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संस्मरण

बाबूजी के बिना दीवाली
सत्यकेतु सांकृत


पिछले बरस 2015 की दीवाली बाबूजी (स्वर्गीय प्रो. गोपाल राय) के बिना ही कटी। यह पहला अवसर था जब किसी महत्वपूर्ण त्यौहार पर हमारे बीच बाबूजी नहीं थे। इसके पहले हमने जितने भी पर्व त्यौहार मनाए थे उसके केंद्र में बाबूजी ही रहा करते थे। इकट्ठे त्यौहारादि मनाने के वे बड़े आग्रही थे। सही मायने में इसे उनका दुराग्रह भी कहा जाए तो इसमें अतिव्याप्ति दोष नहीं होगा। होली और दीवाली पर तो वे पूरे परिवार को एक जगह इकट्ठा होने का फरमान ही जारी कर दिया करते थे। होली में उनका गाँव जाना तय था। दुनिया चाहे इधर से उधर हो जाए पर होली में वे गाँव जरूर जाते थे। बाबूजी ने कह रखा था कि जब तक वो हैं तब तक उनका पूरा कुनबा इन अवसरों पर किसी एक जगह एकत्रित होगा। अब इसमें किसी की आनाकानी की संभावना तो थी ही नहीं कभी कभी नौकरी की मजबूरियों की गुहार तक भी काम नहीं आती थी। बाबूजी जहाँ भी होते थे हम सपरिवार वहीं इकट्ठे हो जाया करते थे। इसी क्रम में हम कलकत्ता, कटनी और ग्वालियर में भी जुट चुके थे पर अकसर यह जमावड़ा सत्यकाम भैया के इग्नू परिसर वाले आवास पर ही लगा करता था। मैं उस समय कटनी से ग्वालियर आ चुका था और अनुज सत्यजित कोलकाता से स्थानांतरित होकर दिल्ली में ही पदस्थ थे। बस हम सब चार यार जहाँ इकट्ठे होते त्यौहारों का आनंद दुगना हो जाता। बाबूजी अकसर कहा करते थे कि मेरे जाने के बाद तुम लोग इसके महत्व को समझोगे। आज सचमुच बाबूजी की कमी बहुत खल रही है। पिछले 25 सितंबर को कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को लंबे अर्से से धता बताते हुए आखिरकार बाबूजी इस दुनिया से कूच कर गए। 26 तारीख को मेरे निवास पर एक शोक सभा रखी गई जिसमें साहित्यिक जगत से संबंधित कई जानी मानी हस्तियों ने अपनी श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए उनकी जीवटता और रचनाशीलता पर प्रकाश डाला। इसी क्रम में मुझे प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. सलिल मिश्र का वह कथन मेरे मानस में बार बार कौंध रहा है जब उन्होंने कहा था 'यह समय शोकाकुल होने का नहीं बल्कि जश्न मनाने का है।' एकबारगी तो यह वक्तव्य अत्यंत अटपटा लगा पर जब उन्होंने बाबूजी की संघर्षमयी क्षमता का बखान करते हुए उनके साहित्यिक अवदानों पर बारीकी से अपनी बात रखनी शुरू की तो अचानक मेरी स्मृति में बाबूजी का वह वक्तव्य ताजा हो गया जब वे कहा करते थे कि मेरे जीवनकाल में यह साहित्यिक जगत चाहे मेरी जितनी भी उपेक्षा कर लें पर मेरी रचनाधर्मिता से उसे एक न एक दिन मुझे याद करना ही पड़ेगा। मेरी मृत्यु के बाद मेरी रचना ही मुझे जीवित रखेगी। आज सचमुच बाबूजी जिस तरह अपनी रचनाधर्मिता से साहित्यिक जगत में याद किए जा रहे हैं वह उनकी कही बात को अक्षरशः प्रमाणित कर रहा है।

बाबूजी के साहित्यिक अवदान पर उनके जीवनकाल में ही सहित्यिक जगत में फुसफुसाहट के रूप में ही सही पर यह स्वर सुनाई पड़ने लगा था कि गोपाल राय ने तमाम असुविधाओं के बीच साहित्य के क्षेत्र में जितना काम किया है वह किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि संस्था का काम है। पर किसी साहित्यिक-राजनीतिक विचारधारा से उसके अंतर्विरोधों के कारण पूर्णतः न जुड़ पाने का खमियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। उन्हें साहित्यिक जगत में उनके जीते जी वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। अगर यह कहा जाए कि उन्हें तत्कालीन साहित्यिक राजनीति का शिकार भी होना पड़ा तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। एक तरफ वामपंथियों ने आचार्य विष्णुकांत शास्त्री से उनके वैयक्तिक जुड़ाव के कारण उन पर दक्षिणपंथी होने की बात कहकर उनकी उपेक्षा की तो दूसरी तरफ दक्षिणपंथियों ने तो उन्हें घोर मार्क्सवादी घोषित ही कर रखा था। यह बात सही है कि उनका झुकाव वामपंथ की ओर कुछ हद तक अवश्य था पर घोर जैसी कोई चीज उनके साथ कभी नहीं जुड़ी थी। यह बात शायद कम ही लोगों को मालूम होगी कि बाबूजी अपने आरंभिक दिनों में न केवल प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े हुए थे बल्कि एक समय तो वे बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के उपाध्यक्ष तक रह चुके थे। यहाँ से वे चाहते तो कइयों की तरह वे भी उनके रास्ते पर चलकर अनेक लाभ प्राप्त कर सकते थे पर इसके लिए पिछलग्गू होने वाली जिस प्रवृत्ति की आवश्यकता होती थी उसका उनमें नितांत अभाव था। गॉडफादर नाम की कोई चीज तो उनके साथ थी ही नहीं। जो कुछ भी उन्हें गलत लगा उसका उन्होंने वहीं विरोध किया। इसी क्रम में वे प्रगतिशील लेखक संघ से भी टकरा गए और एक बैठक में जब उनकी बात नहीं मानी गई तो उन्होंने तत्काल न केवल उसके उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया बल्कि भविष्य में उससे कोई संबंध न रखने की कसम तक खा ली। अब उस समय किसी की क्या मजाल की कोई वामपंथी विचारधारा का विरोध कर साहित्य में अपनी पैठ बना सके। पर बाबूजी तो पता नहीं किस मिट्टी के बने थे। वैसे भी उन्हें बंधन तो कभी भी पसंद था नहीं। वे स्वतंत्रता के आग्रही थे और अपने काम में भी वे किसी प्रकार के जकड़न को बर्दाश्त नहीं करते थे। अब भला साहित्यिक जगत इसे कैसे स्वीकार करता! अतः उसने वही किया जो उसकी प्रवृत्ति में था। एक तरह से उनपर चर्चा न करने और उन्हें हाशिए पर रखने का शातिराना षड्यंत्र भी रचा गया पर इन सहित्यिक उठापटक से दूर एक फक्कड़ योगी की तरह बिलकुल कबीराना अंदाज में वे बेपरवाह हो अपना काम करते गए। इसी बीच प्रकाशकों ने भी उन्हें हतोत्साहित करने में कोई कसर न छोड़ी। आरंभ में कोई उनकी किताबों को छापने तक तैयार न हुआ तो उन्होंने अपना छापाखाना ही खोल लिया। जिद्दी तो वे थे ही और इस जिद्दीपने ने ही उनमें वह जुनून पैदा कर दिया जिसके कारण वो साहित्य की दुनिया में इतना कुछ कर गए जिस पर सलिल जी के अनुसार जश्न तो मनाया ही जा सकता है।

