल बाढ़ आती ही है। बाढ़ जिनके जीवन में एक आपदा या एक घटना न होकर स्थायी उपस्थिति के रूप में एक रूटीन के रूप में दर्ज हो गई है। जैसे मार्च में होली आती है, अप्रैल में गर्मियाँ शुरू होती है, जून-जुलाई में मानसून शुरू होता है, अक्टूबर-नवंबर में विजयादशमी, दीपावली और छठ वैसे ही अगस्त में बाढ़। उनके लिए अगस्त का महीना बाढ़ का महीना होता है और इससे लड़ने के लिए वे जून-जुलाई से ही तैयारियाँ शुरू कर देते हैं बाढ़ का पानी जब तक उतरता नहीं वे टापुओं की तरह अपने-अपने घरों में दुबके रहते हैं, सारा काम नाव से करते हैं। बाहरी दुनिया से बस जरूरत भर का संपर्क होता है। अक्टूबर में जब पानी उतरने लगता है तो दुर्गा माँ के स्वागत की तैयारियों के साथ उनके जीवन का सवेरा शुरू होने लगता है। यह कहानी एक-दो गाँव की नहीं पूरे साढ़े तीन सौ गाँव की है औैर यहाँ आपका ध्यान खीचना चाहूँगा कि साढ़े तीन सौ और साढ़े पाँच सौ की संख्या में ज्यादा फर्क नहीं होता। इन्हीं साढ़े पाँच सौ गाँवों को बाढ़ की आपदा से बचाने के लिए कोसी नदी के दोनों किनारों को ऊँचे तटबंधों से बाँधा गया है और उन तटबंधों के बीच साढ़े तीन सौ गाँव भी कैद हो गए हैं जिन्हें हर साल उसी बाढ़ की आपदा को झेलता पड़ता है। आप सोचते होंगे कि सरकार ने कम से कम दो सौ गाँवों को तो बचा लिया। जी नहीं, आप गलत सोचते हैं, तटबंध बनने के बाद जो नदियाँ कोसी में मिलती थीं वह अब इस नदी में मिल नहीं पाती, लिहाजा तटबंधों के दोनों किनारों में पूरे साल जलजमाव का नजारा होता है और इस जल जमाव में 4.26 लाख हेक्टेयर जमीन डूबी रहती है। यहाँ उल्लेखनीय तथ्य यह है कि कोसी तटबंध परियोजना का लक्ष्य कुल 2.14 लाख हेक्टेयर जमीन को बाढ़ से बचाना था।

इतना सब कुछ जानने के बाद यह सवाल सहज ही मन में उठता है कि आखिर ऐसी विषम परिस्थितियों में ये लोग रहते ही क्यों हैं? क्या इनका पुनर्वास नहीं हुआ? इसका जवाब है कि इन लोगों के साथ पुनर्वास के नाम पर जो कुछ हुआ वह एक धोखा साबित हुआ। सरकार ने बहुजन हिताय के नाम पर इनसे जो कुर्बानी ली उसने इन लाखों लोगों की जिंदगी तबाह कर दिया। आज जो कुछ नर्मदा घाटी में हो रहा है, उससे कहीं बड़ी त्रासदी है कोसी पीड़ितों की कहानी। कोसी के लाखों लोगों के साथ हुआ यह अभियांत्रिकी प्रयोग कहीं अधिक हृदय विदारक है। मगर आज भी यह कहानी सात पर्दों के पीछे छुपी है।

