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कविता

ओ पीले पत्ते
विशाल श्रीवास्तव


ओ पीले पत्ते
यूँ ही नहीं रुका हूँ तुम्हारे पास
इसकी वजहें हैं 
 
तुम्हारी शिरा की नोक पर रुका पानी
जो रुकते रुकते गिरने वाला था और 
अभी गिरते गिरते रुक गया है
जिसकी रंगत ठीक वैसी है
जैसी विगत प्रेमिकाओं की आँखों की कोर के तरल की
जब वे बाजार में मुझे मिलती हैं अपने बच्चों के साथ
लेकिन यह पानी क्यों रुका है तुम्हारी शिरा पर
क्या तुम आज किसी के लिए दुखी हो
ओ पीले पत्ते
 
यह तुम्हारा सम्मोहक झुकाव
जिसे देखकर मुझे
कौसानी के पहाड़ी पेड़ की वह पत्ती याद आती है
जो वहाँ पंत के झोंपड़े के पीछे
ठीक उसी अंश में झुकी थी जैसे तुम
ठीक उसी तरह सजल थी जैसे तुम
 
कहीं तुम उसके बदमाश प्रेमी तो नहीं हो 
ओ पीले पत्ते
 
अजीब हो यार तुम भी
दुनिया भाग रही है तुम्हारे आस-पास 
अपनी-अपनी घृणा के थैले उठाए हुए
और तुम हो कि कर रहे हो प्यार
उस सुदूर पत्ती से 
सिर्फ इसलिए कि 
वह भी ठीक उसी तरह झुकी है
जैसे तुम
 
ओ पीले पत्ते 
चिढ़ हो रही है मुझे तुमसे
ये क्या बात हुई 
आदमियों की तरह प्यार करने की
गुस्सा आ रहा है मुझे तुम पर बेहद 
अच्छा होगा मैं तुमसे विदा लूँ
 
मिलूँगा तुमसे फिर किसी उदास रात को 
जब मैं दुखी रहूँगा थोड़ा ज्यादा
मेरी शिराओं की नोक पर भी 
कुछ रुका हुआ होगा
डूबा रहूँगा मैं भी किसी सांद्र  द्रव में 
ठीक तुम्हारी ही तरह।
 

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