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कविता

गरम चाय का गिलास
विशाल श्रीवास्तव


चाय से ज्यादा उम्मीद से भरा है
गरम चाय का गिलास
जैसे अदम्य जिजीविषा से भरी है
उसकी एक-एक बूँद
लगातार लड़ते रहने की मुहिम में
यही देता है सबसे बड़ा सहारा
 
चाय का गिलास ही देता है
हमारे डूबते विश्वास को थोड़ी शक्ति
धूल और पसीने से भरे मुश्किल वक्त को
आसानी से काटता रहता है यह
सिर्फ इसके ही दम पर चलते हैं
जरदोजी, सिलाई और हाथ के हुनर के तमाम काम
जिनके बिना मुश्किल है दुनिया का चल पाना
 
गली किनारे के तमाम खोखों में
शर्तें लगती हैं चाय के गिलास की
जैसे उसके ही भरोसे तय होता हो
जिंदगी का सारा हिसाब-किताब
उसके ही अद्भुत द्रव में 
बसता है सारा धैर्य और उल्लास
 
कितनी दोस्तियाँ और संबंध
टिके रहते हैं इसी एक चीज के सहारे
सचमुच कितनी अजीब जगह है यह दुनिया
जहाँ बड़ी बड़ी चीजें टिकी रहती हैं
एक छोटी सी चीज के सहारे।
 

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