देश की दूसरी नदियों की तरह कोसी का स्वभाव शांत और निर्मल नहीं है। इसके स्वभाव में अल्हड़पन औैर मतवालापन अधिक है। वर्तमान में यह नदी जहाँ बहती है, महज 150 साल पहले वह यहाँ से 100 मिलोमीटर पूर्व में बहा करती थी। इसके बाद से वह हर 20-25 साल पर अपना रास्ता बदलकर पश्चिम की ओर खिलकती रही और इस दौरान इस इलाके में भारी तबाही मचाती रही। कोसी नदी के इस व्यवहार के पीछे इस नदी द्वारा लाए गए सिल्ट की अत्यधिक मात्रा बताई जाती है। इस नदी में मौजूद सिल्ट की मात्रा के बारे में एक ब्रिटिश वैज्ञानिक एफ.सी. हस्र्ट ने 1908 में कहा था 'कोसी नदी हर साल लगभग 5 करोड़ 50 लाख टन गाद लाती है और मेरा अनुमान है कि इसमें से 3.7 करोड़ टन गाद वह अपने आसपास के इलाके में डाल देती है। 3.7 करोड़ टन गाद का मतलब लगभग 1.96 लाख घनमीटर होता है।' हर वर्ष इतनी मात्रा में गाद लाने के कारण नदी की पेटी बहुत जल्द ऊँची हो जाती थी और मजबूरन उसे अपना रास्ता बदलकर निचले इलाके में बहने के लिए मजबूर होना पड़ता था। बहरहाल नदी के इस स्वभाव के कारण स्थानीय लोगों को भारी तबाही का सामना करना पड़ता था। इसके अलावा सालों-साल आने वाली बाढ़ और इसके कारण फैलने वाली हैजा, मलेरिया और कालाजार जैसी बीमारियाँ अलग थीं। त्रस्त जनता अपने नेताओं से इसकी गुहार लगाती और नेता इस गुहार को केंद्रीय प्रशासन तक पहुँचाते। ब्रिटिश सरकार तो इस समस्या के समाधान के प्रति जरा भी इच्छुक नहीं थी, उन्हें जनता के दुख दूर करने के लिए करोड़ों खर्च करने की क्या पड़ी थी? ऐसे में जब भारत आजाद हुआ और देश की कमान पं. जवाहर लाल नेहरू जैसे संवेदनशील और वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले नेता ने सँभाली तो कोसी वासियों में उम्मीदें जगीं कि पंडितजी उनकी इस समस्या का कोई न कोई हल जरूर निकालेंगे।

जब समस्या उनकी निगाह में लाई गई तो इसके बेहतर समाधान के रास्ते तलाशे जाने लगे। उस समय कई विकल्पों पर विचार किया गया और अंततः इस समाधान पर सहमति बनी कि भारत-नेपाल सीमा पर भीमनगर कस्बे के पास कोसी नदी पर एक बराज बनाया जाए और इस अल्हड़ नदी को दो तटबंधों के बीच गिरफ्तार कर लिया जाए। फिर जैसा कि आम तौर पर ऐसी खर्चीली इंजीनियरिंग आधारित समाधानों के साथ होता है, इस परियोजना से कुछ अन्य फायदों की गुंजाइश निकाली गई। यानि पूर्वी और पश्चिमी कोसी नहर परियोजनाएँ जिससे तकरीबन 10 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई का लक्ष्य रखा गया था और इसके अलावा सुपौल जिले के कटैया में 16 मेगावाट क्षमता वाली जल विद्युत परियोजनाएँ।

कागज पर यह परियोजना इतनी सम्मोहक थी कि अभियंताओं और देश के नीति नियंताओं ने इसके नफा-नुकसान का बारीकी से आकलन किए बगैर इसे मंजूरी दे दी। पहले तो स्थानीय लोगों को लगा कि इस परियोजना से उनके दिन फिर जाएँगे, पूरा इलाका पंजाब-हरियाणा की तरह हरा-भरा होगा और खेतें सोना उगलेंगी। मगर उनकी यह आस छलावा साबित हुई। आज की तारीख में परियोजना शुरू होने के 57 साल बाद भी पश्चिमी कोसी नहर परियोजना का एक चौथाई काम भी पूरा नहीं हुआ है, इसकी लागत जरूर हर साल बढ़ती गई है। यह परियोजना अपने लक्ष्य के 7 फीसदी से भी कम जमीन की सिंचाई कर पाती है। पूर्वी कोसी नहर परियोजना भी कुछ हद तक ही सफल हो पाई है। इस परियोजना का काम पूरा हो चुका है, मगर इसके बावजूद यह अपनी क्षमता के 20 फीसदी भूभाग की ही सिंचाई कर पाती रही है, मगर हाल के दिनों में नहरों में इतना बालू भर गया है कि पिछले एक दशक से इन नहरों से सिर्फ बाढ़ का पानी आता है, सिंचाई नहीं हो पाती। हाँ, हर साल नहर से सिंचाई की लागत वसूलने वाली सरकारी पर्ची जरूर आ जाती है और इसका भुगतान न करने पर जमीन के मालिकाना हक से महरूम करने का खतरा बना रहता है। कटैया विद्युत परियोजना भी बालू भर जाने के कारण बंद ही रहती है।

