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कविता

जुकाम
विशाल श्रीवास्तव


थोड़ी और भारी लगने लगती है दुनिया
जुकाम होने पर
एक उदास नमी से भर जाती है आवाज
गले में एक खिच् रहने लगती है
किसी जिद्दी किरायेदार की तरह
 
कुछ भी तो ठीक नहीं लगता जुकाम में
आराम की सारी चीजों से होने लगती है समस्या
अच्छी लगने वाली हर बात मन को चुभने लगती है बेमतलब
 
अजीबोगरीब रोग होता है जुकाम
इसमें सबसे पहले पढ़ना-लिखना छोड़ना होता है
कोई दिलासा भी नहीं देने आता इसमें
सिर्फ इसके होने भर से नहीं मिलती दफ्तर से छुट्टी
इससे होने वाली तकलीफों के बारे में बात करना
बिल्कुल भी नहीं माना जाता सयानापन
जुकाम होने पर बलगम से ज्यादा
नए-नए नुस्खों से भर जाता है दिलोदिमाग
जिन्हें आने वाली हर छींक से उड़ा देने का मन करता है
 
यह जुकाम
यूँ कोई बड़ा अंतर नहीं पैदा करता जीवन में
घर में रहने वाले तमाम दुखों के बीच
एक और दुख रहने लगता है आकर चुपचाप
बनाकर अपने लिए थोड़ी सी जगह
 

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