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आलोचना

‘मैं मृत्यु से बड़ा हूँ’
अमरेंद्र कुमार शर्मा


सिर्फ यही आखिरी बात कहकर चला जाऊँगा मैं
    (नवजागरण की यात्रा में रवीन्द्रनाथ टैगोर)

भारत और विश्व के ज्ञान और बौद्धिकता के भूगोल में 'नदी', 'यात्रा' और 'स्वप्न' का सबसे अधिक महत्व है। दुनिया की सभ्यताओं के विकास, संस्कृतियों के निर्माण और राजनैतिक इच्छाओं में इन तीनों का विशेष महत्व हमें इतिहास की 'क्लोज रीडिंग' से मिलता है। वास्कोडिगामा से लेकर हुवेङ् सांग, अलबरुनी से लेकर इब्न बतूता और बर्नियर, नागार्जुन से लेकर राहुल सांकृत्यायन जैसे सैकड़ों नाम हमारे सामने हैं जिनकी यात्राओं और उनके देखे स्वप्नों ने इस 'दुनिया' को दुनिया के अर्थों में रचा। यूरोप और भारत की पुनर्जागरण चेतना में भी नदी, यात्रा, स्वप्न का निर्णायक महत्व रहा है। इस पहलू पर इतिहास के तमाम मोड़ों के माध्यम से नए ढंग से अध्ययन, विश्लेषण की आवश्यकता है जो अन्य संदर्भों में करने की योजना मेरे मन में बनी हुई है।

मुझे रवीन्द्रनाथ ठाकुर की नवजागरण यात्रा के बारे में सोचते और लिखते हुए सबसे पहले उनके द्वारा 1882 में लिखी प्रसिद्ध कविता 'निर्झर का स्वप्न भंग' की यह पंक्ति बार - बार याद आ रही है -

मैं शिखर-शिखर पर दौड़ लगाऊँगा,
    पर्वत-पर्वत पर लौट जाऊँगा,
    ठठाकर हँसूँगा, कल-कल स्वरों में गाऊँगा गान
    प्रत्येक ताल पर तली बजाऊँगा।

 

अरे, मेरे चारों ओर
    यह कठिन कारागार क्या है?
    तोड़ो तोड़ो, इस कारा को भंग करो
    आघातों पर आघात देते चलो।
    अरे, आज पक्षी ने कौन-सा गाना गाया है?
    सूर्य की किरणें आई हुई हैं

 

गुरुदेव की इन पंक्तियों के साथ और कई पंक्तियों को पढ़ते हुए मेरे मन में गुरुदेव के बारे में एक साथ कई-कई बातें संबद्ध और असम्बद्ध रूप में याद आने लगती हैं, जिन्हें पढ़ते हुए, बहस करते हुए जानने की ललक बनी रहती थी। यहाँ मैं उनकी नवजागरण - यात्रा को समझने के लिए मुख्य रूप से उनके प्रसिद्ध उपन्यास ''गोरा' 'का सहारा लेना चाहूँगा। जाहिर हैं इस यात्रा में 'गोरा' 'के साथ रवीन्द्रनाथ टैगोर की अन्य रचनाएँ भी कभी साथ हो गई है और कभी दूर चली गई हैं। लेकिन उससे पहले गुरुदेव का समय और स्वयं गुरुदेव के बारे में जरूरी बात आपके सामने रख देना उचित होगा।

7 अगस्त, 1941, सावन की पूरनमासी का दिन, बादल अपने पाँखें समेट रहा था, रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपनी आँखें मूँद ली थीं। एक सम्पूर्ण सांस्कृतिक मनुष्य का अवसान हमारी धरती के हिस्से में उस दिन शामिल हो गया था। हमारी पीढ़ी को उनकी सर्जना का ऋणी होना चाहिए। रवीन्द्रनाथ ठाकुर राजनीतिक व्यक्ति नहीं बल्कि भारत के भूगोल में एक सांस्कृतिक मनुष्य के रूप में याद किए जाते हैं। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध के साथ-साथ संगीत, चित्रकारी (सत्तर की उम्र में उन्होंने चित्रकारी की शुरुआत की थी क्योंकि वे मानते थे कि 'जिसे बात से नहीं कहा जा सकता उसे चित्र से कहना पड़ता है), अभिनय और स्थापत्य के विलक्षण चितेरे थे। यह महत्वपूर्ण है कि महात्मा गांधी रवीन्द्रनाथ को 'गुरुदेव' कहा करते थे और रवीद्रनाथ महात्मा गांधी को 'महात्मा 'कह कर पुकार रहे थे। हम जानते हैं कि दोनों में कुछ बुनियादी सहमतियाँ थीं लेकिन दुनिया को देखने के दृष्टिकोण में अंतर भी कम नहीं था। इन दोनों को हम बीसवीं सदी के भारत का चेहरा कह सकते हैं और पुनर्जाग्रत होते भारतीय समाज की बौद्धिक उपस्थिति भी।