बाबूजी बचपन से ही जिद्दी स्वभाव के थे। आजी तो उनके बालहठ को बहुत चटकारा लेकर सुनाती थीं। आजी के मुख से यह सुना था कि 'जब तोहार बाबूजी दू साल के रहले तब गाँव में बड़का भूडोल आइल रहे आ धरती बहुत जोर से डोलल रहे।' स्पष्ट है यह वर्ष 1934 का ही था। अतः इसके ठीक दो साल पहले बाबूजी का जन्म वर्ष 1932 मान लिया गया। फिर आजी ने ही बताया कि 'बचवा के जनम कार्तिक पूर्णिमा के एकदम अंजोरिया रात में भइल रहे।' आजी के कथनानुसार बाबूजी का जन्म दिन हमलोग कार्तिक पूर्णिमा को मनाने लगे। आजी बताती थीं कि बाबूजी के जन्म पर उनके परिवार में खूब खुशियाँ मनाई गई थीं। प्रायः भारतीय ग्रामीण समाज में पुत्र रत्न की प्राप्ति होने पर जो हँसी-खुशी का माहौल होता है वह उस समय जीवंत हो उठा था। पर ईश्वर को तो कुछ और ही मंजूर था। नियति मानो नेपथ्य से अट्टहास कर रही थी। कुछ दिनों के बाद 'आजी का बचवा' पोलियो का शिकार हो गया और रेणु के मैला आँचल का वह प्रसंग चरितार्थ हो उठा जिसमें ग्रामीण समाज के लोग दो बूँद दवा के अभाव में जीवन भर के लिए अपनी आँखों की रोशनी खो देते थे। यहाँ भी एक नवजात शिशु पोलियो की दो बूँद दवा के अभाव में जीवन भर के लिए विकलांग हो गया। अब शुरू हुई ग्रामीण समाज के अभावग्रस्त एक विकलांग बच्चे की संघर्षगाथा। बाबूजी हमेशा अपने अतीत के कुहरीले आकाश में प्रवेश करने से कतराते रहे क्योंकि वह उन्हें बहुत अप्रीतिकर ही नहीं लगता बल्कि विचलित भी करता था। वे उन सौभाग्यशाली बच्चों में नहीं थे जो मुँह में चाँदी का चम्मच लेकर पैदा होते हैं। मेरे बाबा कोलकत्ता में कोई छोटा सा व्यवसाय करते थे। वैसे तो वे बहुत कर्मठ थे और जहाँ तक मुझे याद है वे अपने व्यवसाय के प्रति बड़े सचेत रहने वाले इनसान थे पर शिक्षा के मामले में थे वे ठनठन गोपाल ही। संभवतः वे अपना दस्तखत करना तो जानते थे पर बाकी सब मामला गोल ही था। स्वाभाविक था कि लगभग निरक्षर होने के कारण अपने बच्चे की पढ़ाई में भी उनकी कोई रुचि नहीं रही होगी। बाबूजी तो कभी कभी खिन्न होकर यहाँ तक कह जाते हैं कि वस्तुतः अपने पोलियोग्रस्त बच्चे में ही उनकी कोई रुचि भी नहीं थी। पर मेरी आजी कुछ शिक्षित थीं और नियमित रूप से रामायण या इस तरह की धार्मिक पुस्तकें पढ़ा करती थीं। मैंने भी उन्हें कई बार रामचरिततमानस पढ़ते हुए देखा है। कहानियाँ तो उन्हें खूब याद थीं हमलोग तो उनसें बिना कहानी सुने सोते ही नहीं थे। कहना नहीं होगा कि निश्चित ही ये कहानियाँ उन धार्मिक ग्रंथों से ही नृसित थीं जो उन्होंने पढ़ रखी थीं। उनकी बड़ी इच्छा थी कि उनका बचवा किसी तरह पढ़ लिखकर कुछ खाने कमाने लायक बन जाए। सो उन्होंने उनका नाम गाँव के ही प्राथमिक विद्यालय में लिखा दिया। स्वयं बाबूजी के शब्दों में 'पता नहीं, मेरे शिक्षकों ने मुझमें क्या देखा कि वे मुझे सदा प्रोत्साहित करते रहे और बहुत कम समय में मुझे पढ़ने लायक बना दिया।'

बाबूजी की आरंभिक शिक्षा गाँव में ही हुई। वैसे वे अपना पहला गुरु तो आजी को ही मानते थे। बाबा के द्वारा खड़े किए गए तमाम अवरोधों के बावजूद आजी ने ही उन्हें पढ़ाने का एकतरफा निर्णय लिया था। बाबूजी अकसर उस बात का जिक्र करते हैं कि कैसे आजी ने उन्हें बालू की भीत और घर की मिट्टी पर लकड़ी से उकेरकर ककहरा लिखना सिखाया था। माध्यमिक शिक्षा के लिए आजी की जिद पर ही उन्हें पहले चौसा (जी हाँ चौसा की प्रसिद्ध लड़ाई वाली ही जगह) और फिर उच्च माध्यमिक शिक्षा के लिए बक्सर ('बक्सर की जंग' के नाम से प्रसिद्ध स्थली) भेजने का निर्णय लिया गया और उसके बाद शुरू हुई वह अद्भुत शिक्षा जिसके लिए एक विकलांग बच्चे को पैदल ही वह भी नंगे पाँव न केवल प्रत्येक दिन दो कोस जाना आना पड़ता था बल्कि बीच में पड़ने वाली एक नदी को अर्थाभाव में तैरकर पार भी करना पड़ता था। पर एक मेधावी बच्चे की जिद्द और उसके जूनून ने उसे सारे विघ्नों को पार करने की वह शक्ति प्रदान की जिसके सहारे विपन्नता में जीवन यापन करने को अभिशप्त होने के बावजूद मैट्रिक की परीक्षा बक्सर हाईस्कूल से प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। अब उच्च शिक्षा का प्रश्न सुरसा की भाँति मुँह बाए खड़ा था। यहाँ आजी फिर संबल बनकर सामने आईं और उन्होंने अपने कुछ तथाकथित जेवरात बेचकर अपने बचवा को आगे पढ़ने के लिए प्रेरित किया। निर्णय पटना कालेज में पढ़ने का लिया गया। बाबूजी अपने बाल सखा मुचकुंद दुबे के साथ पटना कॉलेज में नामांकन कराने के लिए निकल पड़े। पटना कॉलेज में अपने पहले दिन की चर्चा कर बाबूजी रोमांचित