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कविता

नरम ऊन का बढ़िया स्वेटर
विशाल श्रीवास्तव


यह सर्दी की कँपा देने वाली रात है
और कोई मेरे लिए कहीं
अपने मुलायम हाथों से बुन रहा है
नरम ऊन का बढ़िया स्वेटर
 
मेरा यह स्वेटर 
कानों और दिमाग की बर्फ पिघला देगा
मेरा चेहरा पानी कर देगा
 
स्वेटर पहनते ही मैं
बड़का आदर्शवादी बन जाऊँगा
घर के बाहर चिंदियाँ समेटते लड़के
और घर में काम करने वाली बाई
के बारे में सोचूँगा क्रमशः
 
मेरे यह स्वेटर पहनते ही 
कई उपकथाएँ जन्म लेंगी
बदल जाएँगे भाषाओं के व्याकरण
कलाओं और शिल्प के प्राचीन शास्त्र
असमय बदलने लगेंगी ऋतुएँ
दिशाएँ बदल लेंगी अपनी जगहें परस्पर
 
इस तरह स्वेटर 
दुनिया भर को ऊष्मा से भर देगा
पहले जैसे नहीं रह जाएँगे
सारे ग्रह उपग्रह और नक्षत्र
 
वाकई स्वेटर जैसी छोटी चीज के सहारे
कितने बड़े बड़े वायदे किये जा सकते हैं।
 

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