उन्नीसवीं सदी की फिजा में तैरती वे तमाम घटनाएँ जो भारतीय भूमि पर पुनर्जागरण - चेतना की लौ जलाने का प्रयास कर रही थीं, कहीं न कहीं रवीन्द्रनाथ ठाकुर के लिए एक सांस्कृतिक जमीन तैयार कर रही थीं। भारतीय अस्मिता अपनी जगह तलाश कर रही थी, अपने को स्थापित करने की प्यास लगातार बढ़ती जा रही थी। यह प्यास हमे बड़े पैमाने पर तत्कालीन समय के विचारकों में दिखलाई पड़ती है। 1828 में राजा राममोहन राय द्वारा ब्रह्म समाज की स्थापना की गई जिसका 1843 में देवेन्द्रनाथ ठाकुर (रवीन्द्रनाथ के पिता) ने नेतृत्व किया था। 1829 में विलियम बेंटिक ने सती प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया था। केशवचन्द्र सेन द्वारा महाराष्ट्र में प्रार्थना समाज की स्थापना की गई थी। 1875 में दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना मुंबई में की। यंग बंगाल आंदोलन में हेनरी विवयन देरेजियो द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जा रही थी। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में आंदोलन चलाया। इनके द्वारा बंगाल में लगभग 35 महिला विद्यालयों की स्थापना की गई। थियोसॉफिकल सोसायटी की स्थापना 1875 में न्यू यॉर्क में और 1879 में भारत के मद्रास शहर में की गई। 1888 में एनी बेसेंट इस सोसायटी की सदस्य बनीं। आधुनिक शिक्षा देने का प्रयास ईसाई मिशनरियों द्वारा बड़े पैमाने पर किया जाने लगा। इसी जमीन पर रवीन्द्रनाथ का उपस्थित होना उनकी चेतना को एक ओर समृद्ध कर रहा था; तो दूसरी ओर बीसवीं सदी के पहले दशक की उन तमाम घटनाओं को देखें जिससे रवीन्द्रनाथ रू-ब-रू हो रहे थे और उनकी विचार-सरणि प्रभावित हो रही थी। भारत और खास तौर से बंगाल इस दशक में अपने स्वरूप में काफी बदलावों को सहेज रहा था। 1905 में बंगाल विभाजन; स्वराज पार्टी की स्थापना, 1906 में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना, 1907 में कांग्रेस का विभाजन और नरम दल गरम दल के बीच उग्र राष्ट्रवाद का उदय, 1908 में खुदीराम बोस को फाँसी, बाल गंगाधर तिलक की प्रखरता का उदय, 1909 में मार्ले-मिन्टो सुधार के तहत साम्प्रदायिक निर्वाचन पद्धति की शुरुआत जैसी कई घटनाएँ घटीं। रवीन्द्रनाथ की समूची विचार-प्रणाली (सरणि) में 19वीं और 20वीं शताब्दी की पृष्ठभूमि और घटनाएँ सम्मिलित हुई हैं। रवीन्द्रनाथ कुछ बुनियादी बातों पर चिंतनशील थे, उनके जेहन में पूरब और पश्चिम की अवधारणा और उन पर बहस थी तो दूसरी ओर प्राच्य और पाश्चत्य के विकल्पों पर बहस। उन्नीसवीं शताब्दी के आखिर में लिखे उनके लेख और बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक समय में लिखे उनके लेख अगर देखे जाएँ तो हमें रवीन्द्रनाथ के विचार में होते हुए परिवर्तन दिखलाई देते हैं, खास तौर से पूरब और पश्चिम; प्राच्य और पाश्चात्य चिन्तन के मसलों पर। 1887 में 'ए करेस्पांडेंस' नामक लेख में उन्होंने लिखा - 'जान पड़ता है कि आधुनिक विज्ञान के सारे अन्वेषण शांडिल्य, भृगु और गौतम ऋषियों को मालूम थे। दुःख है कि वेद-पुराण का युग बीत गया है। 1888 में 'प्रीचिंग' नामक लेख में; 'ईसाई धर्म गिराकर हमें अपने हिंदू धर्म की रक्षा करनी है।' रवीन्द्रनाथ का यह विचार उनके 1901 के 'पूर्वी और पश्चिमी सभ्यता' वाले लेख में और भी अधिक तीक्ष्ण होकर सामने आता है ; 'चाहे हम स्वतन्त्रता प्राप्त कर लें अथवा पराधीन ही रहें, किन्तु हमें अपने समाज में हिन्दी सभ्यता को पुनर्जीवन देने की आशा कभी नहीं त्यागनी चाहिए। हमारे इतिहास, धर्म, समाज या गार्हस्थ्य जीवन में राष्ट्र निर्माण को स्वीकार नहीं किया है।' यह विचार सरणि 1907 के बाद से परिवर्तित होता हुआ दिखलाई पड़ती है। दरअसल प्राच्यवाद से पाश्चात्यवाद की ओर रवीन्द्रनाथ का आकर्षण प्राच्यवाद की प्रबल संकीर्णता और सामंती मूल्यबोध के कारण कम हो रहा था और विज्ञान के विकास के साथ पाश्चात्यवाद ने तर्क की एक सरणि विकसित कर ली थी जिसमें रवीन्द्रनाथ को जनता की मुक्ति की आशा दिखलाई पड़ रही थी। दरअसल रवीन्द्रनाथ के सामने एक बुनियादी समस्या थी कि 'हमारा देश सर्वदा शास्त्रों और पंडों से निर्देशित हुआ है, इसलिए विदेश से आये हुए सिद्धांतों को वेदवाक्य समझने की ही प्रवृत्ति हम में है, क्योंकि हमारा मन आसानी से मुग्ध हो जाता है।' जिसे उन्हें अपनी रचनाओं के माध्यम से हल करना था। भारत में पुनर्जागरण की चेतना पैदा करने में रवीद्रनाथ के लेखन की बड़ी भूमिका मानी जाती है। इस चेतना में अपनी पहचान ( अस्मिता ) कायम करने का मुद्दा सबसे प्रबल दिखलाई देता है। यह मुद्दा समाज के हर चरण में हमें मौजूद दिखलाई देता है। दरअसल, रवीन्द्रनाथ की दुनिया में जमीन से निकलने वाली जन परम्पराओं की सुगंध और आधुनिकता की तर्कणा शक्ति मौजूद थी। परम्परा और आधुनिकता रवीन्द्रनाथ के यहाँ द्वंद्व के रूप में मौजूद है। इसी द्वंद्व से पहचान के सवालों को समझने की कोशिश गुरुदेव के यहाँ मिलती है। रवीन्द्रनाथ के लेखन और चिन्तन की यात्रा को भारत में पुनर्जागरण की यात्रा के साथ भी देखा जाना चाहिए। कुछ नमूने के तौर पर हम उनकी रचनात्मक यात्रा को देख सकते है