हो उठते थे। वे बताते थे कि कैसे जब वे लोग पटना कॉलेज के बड़े से गेट पर तड़के ही पहुँच गए और गेट को बंद देखकर उत्तेजना में गेट को तड़पकर कालेज में प्रवेश कर गए। अभी वे लोग कुछ सँभल पाते कि सामने एक भव्य व्यक्तित्व वाला गोरा चिट्टा अंग्रेजनुमा आदमी दिखाई पड़ा। देखते ही दोनों की घिग्घी बँध गई और जब यह पता चला कि सामने वाला व्यक्ति और कोई नहीं बल्कि स्वयं प्रिंसिपल ही हैं तब तो उनकी कैसी स्थिति हुई होगी इसका सहज अंदाज लगाया जा सकता है। उन्हें लगा कि 'प्रथम ग्रासे मक्षिका पातः' वाली कहावत बस चरितार्थ होने वाली ही है। बाबूजी उस क्षण को याद कर रोमांचित हो उठते और खूब मजे लेकर उस प्रकरण को सुनाते थे। बाबूजी का नामांकन पटना कॉलेज में हो गया और प्राचार्य महोदय ने एक मेधावी छात्र की फीस माफी के आवेदन को भी स्वीकार कर लिया।

बाबूजी बताते हैं कि जब वे पटना कॉलेज में प्रथम वर्ष के विद्यार्थी थे तभी संभवतः 1950 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद की स्थापना के अवसर पर विद्यार्थियों के लिए 'हिंदी उपन्यास के विकास' पर पर एक निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। पुरस्कार राशि 100 रुपये रखी गई। बाबूजी भी उसके प्रतिभागी बने और उन्होंने थोड़ी बहुत तैयारी के साथ उस निबंध प्रतियोगिता में भाग लिया। पर जिस दिन पुरस्कार मिलना था उस दिन यह सोचकर कि उन्हें तो यह पुरस्कार मिलेगा ही नहीं वे वहाँ नहीं गए। पर शाम को जब उनके एक सीनियर ने बताया कि उस निबंध प्रतियोगिता में उन्हें ही प्रथम पुरस्कार मिला है और बार बार उनका नाम पुरस्कार प्राप्त करने के लिए पुकारा जा रहा था तब तो वे खुशी से झूम उठे। अव्वल तो उन्हें इस बात का विश्वास ही नहीं हो रहा था पर जब वे इस बात से आश्वस्त हो गए तब तो उन्हें उस अवसर पर वहाँ उपस्थित न होने का जो मलाल हुआ उसका जिक्र कर ही वे भावुक हो उठते थे। खैर वह प्रतियोगिता दो दिनों की थी। दूसरे दिन जब वे प्रतियोगिता स्थल पर पहुँचे तब उन्हें अपना पुरस्कार प्राप्त करने के लिए मंच पर बुलाया गया। बाबूजी बताते थे कि पुरस्कार प्राप्त करते समय मंचासीन दिनकरजी को ताली बजाता देखकर वे हर्षचकित रह गए थे। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वो पुरस्कार प्राप्त कर रहे हैं और दिनकर जैसे देदीप्यमान साहित्यकार उनका करतल ध्वनि से उत्साहवर्धन कर रहे हैं। यह एक ऐसा क्षण था जिसका जिक्र वे बार बार करते थे और हर बार उनकी आँखें छलछला उठती थीं। बाबूजी बताते थे कि यह एक ऐसा पुरस्कार था जिसने उनके भविष्य की राह ही तय कर दी। इसके बाद वे हिंदी उपन्यास पर पिल ही पड़े जिसकी परिणति अंत में 'हिंदी उपन्यास का इतिहास' के रूप में दिखाई पड़ी। इसका आरंभ हिंदी विषय से प्रथम श्रेणी में एम.ए. उत्तीर्ण होने के उपरांत शोध विषय के चयन के साथ ही गया। शोध निदेशक आचार्य नलिन विलोचन शर्मा ने 'हिंदी कथा साहित्य पर पाठकों की रुचि का प्रभाव' विषय पर काम करने का निर्देश दिया। बाबूजी ने उसमें अपनी पूरी ताकत झोंक दी। खूब मेहनत से नई स्थापनाओं के साथ अपने कार्य का संपादन किया। तभी एक ऐसी घटना घटी जिसने उन्हें लगभग तोड़ ही दिया था। एक दिन तड़के उन्हें नलिनजी के निधन की सूचना मिली। उनके सामने अँधेरा छा गया। वे किंकर्तव्यविमूढ़ वाली अवस्था में आ गए। उन्हें आगे का रास्ता नहीं दिख रहा था। पर परिस्थितियों से लड़ना तो कोई इनसे सीखे। जिस विषय पर उन्हें पी-एच.डी. की उपाधि मिलनी थी उसी पर उन्होंने स्वयं के निर्देशन में ही डी.लिट. की उपाधि प्राप्त कर ली। यह संभवतः उनकी जिद और कर्तव्यपरायणता का वह सोपान था जिसने उन्हें बेपरवाह बन आगे बढ़ने की सीख दी।

बाबूजी अकसर अपनी अर्धांगिनी और मेरी माँ स्वर्गीय श्रीमती करुणा राय, जो एक लंबी बीमारी से संघर्ष करती हुईं वर्ष 1986 में दिवंगत हो गईं, की चर्चा करते हुए भावुक हो उठते। बाबूजी ने माँ की प्राण रक्षा के अथक प्रयास किए। उनके लिए उन्होंने देश के सर्वश्रेष्ठ चिकित्सकों से मशविरा किया और उस समय के उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ चिकित्सालय, एम्स, (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली) तक में इलाज करवाया। माँ के इलाज के सिलसिले में उन्हें कई बार पटना से दिल्ली आना पड़ा। एक सामान्य से ग्रामीण परिवेश के आदमी के लिए, भले ही वह उस समय के एक ऐसे तथाकथित प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जिसमें अपने अधीन कार्यरत कर्मचारियों के लिए किसी भी प्रकार की चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध न हो, में हिंदी का प्राध्यापक ही क्यों न हो, दिल्ली जैसे महानगर में आकर अपनी पत्नी का इलाज कराना कितना कष्टदायक हो सकता है इसकी कहानी बाबूजी की जुबानी सुन चुका हूँ। अकसर बाबूजी को माँ की बीमारी के सिलसिले में 'एम्स' में आना पड़ता था। पैसे के अभाव के कारण वे एक धर्मशाला में रुकते थे और बामुश्किल उनका इलाज करवाते थे। कहीं से भी कोई सहायता मिलना तो दूर अगर कोई परिचित यह जान भी जाता था कि वे अपनी पत्नी के इलाज के सिलसिले मे यहाँ आए हैं तो वह उनसे कन्नी काटने लगता था। हिंदी साहित्य की सारी विद्वता यहाँ धरी की धरी रह जाती थी। बाबूजी के अनुसार वह एक ऐसा समय था जिसने उन्हें