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कविता

कहीं न कहीं रहता है प्रेम
विशाल श्रीवास्तव


मैं चूमता हूँ एक निशान
माथा नहीं है यह तुम्हारा
तकिये पर तुम्हारा सिर रखने से बनी
गोल और सुडौल जगह है यह
 
इसमें रचा हुआ है 
तुम्हारे अदृश्य आँसुओं का नमकीन स्वाद
इस जगह में रहस्य हैं
मेरी जानकारी से बहुत-बहुत ज्यादा
इस जगह पर जमी हुई है पीड़ा
मेरे सामर्थ्य से बहुत–बहुत अधिक
 
यह जगह एक पक्का घरौंदा है
तुम्हारी सारी अधूरी इच्छाओं का
यहीं छिपा रखे हैं तुमने मेरे सारे इनकार
 
एक अनूठी गंध से भरा हुआ है यह निशान
इस पर चिपके हुए हैं किसी भ्रूण सपने के तिनके-रेशे
यहाँ की गर्माहट में है तुम्हारे माथे का ताप
 
फिर भी बहुत सी उम्मीदों का माध्यम है यह निशान
यही बताता है कि तमाम कमियों के बावजूद
कहीं न कहीं रहता है प्रेम
हमारी देहों में हल्के बुखार की तरह।
 

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