'अस्त्रहीन होने पर शत्रु को किस प्रकार युद्ध में हराया जा सकता है।' - स्कूली जीवन (जिसे गुरुदेव पसंद नहीं करते थे ) की यह मौलिक चिंता रवीन्द्रनाथ की दुनिया को एक भिन्न किस्म का आकार दे रही थी। उसी दौरान अपने दादा ( द्वारकानाथ, जो राजा राममोहन राय के निकट सहयोगी थे ) द्वारा उत्साह बढ़ाने पर कविता की पंक्ति का लिखा जाना रवीन्द्रनाथ के लिए हिरन के बच्चे में नए सींग निकलने जैसा उत्साह भर रहा था। 'गीत गोविन्द' को पढ़ते हुए उनकी अनुभूति मूक हो जाया करती थी। उन्होंने अपनी 'जीवन-स्मृति' में लिखा - 'गीतगोविंद को मैंने कितनी बार पढ़ा है बतला नहीं सकता। जयदेव जो कुछ कहना चाहते हैं वह कुछ भी मैंने नहीं समझा, लेकिन छंद और कथा को मिलाकर मेरे मन में जिस चीज की सृष्टि हुई वह मेरे लिए सामान्य नहीं है।' अपनी कविताओं में गुरुदेव ने कई बार जयदेव को याद भी किया है। साहित्य के उदेश्य और उसके सरोकारों पर रवीन्द्रनाथ की दृष्टि बेहद पैनी है, वे अपने लेख 'वास्तविकता' में साहित्य का लगभग एक एजेंडा प्रस्तुत करते हैं, वे कहते हैं - 'लोग अगर साहित्य से शिक्षा पाने की चेष्टा करें तो पा भी सकते हैं; लेकिन साहित्य लोगों को शिक्षा देने की बात ही नहीं सोचता। किसी भी देश में साहित्य ने स्कूल मास्टरी का जिम्मा नहीं लिया।' दरअसल रवीन्द्रनाथ साहित्य को अपने समय के सामाजिक इतिहास के रूप में देखते है जिसमें उनका मंतव्य बहुत ही साफ है। वे कहते हैं - 'साहित्य का विचार करते समय दो चीजें देखनी होती हैं। पहली, विश्व पर साहित्यकार के ह्रदय का अधिकार कितना है; दूसरी, उसका कितना अंश स्थायी आकार में व्यक्त हुआ है।' यह विचार गुरुदेव को उनके समकालीनों में सबसे अलग इस अर्थ में करता है कि अब तक संभवतः किसी ने भी यह नहीं कहा था कि 'विश्व पर साहित्यकार के ह्रदय का अधिकार' होना चाहिए। रवीन्द्रनाथ साहित्य को एक अंतरानुशासनात्मक विधा के रूप में देखते थे, वे यह मानते थे कि, 'चित्र और संगीत ही साहित्य के प्रधान उपकरण हैं। चित्र भाव को आकार देता है और संगीत भाव को गति देता है। चित्र देह है और संगीत प्राण।' ('साहित्येतर तात्पर्य', मासिक 'बंग दर्शन 'में नवम्बर - दिसम्बर 1903 में प्रकाशित)

1932 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में गुरुदेव ने विश्वविद्यालय के स्वरूप पर एक भाषण दिया था। वह भाषण अपने आप में नई सदी के शिक्षा-संकुलों के लिए एक परिपत्र की तरह हो सकता है। इस भाषण में ऐसी कई बातें हैं जिन पर अलग से बहस की जा सकती है। मैं यहाँ तीन बातें इस भाषण से उद्धृत करना चाहूँगा -

कवि की कीर्ति स्तंभ की तरह नहीं , नौका की तरह होती है। भँवरों को पार करते हुए काल-स्रोत की सभी परीक्षाओं और संकटों से यदि वह नौका उत्तीर्ण हो सके , और अंत में यदि उसे लंगर डालने के लिए अच्छा-सा घाट मिल जाये , तभी।

साहित्य के स्थायी इतिहास-ग्रंथ के किसी पृष्ठ पर उसका नाम अंकित होता है।

देश की जनता के सारे दुरूह प्रश्नों से महत्वपूर्ण प्रयोजनों और तीव्र वेदनाओं से हमारे विश्विद्यालय विछिन्न हैं।

सार्थक विश्विद्यालय वही हैं जो ऐसे शिक्षकों को आकर्षित करता है , जहाँ शिक्षा की सहायता से मनोलोक की सृष्टि होती है। यह सृष्टि ही सभ्यता का मूल है। लेकिन हमारे विश्विद्यालयों में इस श्रेणी के शिक्षक न होने से भी काम चलता है - शायद और भी अच्छी तरह चलता है।

आजादी के बाद छीजते और बदलते मूल्यों, संवेदनाओं का कोई संस्थानीकरण नहीं हुआ था। नई आर्थिक नीति के उभार ने समस्त मानवीय पहलुओं को संस्थानों और पण्य वस्तुओं में बदल दिया है। जाहिर है शिक्षा का ढाँचा और उसके नियामक तन्त्र ने प्रश्नाकुलता को सीमित कर दिया है। भारत के तमाम विश्विद्यालय गैर-उत्पादक कार्यों में इस कदर व्यस्त हैं कि उनके हाथ से शिक्षा का महत्वपूर्ण एजेंडा छूटता जा रहा है। बदलते समय ने हमारे समय को असहनशील और असम्वेदनशील बनाया है। गुरुदेव का समय कदाचित ऐसा नहीं था लेकिन ब्रितानी हुकूमत ने भी भारतीय समय को बहुत आहत कर रखा था, गुरुदेव की रचनाओं में हमे यह दिखलाई देता है। `

रवीन्द्रनाथ के समय में साम्राज्यवाद विरोध, राष्ट्र प्रेम और आजादी के संघर्ष को एक ही अर्थों में समझने का प्रचलन दिखलाई पड़ता है। गुरुदेव के यहाँ राष्ट्रीय स्वाधीनता से ज्यादा जरूरी सामाजिक स्वाधीनता है। भारतीय पुनर्जागरण चेतना में यही सामाजिक स्वाधीनता का एजेंडा प्रमुखता से हमारे सामने आता है। जैसा कि हमने पहले कहा है कि रवीन्द्रनाथ कोई राजनैतिक व्यक्ति नहीं थे लेकिन उनके लेखन में जिन मुद्दों की उपस्थिति है वह तत्कालीन समय की चिंता और उसके अवबोध से उत्त्पन्न है। वे कहते हैं - भारत में जो विपुल धन था वह किस तरह द्वीपांतरित हुआ है, यह यदि हम भूल जाएँ तो आधुनिक इतिहास का एक प्रमुख तत्व हम समझ नहीं सकेंगे। आधुनिक राजनीति की प्रेरणा शक्ति वीर्याभिमान नहीं, धन का लोभ है।' 'हमारे पास अन्न नहीं, विद्या नहीं, पीने का पानी कीचड़ छानकर मिलता है, लेकिन चौकीदारों का आभाव नहीं है। मोटी तनख्वाह वाले अफसर भी हैं, उनका वेतन, 'गल्फ स्ट्रीम' की तरह सीधे ब्रिटेन के सहित-निवारण के लिए चला जाता है।' 'हमारे और अंग्रेजों के बीच कोई आत्मीयता का आकर्षण तो है ही नहीं। सारे भारत को जलियाँवाला बाग बना देना उनके लिए असम्भव नहीं था।' अपने समय में भारत को समझने की यह पेशकश रवीन्द्रनाथ में विविधतापूर्ण अतीत और उससे निकल कर आने वाले बौद्धिक उद्यमों से निःसृत हुई थी। ब्रिटिश राज के विरोध का आन्दोलन रवीन्द्रनाथ के लिए महज आजादी का संघर्ष नहीं रह गया था बल्कि वह एक बड़े फलक पर राजनीतिक, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक गरिमा की रक्षा के संघर्ष के रूप में उपस्थित था। रवीन्द्रनाथ अपने समय के ज्वलंत मुद्दों पर स्पष्ट राय रखने वाले मनीषी थे। महात्मा गांधी के विदेशी कपड़ों के बहिष्कार के मुद्दों पर उन्होंने कहा, 'महात्मा जी ने जब विदेशी कपड़ों को अपवित्र कहा था, मैंने उनकी बात का विरोध किया था; मैंने कहा था, विदेशी कपड़ा आर्थिक दृष्टि से हानिप्रद हो सकता है, अपवित्र नहीं हो सकता। चरखा और सूत कातने के मसले पर भी गुरुदेव के बुनियादी सवाल रहे हैं। रवीन्द्रनाथ ने 2 अक्टूबर 1937 को जब शांतिनिकेतन में गांधी जयंती मनाई थी तब उस अवसर के लिए लिखे अपने लेख में कहा था कि 'महात्मा गांधी ने यह दिखाया है कि हत्याकांड को आश्रय दिए बगैर भी स्वाधीनता पाई जा सकती है,' तब वे दरअसल अपने छुटपन की उस चिंता का निराकरण कर रहे थे, जिसे हमने उपर कहा है कि 'अस्त्रहीन होने पर शत्रु को किस प्रकार युद्ध में हराया जा सकता है।'