आदमी की पहचान कराना सिखाया। इसी सिलसिले में उस बात का जिक्र करना लाजिमी होगा जिसकी चर्चा कर बाबूजी की आँखें नम हो जातीं। वे बताते थे कि ऐसे ही एक बार माँ के इलाज के सिलसिले वे ने दिल्ली आए। इस बार माँ की तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब थी सो उन्हें 'एम्स' में भरती करवाना पड़ा। इसमें भी उन्हें जिस तरह के पापड़ बेलने पड़े उसके जिक्र मात्र से ही जी घबड़ाने लगता है। खैर बाबूजी के एक मित्र शंकर दयाल सिंह, जो हिंदी के एक बड़े विद्वान और राज्यसभा से सांसद सदस्य थे, ने इस समय उनकी बहुत सहायता की और किसी तरह माँ एम्स में भर्ती हुई और उनका इलाज शुरू हो गया। बाबूजी पूरे दिन तो माँ की सेवा मे लगे रहते पर एम्स के अपने नियम के अनुसार मरीज के साथ उसके परिचर को एक निर्धारित समय तक ही रहने दिए जाने का प्रावधान था। बाबूजी अपने बचे समय का उपयोग अपने साहित्यिक मित्रों से मिलने के लिए किया करते थे। ऐसे ही एक बार वे अपने मित्र प्रो. मैनेजर पांडेय जी से मिलने गए। पांडेय जी उस समय जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक थे और अपने ट्रांजिट हाउस वाले मकान में रहते थे। बाबूजी बताते हैं कि एकदम चिलचिलाती धूप में करीब 12 बजे वे पांडेय जी के यहाँ पहुँचे। पांडेय जी संभवतः अपने किसी मित्र से मिलने पड़ोस में गए हुए थे। हाँ चंद्रा जी घर में थीं। उन्होंने बाबूजी को प्रेम से घर में बिठाया और शीतल जल तथा अपनी आत्मीयता से उनको ऐसी ठंडक पहुँचाई जिसे उनके अनुसार इस जन्म में भुला पाना संभव नहीं है। इसके बाद जो घटना घटी वह उनके पिछले दिनों के अनुभव के अनुसार नितांत अप्रत्याशित थी। चंद्राजी ने थोड़ी देर बातचीत करने बे बाद कहा राय साहब आप बहुत दूर से आए है भूख लगी होगी। मैं खाना लगाती हूँ। बाबूजी को भूख ही नहीं लगी थी बल्कि उनकी अंतड़ी तड़तड़ा रही थी पर बेदिल शहर में कोई दिल वाला भी मिलेगा इसकी तो उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। पहले तो उन्हें लगा कि उनके साथ कहीं दिल्लगी तो नहीं हो रही है न! पर जब जल्द ही गरम-गरम चावल दाल और जायकेदार सब्जी उनके सामने परोस दी गई तब उन्हें लगा कि यह सपना नहीं बल्कि जीवन का एक सुंदर सच है। चंद्राजी ने खूब प्रेम से उन्हें भोजन कराया और बाबूजी ने भी खूब छककर उस सुस्वादु भोजन का स्वाद लिया। ताउम्र बाबूजी को उसका जायका नहीं भूला। पता नहीं उसके बाद कितनी बार पाँच सितारा होटलों का खाना उन्होंने खाया होगा पर उस दिन के भोजन के स्वाद को वे कभी नहीं भूल पाए। उस भोजन के साथ पांडेय जी के परिवार का जो स्नेह उसमें सना था उसने बाबूजी को उनका ऋणी बना दिया। बाबूजी अकसर कहते थे कि मैं उनका अहसानमंद हूँ। अपने इसी भाव को उन्होंने पिछले दिनों पांडेय जी के सामने व्यक्त कर दिया। पांडेय जी ने अपने स्वभाव के अनुरूप चटकारा लेते हुए कहा 'आप भी क्या बात करते हैं राय साहब। यहाँ कितने ससुरे आए, खाए, सब हजम किया और बिना डकारे न केवल चल दिए बल्कि मौके-बेमौके अपनी जात दिखाने से भी बाज नहीं आए। और एक आप हैं कि पता नहीं कब की इतनी छोटी सी बात को आपने सर पर ढोए लिए चल रहे हैं।' खैर यह तो पांडेय जी का बड़प्पन और बाबूजी के प्रति जो उनके मन में जो सम्मान था वह उसी को उजागर करता हैं पर बाबूजी तो निश्चित ही उस अहसान को नहीं भूल पाए। खैर माताजी पूर्णतः स्वस्थ होकर पटना आ गईं और बाबूजी के अध्ययन-अध्यापन का काम फिर से शुरू हो गया। माँ बाबूजी का बहुत ख्याल रखती थीं। वे उन्हें गृह कार्यों से सदा मुक्त रखती थीं जिससे कि वे अधिक से अधिक काम कर सकें। मैने अपने बाबूजी को सब्जी का झोला टाँगे या बाजार से रोजमर्रा की वस्तु लाते कभी नहीं देखा है। बाबूजी बताते थे कि माताजी ने शुरू से ही उन्हें इन सब कार्यों से न केवल मुक्त रखा बल्कि विपरीत परिस्थितियों में उन्हें वह संबल भी प्रदान किया जिसने उन्हें धैर्यवान बन दूनी शक्ति से काम करने की प्रेरणा दी। बाबूजी के अनुसार माताजी ने उनके पठन-पाठन में भी बहुत सहायता की। अपनी पीएच.डी. और फिर बड़े नाटकीय ढंग से उसी विषय पर प्राप्त की गई डी.लिट की उपाधि, जिसका मैं उपर भी जिक्र कर चुका हूँ, का पूरा श्रेय तो वे माताजी को ही देते थे। सही मायने में बाबूजी की प्रेरणास्रोत मेरी माताजी ही थीं। बाबूजी अकसर यह कहते हैं कि मेरी माता रानी ने उनको बनाते बनाते खुद को मिटा दिया।

बाबूजी बचपन से ही ताश खेलने के बड़े शौकीन रहे। अपनी शारीरिक कमजोरी के कारण वे ज्यादा तेज भाग तो सकते नहीं थे सो उन्होंने ऐसे खेल को अपनाया जो बैठकर खेला जाता था। रोज दोपहर में गाँव के बागीचे में आम के पेड़ तले उनकी चौकड़ी जम जाती, पर वह भी एक निश्चित समय के लिए ही। बाबूजी बताते थे कि खेल का भी एक समय उन्होंने निर्धारित कर रखा था और जैसे ही दीवाल की एक परछाई अपने गंतव्य पर पहुँचती बाबूजी खेल बंद कर देते। उनके सहचर लाख चिल्लाते पर वे किसी की नहीं सुनते और पढ़ने बैठ जाते थे। नियम की पाबंदी तो मानो शुरू से ही उनसे जुड़ गई हो। हम लोगों की तो छोड़िए किसी मेहमान के संग भी बाबूजी गप्पे मारते मारते अचानक कह उठते कि अब आप लोग यहाँ से प्रस्थान कीजिए और कंप्यूटर पर काम करने बैठ जाते। उसके बाद उनको इस बात की जरा भी परवाह नहीं रहती कि अन्य गपोड़ियों पर इसका क्या असर पड़ेगा। उन्हें तो अपने काम में तेजी लाने और अपने आप को तरोताजा रखने के लिए जो चीज चाहिए थी वह मिल गई। अब तो वे हैं, उनकी किताबें हैं और उनका लैपटाप, जिसे वे लटपट भी कहते थे। दुनिया जाए भाड़ में वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए अपना काम करने बैठ जाते। बाबूजी अकसर ताश का घर नाश कहने वालों को को न केवल लताड़ते ही थे बल्कि कहा करते थे कि अपने काम के प्रति समर्पण वाली भावना उन्हें ताश खेलने से ही प्राप्त हुई है जिसकी लत उन्हें बचपन से ही लग गई थी। बाद में चलकर उनका यह ताश वाला शौक कैसे पैशन में बदल गया यह बताना बड़ा मुश्किल है। हाँ जब से मैंने होश सँभाला है तब से मैंने एक नियम के तहत पटना वि.