अब कुछ बातें बाढ़ नियंत्रण की, जो इस परियोजना का प्रमुख लक्ष्य रहा है। नदी को बाँधने वाला तटबंध अपने निर्माण के बाद के 47 सालों में 7 बार टूट चुका है, जिसके कारण सैकड़ों गाँव तबाह होते रहे हैं। इसके अलावा इन तटबंधों के कारण होने वाले जलजमाव से 4.26 लाख हेक्टेयर जमीन लगभग पूरे साल डूबी रहती है, जबकि इस परियोजना का लक्ष्य 2.14 लाख हेक्टेयर जमीन को बाढ़ से सुरक्षा देना रहा है। लगभग पचास साल पहले पूरी हुई इस परियोजना का हिसाब-किताब आज की तारीख में कौन ले? मगर हद तो इस बात की है कि इस उदाहरण से आज की तारीख में सबक सीखने के लिए भी कोई तैयार नहीं।

यह तो कोसी परियोजना की विडंबना की कहानी है जिसके बारे में श्री दिनेश कुमार मिश्र ने अपनी किताब 'दुई पाटन के बीच में' में विस्तार से लिखा है। यह किताब मूलतः उन्हीं लाखों लोगों के कष्टमय जीवन के बारे में है जो कोसी नदी के दो पाटों यानि तटबंधों के बीच में फँसे हैं। तटबंध निर्माण के वक्त जैसा कि राजनेता किया करते हैं, उन्होंने लोगों को गोल-मटोल लहजे में आश्वासन दिया कि इस परियोजना से जो भी लोग प्रभावित होंगे सरकार उन्हें बेहतर जमीन और बेहतर पुनर्वास उपलब्ध कराएगी। पचास साल पहले के लोगों के लिए पुनर्वास की तिकड़में अनजानी थी, उन्होंने सहज विश्वास कर लिया। जब पुनर्वास की बारी आई तो सरकार ने बड़ा ही रोचक समाधान तैयार किया। इसके मुताबिक तटबंध के अंदर जो जमीन है वहाँ बाढ़ की समस्या साल में सिर्फ तीन महीने रहेगी, यानि वहाँ की जमीन पर खेती करने में कोई परेशानी नहीं। ऐसे में लोगों को न तो वहाँ की जमीन का मुआवजा मिलेगा और न ही उसके बदले में जमीन। हाँ उनके घरों के बदले कुछ लोगों को जमीन उपलब्ध कराई गई और कुछ लोगों को घर के बदले दो किस्तों में नकद मुआवजा देने की बात कही गई। जिन लोगों को जमीन दी गई उनकी जमीन तटबंध के कारण देरसबेर जलजमाव का शिकार हो गई और जिनसे मुआवजा का वादा किया गया उनमें से अधिकांश को मुआवजे की एक किस्त से ही संतोष करना पड़ा। इसके बाद आने वाले समय में लोगों की समझ में आया कि अगर खेत घर से पाँच किलामीटर की दूरी पर भी हो तो खेती करना और फसल की रक्षा कर पाना बहुत कठिन व्यवसाय साबित होता है। ऐसे में कुछ लोगों ने अपने पैतृक जमीन को औने-पौने दाम में बेचकर दिल्ली-पंजाब की राह पकड़ ली और बाकी बचे लोग पुनर्वास में मिली जमीन का मोह त्याग कर वापस उसी नर्क में पहुँच गए जहाँ उनकी आजीविका का साधन उनके खेत थे।

