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कविता

वह प्रेम करना चाहता है
विशाल श्रीवास्तव


वह प्रेम करना चाहता है
यूँ जब उसकी कुछ खास उम्र नहीं रह गई है ऐसी
कि समय के साथ पकता हुआ वह 
ऐसी कच्ची आकांक्षाओं के लिए जिए
फिर भी वह ऐसा करना ही चाहता है
 
वह जीता रहा है लगातार
अपनी असफलताओं के साथ
और असफल होने में इतना माहिर और शातिर है वह 
कि उम्र के इस मोड़ पर 
एक अदद असफल प्रेम करना चाहता है
मुझे पता है अपने इस नियोजित शगल की शुरूआत
वह एक सादे झूठ से ही करेगा
जौ ‘मैं तुम्हें सचमुच चाहता हूँ’ जैसा
कोई चालू मुहावरा भी हो सकता है
पता नहीं वह क्या और कितना हासिल कर पाएगा
इतने घिसे हुए झूठ से 
पर लगातार निष्फल होता हुआ वह
घिसी और बदरंग चीजों के साथ जीता हुआ वह
कुछ इसी तरीके से प्रेम करना चाहता है
उसके पास अपने व्यक्तिगत अँधेरे की कुछ परछाइयाँ हैं
जिन्हें वह इस नाटक में रंग-दृश्य की तरह इस्तेमाल करेगा
वह यह अपना आखिरी असफल प्रेम
पूरी प्रतिभा और कुशलता के साथ करेगा
वह चाहता है असफलता का अधूरापन
उसके आसपास मेह की तरह बरसे
उसे पूरी और अच्छी चीजों की बिल्कुल आदत नहीं
 

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