वि. के क्लब में शाम को एक निर्धारित समय के लिए हर रोज बिना नागा के ब्रिज (ताश का एक खेल) के लिए जाते हुए देखा है। दुनिया इधर से उधर हो जाए पर क्लब तो इन्हें जाना ही था। रोज वहाँ गणेश बाबू, मेहता साहब, चटर्जी बाबू और बाबूजी की चौकड़ी जम ही जाती थी ठीक प्रेमचंद के 'शतरंज के खिलाड़ी' की तरह। इस बात को लेकर माँ से कभी कभी नोंक झोंक भी हो जाती थी, पर भला बाबूजी कहाँ मानने वाले थे। ब्रिज के खेल का यह सिलसिला काफी लंबे समय तक चलता रहा,पर गणेश बाबू के आकस्मिक निधन पर उसमें एक अवरोध सा पैदा हो गया। बाबूजी उसके बाद भी कभी कभी क्लब जरूर जाते पर अब उनका मन क्लब से उचट चुका था। फिर नौकरी से अवकाश ग्रहण करा दिए जाने के कुछ समय के उपरांत तो वे दिल्ली ही आ गए और अब क्लब का सिलसिला बंद ही हो गया। पर दिल्ली आ जाने के बाद भी उनके ताश की ललक गई नहीं। जब भी अगर हम चार लोग कहीं जमा हो जाते तो बाबूजी की यही इच्छा रहती कि हम सब अपना अपना काम छोड़कर ट्वैंटिनाइन (ताश का एक बिहारी फार्मेट) खेलने बैठ जाएँ। अधिकांश समय तो उनकी यह इच्छा पूरी कर दी जाती रही है पर जब कभी कभी बच्चों की पढ़ाई का हवाला दिया जाता तब वे मन मसोसकर रह जाते। ताश का नाम लेते ही उनकी आँखों में जो चमक दिखाई पड़ती थी वह वर्णनातीत है। ताश तो उनकी जान थी जो उनकी जान के साथ ही चली गई। अब हमारे परिवार में ताश का खेल कभी नहीं होगा।

बाबूजी पुस्तकों के जमावड़े के बड़े शौकीन रहे हैं। सच माने तो मेरा बचपन किताबों के बीच ही बीता है। हमने किताबों को ही खिलौना बनाया है और उसी पर सवार होकर हम बड़े भी हुए हैं। मुझे अकसर वे दिन याद आते हैं जब हमलोग किसी के जन्मदिन पर भी जाते थे उसके लिए उपहार में किताब ही ले जाया करते थे। हमारे यहाँ किताबों का अंबार लगा था और पटना विश्वविद्यालय के राजेंद्र नगर स्थित प्रोफेसर्स क्वार्टर के जिस मकान में रहते थे वह तरह तरह की किताबों से भरा पड़ा था। हमारे यहाँ पटना वाले मकान का कोई भी कोना ऐसा नहीं था जहाँ पर किताबें न रखी हों। किताबों के इस जमावड़े की भी अजब कहानी है। बाबूजी के मुख से कई बार इसकी चर्चा सुन चुका हूँ। बाबूजी ने जब अपनी डी.लिट् की उपाधि अर्जित की तब उनके सामने अपने शोध प्रबंध को प्रकाशित करवाने का प्रश्न खड़ा हुआ। आरंभ में उन्होंने इसकी कुछ कोशिश भी की पर प्रकाशकों से मिली उपेक्षा से उन्हें बहुत निराशा हुई। पर बाबूजी तो बाबूजी थे। भला प्रकाशकों की उन्हें क्या परवाह उन्होंने 'ग्रंथ निकेतन' नामक स्वयं के प्रकाशन की नींव डाल दी और उनका शोध प्रबंध 'हिंदी कथा साहित्य के विकास पर पर पाठकों की रुचि का प्रभाव' नामक शीर्षक से प्रकाशित हो गया। ग्रंथ निकेतन से प्रकाशित होने वाली यह पहली पुस्तक थी। इसके बाद यहीं से उनकी दूसरी पुस्तक 'हिंदी का पहला उपन्यास' का प्रकाशन हुआ। इसके बाद हिंदी उपन्यास कोश दो खंडों में और फिर 'हिंदी साहित्याब्दकोश' आठ खंडों में ग्रंथ निकेतन से ही प्रकाशित हुआ। इन बृहतकाय आलोचनात्मक पुस्तकों का प्रकाशन तो हो गया। अब प्रकाशित प्रतियों को सँभाल कर रखने, उनका प्रचार-प्रसार करने और फिर उन्हें बेचने की बात आई। किताबों को तो उन्होंने सहेज कर रखने की व्यवस्था घर में ही कर ली।

पढ़ने लिखने के साथ साथ घर में संग्रहीत पुस्तकों की सुरक्षा का कार्य भी निर्बाध गति से चलता रहा। अपनी किताबों के प्रकाशन के उपरांत उनकी सुरक्षा के कार्य में तो वे निश्चित ही सफल हो गए पर अब उनके प्रचार-प्रसार और बेचने का प्रश्न आया। इस कार्य में बाबूजी निश्चित ही फिसड्डी साबित हुए। व्यावसायिकता वाला उनका पक्ष शुरू से ही कमजोर रहा। कुछ किताबें तो बिकीं अवश्य पर जो नहीं बिकीं वे घर की ही शोभा बढ़ाती रहीं। पर बाबूजी को इसकी कहाँ परवाह थी। उनका काम तो हो गया था। बाबूजी ने तो गौतम बुद्ध के इस कथन का अपने जीवन का आदर्श ही बना लिया था कि जब नदी पार कर जाओ तब नाव को अपने सिर पर ढोने के बजाए उसे वहीं छोड़कर आगे बढ़ जाओ। बाबूजी ने भी ग्रंथ निकेतन को बंद कर दिया। कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। वर्ष 1967 में पटना से 'समीक्षा' पत्रिका निकलनी शुरू हुई। आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा (प्रधान संपादक), डॉ. रामचंद्र प्रसाद, और डा. गोपाल राय (संयोजक) की देखरेख में इसका प्रकाशन आरंभ हुआ। इसका पहला अंक तो पटना स्थित लक्ष्मी पुस्तकालय के मालिक परमेश्वर बाबू के सौजन्य से उन्हीं के प्रेस से प्रकाशित हो गया। इसका दूसरा और तीसरा अंक भी