रवीन्द्रनाथ ठाकुर के उपन्यास 'गोरा', घर-बाहर, आँख की किरकरी, चार अध्याय आदि अपने पात्रों के माध्यम से अपने समय की विसंगतियों और उनसे उबरने की परिस्थितियों और अपनी अस्मिता की पहचान का द्द्भुत उदहारण हैं। 'गोरा' और घर-बाहर को हमें पुनर्जागरण की रोंशनी में जहाँ अपनी पहचान स्थापित करने की प्रबल इच्छा है, देखा जाना चाहिए/अध्ययन करना चाहिए। यह कहना विषयान्तर नहीं होगा कि उनका विसर्जन नाटक संभवतः पशु-बलि के विरोध पर भारतीय साहित्य का पहला नाटक है। लाल कनेर, मुकुट, डाकघर, राजा आदि नाटकों और काबुलीबाला, पोस्ट मास्टर, अतिथि जैसे कहानियों के रचयिता को हमें आधुनिक भारत की द्वंद्व-कथा के वाचक के रूप में, भारतीय अस्मिता के चिंतक और 'मेह बरसता टापर-टुपुर' के कवि के रूप में बार-बार पढ़ना चाहिए। जैसा कि मैंने उपर कहा है, यहाँ 'गोरा' उपन्यास के माध्यम से रवीन्द्रनाथ टैगोर की यात्रा को नवजागरण के आईने में देखने की कोशिश होगी। इस कोशिश की सीमाओं का आभास मुझे है और इसकी वजह बड़ी ही ठोस है और वह है रवीन्द्रनाथ का लिखा इतना विपुल और विविधतापूर्ण है कि सबको एक साथ समेट लेना मुश्किल है।

रवीन्द्रनाथ टैगोर अपने प्रसिद्ध लेख 'विश्व-साहित्य 'में लिखते हैं - 'समस्त साहित्य को, समस्त मनुष्यों के चारों ओर एक बार इसी तरह देखना होगा। देखना होगा कि मनुष्य अपनी वास्तविक सत्ता को भाव की सत्ता में अपने चारों ओर भी बहुत दूर तक बढ़ाकर ले गया। उसकी वर्षा के चारों ओर कितने गीतों की वर्षा, काव्यों की वर्षा, कितने मेघदूत, कितने विद्यापति फैले हुए हैं, अपने छोटे घर के सुख-दुःख को उसने कितने चन्द्र - सूर्यवंशी राजाओं के सुख-दुःख की कहानी के बीच बड़ा कर लिया है।'

जार्ज लुकाच ने 'द थियरी ऑफ नावेल' (1920) में लिखा है - 'उपन्यास का जन्म तब होता है जब मनुष्य और संसार के बीच समरसतापूर्ण संबंध भंग हो जाता है।... यह ऐसी दुनिया का महाकाव्य है जिसे ईश्वर छोड़कर चला गया है।'

'गोरा' के बारे में रवीन्द्रनाथ टैगोर और जार्ज लुकाच के कथन से शुरू करने के पीछे उदेश्य बहुत साफ़ है, भारतीय समाज औपनिवेषिक ढाँचों में कई स्तर पर बिखरा हुआ था, उसे समेटने और समरसतापूर्ण ढाँचों में बदलने के कई क्षेत्रीय प्रयास बहुत मुक्कमल नहीं थे। एक लेखक जिसकी सबसे बड़ी ताकत कलम होती है, अपने समाज की मूल चिंताओं को हमारे सामने लाने और विश्लेषित करने की कोशिश करता है। जब 'गोरा' लिखा जा रहा था तब के भारत को गौर से देखा जाना चाहिए, भारतीय जनमानस अपने 'होने' को लेकर, अपने सरोकारों को लेकर काफी चिंतित दिखलाई देता है, अपने धर्म, अपने समुदाय, अपनी जातीय बोध को लेकर एक तड़प बराबर मौजूद है। तत्कालीन समय के विचारकों के कार्यों में, जिसका संक्षिप्त विवरण मैंने उपर दिया है, यह तड़प और बेचैनी मौजूद रही है। गुरुदेव के सामने ऐसे कई प्रसंग थे जिन्हें उन्होंने अपने उपन्यासों, कहानियों में सिरजा है। रवीन्द्रनाथ के यहाँ सुख-दुःख के बीच वास्तविक सत्ता और भाव सत्ता का चिंतन और लुकाच की समरसतापूर्ण चिंताओं में उनके अपने समाज के सरोकार शामिल रहे हैं। उनके संदर्भ से 'गोरा' उपन्यास में हम अस्मिता के प्रश्नों के माध्यम से नवजागरण की यात्रा को तलाश करें, इससे पहले हमें 'अस्मिता' को समझ लेना चाहिए। अस्मिता के शब्दकोशीय अर्थ में गए बिना हम उसके व्यावहारिक, सैद्धांतिक पक्षों पर संक्षिप्त बात करेंगे।

