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कविता

पोस्टकार्ड
विशाल श्रीवास्तव


बहुत सारे पतों से बैरंग लौटकर
मुझ तक पहुँच गया है यह पोस्टकार्ड
और यह भी इसका गलत पता है
किसी मशहूर आदमी के नाम का नहीं है यह
बावनदीघा गाँव से शहर कमाने आए
बंसीलाल का नाम पड़ा है इस पर
 
टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा हुआ है यह
इंतजार के धूसर धब्बों से चमकते हैं इसके अक्षर
बहुत सारे ब्यौरों से भरा हुआ है यह -
पिता खाँस रहे हैं पोस्टकार्ड में
उदास माँ स्वेटर बुन रही है पोस्टकार्ड में
बच्चे टाटा कर रहे हैं पोस्टकार्ड में
पत्नी लिख रही है पोस्टकार्ड
पोस्टकार्ड में तैरता है गाँव का पुराना पोखर
पोस्टकार्ड बताता है नए अन्न का स्वाद
मास्टर जी आशीर्वाद दे रहे हैं पोस्टकार्ड में
पोस्टकार्ड में टपकता है वर्ष का पहला आम
 
पोस्टकार्ड में गालियाँ दे रहा है क्रुद्ध बनिया
पोस्टकार्ड में धमका रहा है गुमाश्ता
परती पड़ रहा है खेत पोस्टकार्ड में
 
एक स्त्री डर रही है पोस्टकार्ड में
उसने भेजने से पहले भींचा है इसे
अपने धड़कते हुए सीने पर
पोस्टकार्ड में दबी है उसके पसीने की महक
 
पता नहीं कहाँ रहता है यह बंसीलाल
मुझसे ज्यादा उसके मतलब का है यह पोस्टकार्ड
उसका पूरा गाँव आजकल
इस पोस्टकार्ड में रहता है
 

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