लक्ष्मी पुस्तकालय से ही प्रकाशित हुआ। पर पत्रिका निकालना वह भी बिना किसी बाहरी आर्थिक सहायता के कितना कठिन कार्य है इसका अहसास 'समीक्षा' से जुड़े लोगों को धीरे धीरे होने लगा और समय के साथ-साथ पत्रिका से जुड़े सभी वीर धीरे-धीरे इससे अलग होते गए। गोपाल राय कहाँ हार मानने वाले थे उन्होंने पत्रिका को अकेले सँभाला और उनके कुशल संपादन में यह पत्रिका न केवल अपनी राह पर निकल पड़ी बल्कि समय के साथ साथ दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति भी करती गई। दरअसल यह पत्रिका एक मिशन के तहत शुरू की गई थी। इसके प्रवेशांक में ही यह उद्घोषणा की गई थी कि 'समीक्षा' एक निश्चित लक्ष्य को लेकर उपस्थित हुई है। इसका लक्ष्य हिंदी की अब तक निकली सभी पत्र पत्रिकाओं से भिन्न है। यह दावा बहुत बड़ा पर गलत नहीं है। वार्षिक से लेकर दैनिक तक जो भी पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं उनमें पुस्तक-समीक्षा का भी एक स्तंभ सामान्यतः रहता ही है। पर केवल पुस्तक समीक्षा को अपना ध्येय बनाकर निकलने वाली यह हिंदी की पहली पत्रिका है। भविष्य की बात तो हम नहीं कह सकते पर इसका आरंभ ही ऐतिहासिक महत्व का अधिकारी हो गया, इससे किसी को असहमति नहीं होगी। 'इसी बीच इसके मुद्रण को लेकर भी बखेड़ा शुरू हुआ सो अपने स्वभाव के अनुरूप किसी से चिरौरी करने के बजाय बाबूजी ने एक प्रेस ही खोलने का निर्णय ले लिया। यहीं से 'रचना प्रेस' अस्तित्व में आया और 'समीक्षा' का मुद्रण इसी प्रेस से आरंभ हो गया। जब समीक्षा अस्तित्व में आई तब पुस्तक समीक्षा की संभवतः यह एकमात्र पत्रिका थी। इसने जल्दी ही लोकप्रियता भी हासिल कर ली। पुस्तक समीक्षा की पत्रिका होने के कारण प्रकाशकों द्वारा पुस्तकें भी भेजी जाने लगीं। जो भी नई पुस्तक प्रकाशित होती वह समीक्षा हेतु संपादकीय कार्यालय यानी हमारे घर पर ही आने लगीं। प्रकाशक हमेशा समीक्षा के लिए पुस्तकों की दो-दो प्रतियाँ भेजा करते। एक प्रति तो समीक्षक के पास भेज दी जाती थी पर दूसरी प्रति घर में ही रहती थी। धीरे-धीरे इस मासिक पत्रिका के लिए भेजी जाने वाली पुस्तकों का अंबार लगना शुरू हो गया। पहले से ही सैच्यूरेशन प्वाइंट पर पहुँचे घर में अब कहाँ जगह थी जो इनको रखा जाता। खैर शुरू में तो दीवालादि में कुछ नए रैक्स बनवाकर पुस्तकों को रखने की व्यवस्था हो गई। पर जब समीक्षा को हर महीने निकलना था तो उसके लिए हर माह बीस पच्चीस पुस्तकें तो आ ही जाती थी। अंत में यह तय हुआ कि जो पुरानी किताबें हैं खासकर ग्रंथ निकेतन से प्रकाशित हुई किताबों को रचना प्रेस के लिए आरक्षित जगह पर स्थानांतरित कर दिया जाए। इस तरह ग्रंथ निकेतन से प्रकाशित बाबूजी की पुस्तकों की प्रतियाँ रचना प्रेस में पुनः रैक्स बनवाकर सुरक्षित रख दी गईं। घर में खाली रैक्स शनैः शनैः समीक्षार्थ, कभी कभी सादर आमंत्रित तो कभी जबरन भेजी गईं, पुस्तकों से भरते गए और जरूरत के मुताबिक नए रैक्स अस्तित्व में आते गए। हमारे घर में एक इंच भी ऐसी जगह नहीं बची थी जहाँ किताबें न हों। इसी के बीच मेरा जन्म हुआ, मैं पला और इनको पढ़ता हुआ बड़ा हुआ। किताबें तो हमारी जिंदगी ही हो गई थी। मुझे याद है हम लोग बचपन में जब किसी के यहाँ जन्मदिन पर जाते थे तो उसके लिए उपहार में किताब ही ले जाते थे। समीक्षा के लिए तो बाल साहित्य यहाँ तक कि क्रिकेट कैसे खेलें जैसी किताबें भी खूब आती थीं। हम लोग इन्हीं सब किताबों का उपयोग उपहारादि के लिए किया करते थे। बाबूजी के एक चिकित्सक मित्र उनसे हमेशा मजाक किया करते थे कि काश मेरा बच्चा भी ऐसे अवसरों पर फिजिशियन सैंपल से काम चला लेता तो कितना अच्छा होता। पर उनकी यह हसरत कभी पूरी नहीं हो पाईं। आखिर किताबें तो किताबें ही होती हैं। उसका स्थानापन्न न तब संभव था न अब है।

पुस्तकों से तो बाबूजी को अद्भुत लगाव रहा। वे पुस्तकों का केवल संचयन ही नहीं करते थे उन्हें खूब सँभाल कर भी रखते थे। पुस्तकें किसी भी तरह से खराब न होने पाए इसके प्रति वे बड़े सचेत रचेत रहे हैं। बाबूजी के पुस्तक प्रेम से संबंघित एक बड़ी रोचक घटना है जिसे सुनाने के लोभ का संवरण मैं यहाँ नहीं कर पा रहा हूँ। राजेंद्र नगर के सबसे निचले इलाके में होने के कारण अकसर बरसात का पानी रचना प्रेस में घुस जाया करता था। बाबूजी अकेले ही प्रेस में घुस जाते और नीचे रखी पुस्तकों को प्रेस में रखे एक बड़े से टेबल पर रख देते थे। एक बार पटना में जबरदस्त बारिश हुई और इसमें रचना प्रेस पूरी तरह जलमग्न हो गया। बाबूजी को जैसे ही सूचना मिली वे बदहवास रचना प्रेस की और भागे (मेरे पीछे मोटर साइकिल पर बैठकर)। वहाँ तमाशबीनों की भीड़ लगी थी। कुछ लोग मजा भी ले रहे थे। अभी हम लोग कुछ निर्णय ले पाते कि तभी एक छपाक सी आवाज हुई। हुआ यह कि बाबूजी ने न आव देखा न ताव झट अपना कुर्ता उतारा और गंजी लुंगी में ही डुबाऊ पानी में छलाँग लगा दी। तैरना तो वे जानते ही थे सो पलक झपकते ही वे अपनी रचना के पास पहुँच गए। हम लोगों ने कई साँप, बिच्छुओं को उस पानी में तैरते हुए देखा था। पर बाबूजी को इसकी क्या परवाह। उन्हें तो बस अपनी किताबों को बचाना था। सो वे तैरते हुए वहाँ पहुँच गए और जितनी किताबों को वे बचा सकते थे उन्हें छज्जे पर रखकर बचा लिया। इस दुष्कर कार्य में वे थोड़े घायल भी हो गए पर वे इस बात से संतुष्ट नजर आए कि उनसे जितना हो सकता था उतना उन्होंने अपनी पुस्तकों को बचाने के लिए कर दिया। जो बचा सो बचा बाकी को 'अर्ध तजही बुध सरबस जाता' की तर्ज पर त्याग दिया। उस दैवीय लीला ने रचना प्रेस को नुकसान तो पहुँचाया ही उसमें रखी कई महत्वपूर्ण किताबों के साथ साथ समीक्षा की प्रतियों को भी लील लिया।