यूँ तो अस्मिता एक प्राचीन अवधारणा है लेकिन विगत दशकों में अस्मिता का प्रश्न काफी चर्चित रहा है। यह प्रश्न एकरेखीय नहीं है बल्कि यह भिन्न-भिन्न कोणों से अभिव्यक्त हो रहा है। जातिपरक, लिंगपरक, रंगपरक, नस्लपरक, भाषापरक अस्मिता की बहसों में फॅंसा हुआ समाज या कि राष्ट्र अपने बनते बिगड़ते स्वरूप में मोटे तौर पर दो प्रकार की अस्मिता की बात करता है, वर्चस्वपरक अस्मिता और प्रतिरोधपरक अस्मिता। वर्चस्वपरक अस्मिता और प्रतिरोधपरक अस्मिता लगभग एक ही प्रकार की अवधारणा पर भिन्न अर्थों में बहस कर रही है। दोनों का आधार या तो नस्ल है या धर्म, लिंग, जाति, भाषा आदि। अस्मिता के बनने-बिगड़ने की आज यही वास्तविकता है जिसे पूँजीवाद से उपजे हुए सवाल, कहकर सरलीकृत तरीके से खारिज नहीं किया जाना चाहिए। नस्लपरक या अन्य अस्मिता की श्रेष्ठता साबित करते हुए हम उसे यदि वर्चस्वपरक अवस्था में खींच लाना चाहते हैं तो यह भी ठीक है कि इसी के प्रतिरोध के आधार पर दूसरे भी नस्लपरक या अन्य अस्मिता की मुखालफत करें। लेकिन इसमें ध्यान रखना होगा कि हमारी नस्लपरक या अन्य अस्मिताएँ हमें किसी नई किस्म के तानाशाहों के हवाले न कर दें। वस्तुतः साम्राज्यवाद या राष्ट्रवाद की अवधारणा एक किस्म से अस्मिता का साम्राज्यवाद या राष्ट्रवाद है। इसमें यह विश्लेषित करने की आवश्यकता नहीं कि अस्मिता की अवधारणा 'अन्य 'की उपस्थिति के बिना संभव नहीं है। जब हम मूल्यों और विचारों की नहीं, केवल और केवल अस्मिता की बात करते हैं, तब अस्मिता के नाम पर 'नई तानाशाही' का जन्म होता है। इसमें हम किसी मनुष्य पर उसकी जन्मजात अस्मिता को सदा के लिए लाद देते हैं। यह एक तरह से सारे जनसमुदायों, संस्कृतियों को मनमाने ढाँचे में तब्दील कर देने जैसा है। हमें लग रहा होगा कि अन्ततः यह एक फासिस्ट राजनीति जैसी है। वर्तमान राजनीतिक ढाचों में क्या यह नहीं लग रहा है कि भारतीय परिक्षेत्र में बनाई जा रही अस्मिता इसी रणनीति का एक हिस्सा है, मसलन हिन्दुत्व की अस्मिता।

'गोरा' 1907-10 के बीच रवीन्द्रनाथ ठाकुर का लिखा गया एक महत्वपूर्ण उपन्यास है। इस उपन्यास में मुख्य बहस हिन्दू समाज और ब्रह्म समाज के बीच है। हिन्दू समाज ब्रह्म समाज को पतित और गिरा हुआ 'ख्रिस्तान' मानता है और ब्रह्म समाज हिन्दू समाज को कट्टर और कर्मकांडी मानता है। इन दोनों के बीच कई पात्र आपस में बहस करते हैं, संवाद करते हैं और हर हाल में अपनी पहचान, खास पहचान बनाए रखना चाहते हैं।

टैगोर ने 'व्हाट इज नेशन' (राष्ट्र क्या है, 1901) में एक सैद्धांतिक विचार सूत्र दिया है - राष्ट्र = प्राचीन स्मृतियाँ (प्राचीन गौरव) + आधुनिक पारस्परिक समझौता (वर्तमान इच्छा)। इस सूत्र से टैगोर अपने उपन्यास 'गोरा' में बहुत दूर तक चलते दिखलाई देते हैं। आगे चलकर वे स्वेदशी आन्दोलन से पृथक हो जाते हैं। लगभग 1907 ई. के बाद से टैगोर के सामाजिक विचारों में एक नवीन परिवर्तन देखा जा सकता है, जो अंत तक बना रहा है। प्राच्यवाद से पाश्चात्यवाद की ओर टैगोर का आकर्षण वस्तुतः प्रबल प्राच्यवाद की संकीर्णता के कारण रहा होगा, साथ ही पाश्चात्य के आधुनिक तकनीकी विकास और ज्ञान के मार्ग को आसान बना देने के कारण उसके प्रति आकर्षण पैदा हुआ होगा। मामला जो भी रहा हो, टैगोर की विचार प्रणाली नवीन अंगड़ाई ले रही थी। इसी संक्रमण काल की उपज है, 'गोरा'।

'गोरा' बन्धनों से उन्मुक्त श्वास के समान तत्कालीन जीवन की परंपरा विरोधी धाराओं को अभिव्यक्त कर रहा था। वस्तुतः 'गोरा' को पूर्ण जागरण चेतना (भारतीय) का लघु-चित्र कहा जा सकता है। इसमें ऐसे कई प्रश्न गति कर रहे हैं जिन्हें हम आज भी अपने सामने देख रहे हैं। लगभग सौ बरस बाद भी 'गोरा' के कई पात्र हमारे आस-पास के वातावरण में जीवित हैं, परिसंवाद कर रहे हैं। निश्चित रूप से अस्मिता के व्यापक होते अर्थ में नस्ल, जेंडर आदि के बीच 'गोरा' का पाठ हमें नए तरीके से सोचने को मजबूर करता है। नया तरीका क्या हो सकता है? क्या 'गोरा' उपन्यास के कुछ पात्र जो गौण है, या कि जो परिसंवाद में सीधे-सीधे भाग नहीं लेते हैं मसलन, लछमिया, कृष्णदयाल, शशिमुखी आदि अपने महत्वपूर्ण पात्रों के परिसंवाद को बल प्रदान करते हैं या कि उनके विचारों के 'कन्ट्रास्ट' को व्यक्त करने के लिए है। क्या लोक व्यवहार में हिन्दुत्व की जो अवधारणा काम कर रही है, इसके परिसंवाद या बहस में वही हिन्दुत्व है? क्या अस्मिता का प्रश्न मात्र तर्क का प्रश्न है या कि व्यावहारिक जीवन में जुड़ने और जुड़ जाने का प्रश्न है? इसके अलावा भी कई नये तरीके हो सकते हैं जिनमें 'गोरा' को निरे उपन्यास की तरह न पढ़कर इतिहास के आख्यान के रूप में पढ़ा जा सकता है जबकि यह एक उपन्यास ही है जो पुनर्जागरण चेतना के दौर में लिखी गई।