ऐसे लोगों के लिए अब सामने नदी थी और माथे पर सवार उनकी किस्मत। सरकार तो इतनी दूर थी कि उनसे भेंट-मुलाकात छठे-छमाही ही हो पाती। लिहाजा एक अजीब सी स्थिति पैदा हुई। तटबंधों के बीच जहाँ लाखों लाचार लोग रह रहे हैं, वहाँ न तो स्कूल हैं, न बिजली, न डाकघर, न फोन-मोबाइल और अस्पताल व थाना-पुलिस भी नहीं। यानी इक्कसवीं सदी के शुरुआत में वहाँ सोलहवीं सदी का नजारा देखा जा सकता है। सवारी के नाम पर घोड़ा, बैलगाड़ियाँ और नाव। हर चार-पाँच साल में या तो बाढ़ उनके आशियाने को उजाड़ देती है या फिर नदी से आने वाला बालू उनके घरों को भर कर रहने लायक नहीं छोड़ता। लिहाजा विस्थापन दर विस्थापन। तटबंधों के अंदर कई ऐसे परिवार हैं जो सत्रह बार विस्थापित हो चुके हैं। वहाँ रात के वक्त अगर कोई गंभीर रूप से बीमार पड़ जाए तो उसका भगवान ही मालिक होता है, क्योंकि सुबह होने से पहले उस पिंजरे से निकल पाने का ना तो रास्ता होता है और न ही लोगों में उस अँधेरे बियाबान में निकलने की हिम्मत। आपस के झगड़े लोग खुद सुलझाते हैं, चूँकि वहाँ पुलिस नहीं है ऐसे में ताकतवर ही अक्सर सही साबित होता है। बार-बार आने वाली बाढ़ के कारण खेतों का सीमांकन मिट जाता है, फिर फैसला ताकत के जोर पर होता है। फिर भी लोग रहते हैं, क्योंकि दूसरा कोई बेहतर विकल्प नहीं है। सरकार उन्हें अक्सर भूल जाती है, जब याद आता है तो उनका तर्क यही होता है कि इन लोगों ने अपनी मर्जी से वहाँ रहने का फैसला किया है, हमने तो उनका बेहतर पुनर्वास किया था। अब अगर वे वहाँ रहने के बदले यहाँ रह रहे हैं तो जरूर उन्हें यहाँ फायदा नजर आ रहा होगा।

अगस्त 2008 में जब नदी ने अपना रास्ता बदल लिया तो इस इलाके के लोग काफी खुश हुए कि नदी ने उन्हें बख्श दिया है, अब दुबारा लौटकर उनके गाँव नहीं आएगी। मगर एक बार फिर समाधान के मसले पर इन लोगों के बदले इंजीनियरों की चली और नदी को फिर से सफलतापूवर्क इन्हीं तटबंधों के बीच बहने को मजबूर कर दिया गया। अब नीतीश सरकार इन तटबंधों पर पक्की सड़कें बनवा रही है, ताकि आवागमन की सुविधा हो और तटबंधों की बेहतर निगरानी की जा सके। मगर इस अभियान में उन हजारों लोगों के घर उजड़ रहे हैं, जो बार-बार के विस्थापन से परेशान होकर अपने इलाके से सबसे सुरक्षित स्थान माने-जाने वाले इन तटबंधों पर ही झोपड़ियाँ बनाकर बस गए थे। खैर उनका क्या? उन्हें तो उजड़-उजड़कर बसने की आदत हो चुकी है। सरकार इसी तरह लोगों की भलाई के नाम पर ठेका कंपनियों और इंजीनियरों का घर बसाती रहे।

          

          


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