खैर 'समीक्षा' जिस मिशन के तहत शुरू की गई थी वह बाबूजी के कुशल संपादन में अपने मार्ग पर निकल पड़ी। पीछे मुड़कर देखना तो मानों उन्होंने सीखा ही नहीं था। इस दरम्यिान बहुत सारे लागों ने उससे जुड़ने की कोशिश की पर उसकी आँधी में किसी के पैर टिक न पाए। बाबूजी अकेले 'समीक्षा' का झंडा लेकर निकल पड़े। अपने बल बूते पत्रिका निकालना निश्चित ही एक असंभवप्राय कार्य है। पर बाबूजी ने तो मानो गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की इस अमर पंक्ति 'जोदी तोर डाक शुने केउ ना आशे तोबे एकला चलो रे' को ही अपने जीवन का आदर्श ही बना लिया था। समीक्षा निकली ही नहीं बल्कि उसने अपनी राह भी पकड़ ली और अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता है वाली कहावत को धता बताते हुए बाबूजी ने उसमें अपने आपको झोंक दिया। वे इसका सारा काम अकेले ही करते थे। समीक्षार्थ आई पुस्तकों की सूची बनना, समीक्षकों के यहाँ पुस्तकों को भेजना, उसके लिए पैकेट बनाना, फिर समीक्षकों को समय पर समीक्षा भेजने के लिए तकादा करना, प्रेषित समीक्षाओं की प्रूफ राडिंग करना, समीक्षा प्रकाशित हो जाने पर उसे उसके ग्राहकों तक समय पर भेजना, समीक्षा के प्रकाशनार्थ कुछ अपने मित्रों के मार्फत कभी कभी मिल जाने वाले विज्ञापनों की जुगाड़ के लिए दौड़ धूप करना। बाबूजी अकसर चटकारा लेते हुए कहते थे कि इस 'समीक्षा' का तो पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर सब मैं ही हूँ। पर ऐसा भी नहीं था कि 'समीक्षा' के संचालन में बाबूजी को किसी तरह की कोई सहायता नहीं मिलती थी। मुझे याद है कि हमारे पटना वाले मकान में 'समीक्षा' जब छपकर आती थी तो वह समय एक उत्सव के रूप में मनाया जाता था। परिवार का कोई सदस्य लिफाफे पर टिकट साटता था तो कोई पता चिपकाता था। किसी ग्राहक का पता अगर टंकित न हो तो कभी कभी उसे पता लिखना भी पड़ता था। अंत में लिफाफे में पत्रिका को डालकर उसे डाकखाने तक पहुँचाने का काम भी परिवार के सदस्यगण द्वारा ही किया जाता था। यह सब काम हम सभी लोग मिलकर करते थे। इसमे जो आनंद आता था वह वर्णनातीत है। इस कार्य में अनुशासन सर्वोपरि होता था। बाबूजी द्वारा दिए गए निर्देशों का अक्षरशः पालन होता था। डाक टिकट को चिपकाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था कि वह बिलकुल सीधी रहे। इसके थोड़ी सी भी आड़ी तिरछी होने पर बाबूजी की भृकुटी तन जाती थी। वे अकसर अपने पथ प्रदर्शक आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा का हवाला देते हुए कहते थे कि आचार्य महोदय इस प्रकार की हीला-हवाली पर बहुत नाराज होते थे। वे कहते थे कि अगर जीवन में कुछ करना है तो छोटी छोटी बातों पर ध्यान देना जरूरी है ओर यही बातें ही बहुत चीजों की ओर इशारा भी कर देती हैं। बाबूजी ने तो इस सूत्र को अपना आदर्श ही बना लिया। यही कारण है कि साहित्यिक जगत में उन तमाम पहलुओं पर उन्होंने अपनी बेबाक टिप्पणी की है जिसको छोटी, ओछी और गैरवाजिब समझकर लोगों ने छोड़ दिया है। उनकी यह आवाज 'समीक्षा' के संपादकीय में सहज सुनी जा सकती है। इसमें उन्होंने साहित्यिक दंगलबाजियों के साथ साथ उन तमाम बातों पर अपनी नाराजगी जताई है जिन पर शायद ही किसी संपादक की नजर गई हो। इनमें से एक है सरकार द्वारा डाक टिकटों में की गई मूल्य वृद्धि के विरुद्ध प्रदर्शित उनकी नाराजगी। हुआ यह कि पहले से ही अर्थाभाव से जूझ रही 'समीक्षा' को जब डाक टिकट में हुई मूल्य वृद्धि का सामना करना पड़ा तो इसका संपादक चीत्कार कर उठा और अपने संपादकीय में उसने सरकार की धज्जियाँ उड़ाकर रख दीं। इसका परिणाम क्या हुआ यह तो कहना मुश्किल है पर अपनी नाराजगी और सरकारी नीतियों से अपनी असहमति तो उन्होंने व्यक्त कर ही दी।

अब जब डाक विभाग की बात चल ही रही है तो इससे संबंधित एक मजेदार वाक्या का जिक्र यहाँ कर ही दूँ। मैने जब से होश सँभाला और जब तक पटना में रहा तब तक प्रत्येक दिन मैंने डाकिया नामक उस प्राणी का दीदार किया जो आज निश्चित ही जुगुप्सा की चीज बन गया है। डाकिया महोदय अपने दर्शनार्थ प्रत्येक दिन हमारे घर उपस्थित हो जाया करते थे। ऐसा कोई दिन न था जिस दिन डाकिया हमारे घर न आता हो। कभी प्रकाशकों द्वारा प्रेषित समीक्षार्थ पुस्तकें तो कभी 'समीक्षा' के किसी अंक विशेष के समय पर न प्राप्त होने की उलाहना या उसके संपादकीय की प्रशंसा से संबधित पत्र तो बिना नागा के हर कार्यदिवस पर आ ही जाते थे। बाबूजी भी उन पत्रों का उत्तर बड़ी तत्परता से देते थे। पर उनके पत्रोत्तर प्रेषित करने का समय हम लोगों के लिए महाकष्टदायी था। वे ठीक तीन बजे अपना पत्रोत्तर समाप्त करते और चाहते कि दोपहर सवा तीन बजे लेटर बॉक्स खुलने के पहले उनके पत्र उसके शरणागत हो जाएँ और यह काम हम लोगों को ही करना पड़ता था। दोपहर में और विशेषकर जेठ की दुपहरी में तो भोजनोपरांत शयन का अपना ही मजा है। शिक्षक पुत्र होने के कारण