'गोरा' की सम्पूर्ण संरचना गोरा, विनय, सुचरिता, ललिता, हारान बाबू, परेश बाबू, महिम, कृष्णदयाल, आनन्दमयी, हरिमोहिनी आदि विभिन्न पात्रों के बीच विन्यस्त है। इनके बीच स्थान और सन्दर्भ बदलते रहते हैं, पात्रों की संख्या भी घटती-बढ़ती रहती है, परन्तु प्रश्न मौजूद है, चिंताएं व्याप्त हैं - अस्मिता का, आस्तित्विक चेतना का अथवा पुनर्जागरण का। यूँ तो यह उपन्यास संवादों के बीच फैला हुआ है, जो एक तार्किक परिणति की ओर तेजी से भाग रहा है, लेकिन इन संवादों के भीतर एक प्रेम कहानी भी पल रही है, एक आक्रामक प्रेम कहानी। इस प्रेम कहानी की भी अपनी एक अस्मिता है। इसकी अस्मिता किसी अन्य अस्मिता से कम महत्वपूर्ण नहीं है। यह प्रेम कहानी भी अपने रचाव में अपना एक 'स्थान' तलाश रही है, एक अपना 'समय' चाह रही है जिसमें वह परिभाषित हो, हालाँकि परिभाषित होना महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है, एक रागात्मक पर्यावरण की मौजूदगी पैदा करना। यह रागात्मक पर्यावरण निरी भावुकता की किस्म का नहीं जैसा कि सुधा और चन्दर (गुनाहों का देवता - धर्मवीर भारती) के बीच का प्यार या कि निरी शुष्क बौद्धिकता के पर्यावरण से उपजा प्यार रेखा और भुवन (नदी के दीप - अज्ञेय) के बीच। यह प्रेम कहानी जो धीरे-धीरे, चुपके-चुपके आगे बढ़ रही है, रागात्मक व बौद्धिक दोनों पर्यावरण में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही है। यह प्रेम कहानी है, गोरा व सुचरिता के बीच जिसमें फॅंसे हुए हैं हारान बाबू और विनय व ललिता के बीच जिसमें उलझा हुआ है हिन्दू समाज और ब्रह्म समाज। इसका परिणाम क्या हो सकता है, उपन्यास का अन्त हमें बताता है। बड़े ही रोचक और नाटकीय ढंग से इसका उल्लेख हम बाद में करेंगे। पहले हम कुछ और प्रश्नों से रूबरू हो लें।

क्या रवीन्द्रनाथ टैगोर अपने विचारों को बताने के लिए यह उपन्यास लिख रहे हैं या परम्परागत संस्थाओं की रक्षा करने के उद्देश्य से ? क्या यह उपन्यास लेखक के आन्तरिक द्वन्द्व का प्रमाण है? क्या यह किसी वैयक्तिक पहलू या पारिवारिक या सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक पहलू का बयान है? क्या इस उपन्यास के विचार व्यापक जनसमुदाय, विभिन्न वर्ग, वर्ण, जातियों, उपजातियों, धर्म, उपधर्म आदि को प्रभावित करता है? उत्तर, 'हाँ 'या 'ना 'के रूप में या सिक्के के 'हेड' या 'टेल' के रूप में नही दिया जा सकता। वह भी तब जब हम 'एथनिक कॉनफ्लिक्ट', युद्धों और पर्यावरण के संकट से झूझती दुनिया और सबकुछ को हजम/हड़प कर जानेवाली आर्थिक दुनिया में बन रहे, मिट रहे समीकरणों के बीच इस उपन्यास को पढ़ रहे हों।

बहरहाल, हम लौटते हैं, 'गोरा' के टेक्स्ट की ओर जहाँ 'गोरा' एक द्वन्द्व का शिकार है, उसके व्यक्तित्व का विभाजन है। यह द्वन्द्व तत्कालीन समय का भी है। जाहिर है, रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस द्विभाजन को किसी खास प्रयोजन के साथ ही रखा होगा। 'गोरा' के व्यक्तित्व का द्विभाजन यह है कि वह एक आयरिश दम्पति का पुत्र है, जिसकी खबर 'गोरा' को नहीं है (लेकिन पाठक को है) और वह अपने आप को एक हिन्दू परिवार में पला-बढ़ा विशुद्ध हिन्दू मानता है। यह सच भी है कि उसका लालन-पालन हिन्दू परिवार में हुआ है और वह हिन्दू धर्म की शुद्धता को बनाए रखने की हर सम्भव कोशिश करता है। यह कोशिश आक्रामक है। ठोस है। और कहीं न कहीं थोड़ी संशयग्रस्त भी। पाठक को यह पता है कि यह ऐसे पात्र की कोशिश है जो स्वयं हिन्दू नहीं है। यह विडम्बना ही है कि जो कुछ वह नहीं है, उसकी रक्षा और उस पर विश्वस्त तरीके से लगातार बहस कर रहा है। हम चाहें तो इस विडम्बना को राजनैतिक पहलू से भी जोड़ कर देख सकते हैं, जहाँ मूल्य, नैतिकता आदि पर बात करनेवाले स्वयं उससे कोसों दूर होते हैं, उससे हीन होते हैं। आइए, हम 'गोरा' के कुछ संवादों को नवजागरण के आईने में देखें -

· ''बिलकुल ठीक! मैं उसे बाँधकर ही रखूँगा। जब तक तुम उस ख्रिस्तान नौकरानी लछमिया को छुट्टी नहीं दे देती तब तक तुम्हारे कमरे में खाना नहीं हो सकेगा।'' (पृष्ठ 20)

· ''आप जिसे कुप्रथा कहते हैं, केवल अंग्रेजी किताबें रटकर कहते हैं, स्वयं उसके बारे में कुछ नहीं जानते।'' (पृष्ठ 54)

· गोरा ने कहा, "मैं हिन्दू हूँ। हिन्दू तो कोई दल नहीं हुआ, हिन्दू तो एक जाति है। यह जाति इतनी बड़ी है कि इसका जातित्व किसमें है यह किसी परिभाषा में बाँधा ही नहीं जा सकता, समुद्र जैसे उसकी लहरें नहीं है वैसे ही हिन्दू कोई दल नही है।" (पृष्ठ - 340)

'गोरा' के ऐसे कई संवाद हैं जिनमें वह अपनी अस्मिता को हिन्दू अस्मिता के भीतर पहचान रहा है। यह पहचान उसकी नितांत वैयक्तिक नहीं है बल्कि सामुदायिक है - हिन्दू समुदाय। जब गोरा' को यह खबर होती है कि वह हिन्दू है और उसे अपने पिता का श्राद्ध करने का अधिकार नहीं है, तब लगता है कि गोरा और उपन्यास दोनों अपनी मुक्ति की राह तलाश रहे (या पा चुके हैं?) हैं। गोरा के कुछ आखरी संवाद -

· गोरा ने गरजकर कहा, "रहने दीजिए उनका नाम! मैं नहीं जानना चाहता।'' (पृष्ठ 449)

· गोरा ने कहा, ''नहीं, मैं हिन्दू नहीं हूँ। । आज भारतवर्ष के उत्तर से दक्षिण तक सब देव मन्दिरों के द्वारा मेरे लिए बन्द हो गए हैं - सारे देश में आज किसी समाज में किसी पंगत में मेरे बैठने के लिए जगह नहीं है।'' (पृष्ठ 452)

गोरा जिस अस्मिता के साथ पूरे उपन्यास में छाया रहा, उसका द्वन्द्व और विडम्बना के रूप में यह अन्त कि मैं हिन्दू नहीं हूँ, टैगोर ने हिन्दू के तथाकथित कर्मकांडीय स्वरूप पर चोट की है। हम चाहें तो टैगोर, गोरा और तत्कालीन परिवेश के माध्यम से और भी कई निष्कर्ष निकाल ले जाएँ, लेकिन सवाल निष्कर्ष का नहीं बल्कि अस्मिता का है जिसमें गोरा के अलावा भी और कई पात्र हैं। एक ही समाज में रहने वाले कई लोग, जो अपनी भूमिका बिना इतिहास में दर्ज हुए निभाते चले जाते हैं।

विनय गोरा का मित्र है। विनय भी हिन्दू है, परन्तु कट्टर नहीं। गोरा से उसका मतभेद रहा करता है जबकि दोनों एक ही परिवेश की उपज हैं। विनय की अस्मिता अलग ढंग से परिभाषित होती है, यह अलग ढंग गोरा की उपस्थिति में जितना दिखता है उतना ही अनुपस्थिति में भी। विनय का एक संवाद देखिए -

· ''विनय ने हॅंसकर कहा, "आपसे सच ही कहता हूँ, मेरे विश्वास में गोरा जैसा जोर नहीं है। जब जाति-भेद के बन्धन और समाज के विकारों को देखता हूँ तब कई बार सन्देह भी प्रकट करता हूँ, किन्तु गोरा का कहना है कि बड़ी चीज को छोटा करके देखने से ही सन्देह उत्पन्न होता है।''

· ''जिसे आप जाति-भेद का फल कहती हैं व अवस्था का फल है, केवल जाति-भेद का नहीं।'' (पृष्ठ 110)

· ''देखिए, सूर्य के उदय की वैज्ञानिक लोग एक ढंग से व्याख्या करते हैं और साधारण लोग एक दूसरे ढंग से। इससे सूर्य के उदय का विशेष कुछ घटता-बढ़ता नहीं है।'' (पृष्ठ 112)

हम कह सकते हैं कि विनय का यह संवाद उसे एक अलग तरह की पहचान देता है। वह अपनी उपस्थिति के प्रति सजग है, अपनी अस्मिता, अपनी भूमिका के प्रति चेतस है। लगता है, टैगोर गोरा के समक्ष विनय को काउन्टर चरित्र के रूप में खड़ा कर रहे हों, या कि गोरा का बदला हुआ संस्करण विनय लग रहा हो, ट्रान्सफॉर्म्ड स्वरूप में जो कभी-कभी मिलता हो और कभी-कभी पृथक हो जाता हो। विनय का शशिमुखी से शादी करने से इन्कार और ललिता से बढ़ता हुआ रागात्मक संबध एक खास प्रयोजन के कारण है। विनय हिन्दू समाज से है और शशिमुखी भी। ललिता, जो सुचरिता की बहन है, ब्रह्म समाज से है। वस्तुतः टैगोर हिन्दू समाज और ब्रह्म समाज के बीच चली हुई बहसों के द्वारा दो पात्रों को खड़ा करते हैं, जो मिलना चाहता हो, मिल नहीं पा रहा हो। विनय ब्रह्म समाज में शामिल होना चाह रहा है ताकि ललिता से वह शादी कर सके और तमाम विवादों को खत्म कर सके। वह अपनी अस्मिता को ललिता की अस्मिता से मिलाकर एक नई अस्मिता की तलाश में है जिसमें सहयोग है, संघर्ष नहीं। ललिता विनय को ब्रह्म समाज में आने से रोकना चाहती है और उसे हिन्दू धर्म में रहते स्वीकार करना चाहती है। भारतीय नारी की यह क्रान्तिधर्मिता वस्तुतः पूर्ण जागरण चेतना के प्रभाव में आए बदलाव के कारण है। तकनीक और ज्ञान के रास्ते ने उसके सामने कई विकल्प खोल रखे हैं। ललिता के संवाद -

''पहले मुझे लगता था कि कि ब्रह्म समाज ही एकमात्र दुनिया है और उसके बाहर जो कुछ है, सब छाया है, ब्रह्म समाज से अलग होना मानो समूचे सत्य से अलग होना है। लेकिन इधर कुछ दिनों से मेरा यह विचार बिलकुल बदल गया है।'' (पृष्ठ 353)

हम देख सकते हैं कि आत्मचेतस मध्य वर्ग 'वरण' को लेकर कितना चिन्तन करता है। अस्मिता निर्माण में कितना सन्देहवादी हो रहा होता है। ललिता का संवाद यही समाप्त नहीं होता बल्कि बहुत आगे तक ले जाता है, जहाँ वह आज के स्त्री-विमर्श से भी जुड़ जाता है।

उपन्यास के भीतर सुचरिता और हारान बाबू की टकराहट एक दिलचस्प वातावरण का निर्माण करती है। दोनों ब्रह्म समाजी हैं। दोनों में यदि विवाह हो जाता तो यह एक सामान्य घटना होती। उपन्यासकार ऐसा नहीं चाहता। सुचरिता को इससे मतलब नहीं कि वह ब्रह्म समाजी है और हिन्दू समाज (गोरा) से जुड़ रही है। वह कहती है - ''मैं समाज भी नहीं जानती। मैं इतना जानती हूँ कि मैं हिन्दू हूँ।'' (पृष्ठ 383) हारान बाबू ठीक इससे उलट सुचरिता को लगातार बता रहे हैं कि ब्रह्म समाज और हिन्दू समाज में पर्याप्त अन्तर है। इस बहस का नतीजा चाहे कुछ भी हो, रेखांकित करनेवाली बात यह है, टैगोर यह अच्छे से जानते थे कि धर्म की भाषा को जाने, पहचाने बिना बृहत्तर मानवीय समुदाय (खासकर निचला तबका) का भला नहीं हो सकता। उपन्यास का यह 'डिबेट' वस्तुतः हमें यह इशारा कर रहा है कि आत्मचेतस बौद्धिक वर्ग का जीवन किन संघर्षों और अस्मिताओं में बन रहा है, बिगड़ रहा है। हारान की खिन्नता, सुचरिता की कोमलता, गोरा का आक्रामक स्वरूप एक ऐसे त्रिकोण की निर्मिति करता है जिसमें हारान की स्थिति ज्यादा हास्यास्पद है। दूसरी ओर शशिमुखी, ललिता और विनय का भी एक त्रिकोण बनाता है, जिसमें शशिमुखी बहस से बाहर हो जाती है। पहले त्रिकोण में दो पुरुष पात्रों के बीच एक स्त्री और दूसरे त्रिकोण में दो स्त्रियों के बीच एक पुरुष पात्र खास ढंग से संवाद कायम करते हुए एक, एक पात्र को निकाल बाहर करता है। यह इशारा है अपने पर्यावरण के अनुसार बनाई जा रही अस्मिता का, जो 'मिस्फिट' है वह बाहर होगा। हम चाहें तो डार्विन को फिर याद कर लें - ''सर्वाइवल ऑफ दि फिटेस्ट"।

इन सभी पात्रों के बीच आनन्दमयी ऐक ऐसा पात्र है, जिसके साथ संभवतः टैगोर ज्यादा 'कम्फर्ट' महसूस करते होंगे, क्योंकि इसमें ही प्राच्य और पाश्चात्य का एक सन्तुलन है। हिन्दू परिवार में रहते हुए भी वह अपने हिन्दू परिवार के सदस्यों, यहाँ तक कि स्वयं अपने पति से भी अलग कर दी गई है। उसे अपने परिवार में ख्रिस्तान कहा जाता है क्योंकि वह लछमिया का छुआ पानी पीती है, शुचिता पर जोर है लेकिन बाह्य नहीं आन्तरिक स्वरूप में।

अंततः यह कहा जाना चाहिए कि उपन्यास की कथा और कथा के विभिन्न मोड़ों के माध्यम से भी यह साबित नहीं होता कि अस्मिता की कोई अन्तिम खोज है। इसलिए इस उपन्यास के कई पात्र आत्मबोध के साथ मुक्ति की अवधारणा की ओर जाते हैं। समाहार की ओर पहुँचते हैं -

  • ''मुझ पर कोई बन्धन नहीं।'' (पृष्ठ 452)

· ''मैं दिन-रात जो होना चाह रहा था, पर हो नहीं पा रहा था, आज मैं वही हो गया हूँ। आज मैं सारे भारतवर्ष का हूँ। मेरे भीतर हिन्दू, मुसलमान, ख्रिस्तान किसी समाज के प्रति कोई विरोध नहीं है। आज इस भारतवर्ष में सबकी जात मेरी जात है, सबका अन्न, मेंरा अन्न है।'' (पृष्ठ 453 )

· ''लक्षमिया को बुलाओ - उसे कहो, मुझे पानी पिला दे।'' (पृष्ठ 455)

असल में, क्या पानी की माँग करना उपन्यास में एक दैनिक माँग मात्र है? उत्तर की तलाश में हमें उपन्यास में तथा सामाजिक विन्यासों में बार-बार और हर बार लौटना पड़ता है। आजे भी।

रवीन्द्रनाथ की तमाम रचनाओं में मनुष्य खुद को एक समरसतापूर्ण समाज में तलाश करता है या खुद की तलाश की ललक लिए जीता है। गुरुदेव के गद्य में यह तलाश ज्यादा खुलकर आया है। गोरा, घर-बाहर, आँख की किरकिरी को नवजागरण की पृष्ठभूमि में रवीन्द्रनाथ की रचनाओं को पढ़ना एक भिन्न किस्म के निष्कर्षों की तरफ ले जाता है। यहाँ यह भी उल्लेख करना उचित होगा कि नवजागरण की चिंताओं में गुरुदेव के सामने व्यापक सामाजिक परिप्रेक्ष्य था जिसमें सबसे महत्वपूर्ण 'शांतिनिकेतन' की स्थापना था। यह उनके उपन्यास और कहानी से बाहर का समाज और समय था। इस स्थापना में गुरुदेव ने अपनी प्रसिद्ध काव्य पुस्तक 'गीतांजलि' को मिले नोबेल पुरस्कार की राशि को लगाया था। दरअसल कोई भी प्रतिबद्ध लेखक अपनी उपलब्धियों, अपनी प्रसिद्धियों को, जो उसे उसके समय और समाज से प्राप्त हुए हैं, लौटा देना चाहता है। 'शांतिनिकेतन' के रूप में गुरुदेव ने उन उपलब्धियों और प्रसिद्धियों को अपने समय में ही भावी पीढ़ी के लिए छोड़ा था। दरअसल गुरुदेव मनुष्य को एक बृहत्तर परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। उन्होंने अपने लेख 'मानव - सत्य' में तीन तरह की जन्मभूमि का उल्लेख किया है - पहली जन्मभूमि है - पृथ्वी, दूसरी है - स्मृति जगत और तीसरी है - आत्मलोक। शांतिनिकेतन के रूप में गुरुदेव की यह तीनों जन्मभूमियाँ हैं। 31 दिसम्बर 1932 को रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 'प्रश्न' नाम से एक कविता लिखी, इस लेख का अंत इसी पंक्ति से करने की इजाजत चाहूँगा ----

भगवान तुमने युग-युग में बार-बार इस दयाहीन संसार में
अपने दूत भेजे हैं।
वे कह गए हैं - क्षमा करो
,

कह गए हैं - प्रेम करो , अंतर से विद्वेष का विष
नष्ट कर दो।
वरणीय हैं वे
, स्मरणीय हैं वे ,
तो भी आज दुर्दिन के समय उन्हें निरर्थक
नमस्कार के साथ बाहर के द्वार से ही

लौटा रहा हूँ।

( शीर्षक की काव्य - पंक्ति रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता 'मृत्युंजय' से )


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हिंदी समय में अमरेंद्र कुमार शर्मा की रचनाएँ