दोपहर में भोजन के उपरांत सोने का अधिकार वंशानुगत रूप से तो प्राप्त था ही। वैसे भोजन के बाद सोते तो बाबूजी भी थे, पर वे 'अल्पहारी, स्वान निद्रा' वाली कहावत को भी चरितार्थ करते थे। इधर हम सब 'ठाँस भोजनं चाप निद्रा' वाले प्राणी थे। बाबूजी करीब आधा घंटा विश्राम करते और फिर उठकर अपना काम करने लगते। इसमें प्राथमिकता थी चिट्ठियों का जवाब देना। इधर घोड़ा बेचकर निद्रा देवी का आनंद लेते व्यक्ति को ठीक तीन बजे उठाया जाता और निर्देशित किया जाता कि अपनी साइकिल उठाइए और इस पत्रोत्तर को लेटरबॉक्स में डाल आइए। उस समय कितना कष्ट होता होगा वह वही समझ सकता है जिसने दोपहर में भरकम भोजन के उपरांत सोने का आनंद लिया हो। कहा भी गया है कि 'जाके पाँव न फटे बिवाई वो क्या जाने पीर पराई' पर वहाँ सुनने वाला कौन था! मैं उठता अपने सारे गुस्से को जप्त करता और मरता क्या न करता वाली स्थिति में लेटरबॉक्स की तरफ मन मसोसकर चल देता था क्योंकि महटियाने पर उसका जो परिणाम निकलता उससे मैं भलीभाँति परिचित था। बाबूजी के साथ में सदा एक डंडा होता था जिसकी सहायता से वे चला करते थे और इन परिस्थितियों वे उसका प्रयोग करना भी भलीभाँति जानते थे। एक दिन मैंने अपने एक मित्र से जब अपना दर्द सुनाया तब उसने इससे पार पाने का एक सुझाव दिया। उसके सुझाव के अनुसार बाबूजी द्वारा दी गई चिट्ठियों को मैं उस समय कहीं छुपा देता और फिर यह कहकर कि मैंने चिट्ठी छोड़ दी है और मस्त नींद का मजा लेने लगा। शाम को सैर-सपाटे में निकलता तब पत्र को पत्र पेटी में डाल देता था। यह सिलसिला बहुत दिनों तक बदस्तूर जारी रहा। पर एक दिन चोरी पकड़ी गई। हुआ यह कि किताबों के बीच छुपाकर रखी गई मधुरेशजी की एक चिट्ठी को मैं लेटर बॉक्स में डालना भूल गया। मधुरेशजी का एक शिकायती पत्र बाबूजी के पास आया कि आजकल आप मेरे पत्रों का समय पर जवाब नहीं देते हैं। बाबूजी ने जब मुझसे पूछा तो मैंने बड़ी सफाई से मिथ्या भाषण करते हुए उनके सारे पत्रों को लेटरबॉक्स में सही समय पर डाल देने की बात कहकर और डाक विभाग पर सारा दोषारोपण मढ़कर उससे छुटकारा पा लिया। किसी ने ठीक ही कहा है कि प्रेम और चौर्य छुपाए नहीं छुपता है। एक दिन बाबूजी को किताबों के बीच स्थापित वह चिट्ठी प्राप्त हो गई मेरी चौर्य कला की कलई खुलते ही मेरी क्या दुर्गति हुई इसका बखान मैं अपनी जुबानी क्या करूँ! बस इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि उस दिन के बाद से बाबूजी के हाथ में मुझे मुँह बिराते हुई एक नई चमचमाती छड़ी दिखलाई पड़ने लगी जो निश्चित रूप से पहले वाली से ज्यादा मजबूत थी। खैर इसके बाद से मैं चिट्ठियों को छिपाकर रखने की हिमाकत कभी नहीं कर पाया और उसके बाद से सभी चिट्ठियों सही समय पर लोगों को प्राप्त होने लगीं।

हम लोग बाबूजी का जन्मदिन खूब धूमधाम से मनाते रहे हैं। मुझे उनका पचहत्तरवाँ जन्म दिन खूब याद है। उस समय मैं ग्वालियर के एक शासकीय महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक के रूप में पदस्थ था। बाबूजी स्थायी रूप से सत्यकाम भैया के साथ इग्नू कैंपस में रहने लगे थे। उसी समय सत्यकाम भैया को एक योजना के तहत दो वर्ष के लिए बुल्गारिया जाने का आफर मिला जिसे उन्होंने बाबूजी के निर्देशानुसार स्वीकार कर लिया। वे भाभी और बिटिया ऋषिता के साथ परदेश के लिए निकल पड़े। बाबूजी वहाँ अकेले ही अपने सेवक मंटू के साथ रहने लगे। हम लोगों ने उस दरम्यान उनसे ग्वालियर में ही रहने की खूब चिरौरी की पर वे कहाँ मानने वाले थे। कहाँ इग्नू का बड़ा सा मकान, चारों तरफ व्याप्त हरियाली और कहाँ ग्वालियर का मेरा दो कमरों का फ्लैट। भला बाबूजी कहाँ टिकने वाले थे। वे दो चार दस दिनों के लिए आते फिर दिल्ली की ओर दौड़ लगा देते। मुझे गुस्सा भी आता कि आखिर दिल्ली में क्या रखा है जो वे बार-बार उसका मुँह जोए रहते हैं। उसका पता मुझे उस समय तो नहीं लग पाया पर जब कुछ वर्षों के उपरांत मैं भी दिल्ली आ गया तब मुझे अहसास हुआ कि आखिर बाबूजी का दिल दिल्ली में ही क्यों रम गया था! दिल्ली है ऐसी चीज। जो भी यहाँ आया वह यहाँ की मायावी दुनिया में इस तरह फँसकर रह गया कि उसे उसके अलावा कोई दूसरी चीज पसंद ही नहीं आई। खैर इसी बीच बाबूजी का पचहत्तरवाँ जन्मदिन भी नजदीक आ गया। इसे हम लोगों ने अमृत महोत्सव के रूप में मनाने का निर्णय लिया। बाबूजी की चिरौरी फिर शुरू हुई पर वे ग्वालियर आने को तैयार ही नहीं हुए। अंत में पत्नी के सुझाव पर दिल्ली जाकर ही उनका यह जन्मदिन मनाने का निर्णय लिया गया। हम लोग सपरिवार शताब्दी एक्सप्रेस से ग्वालियर से दिल्ली पहुँच गए। उनका जन्मदिन कैसे मनाया जाए इस पर हम एक विचार नहीं हो पा रहा था। इग्नू परिसर हमारे लिए भी बहुत कुछ अपरिचित सा ही था। सत्यकाम भैया भी वहाँ नहीं थे। हम लोग सत्यकाम भैया के एक अभिन्न मित्र और बाबूजी के अत्यंत प्रिय प्रो. अहमद रजा खान जिन्हें हम लोग खान साहब के नाम से ज्यादा जानते हैं, के पास अपनी समस्या को लेकर गए। खान साहब ने अपने स्वभाव के अनुरूप सहज ही हमारे प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और अपनी एक मुस्कुराहट के साथ उस सुअवसर की सारी व्यवस्था इग्नू के अतिथि गृह मे करवा दी। बाबूजी से जुड़े सभी लोगों को उसमें आमंत्रित किया गया जिसमें प्रो. मुचकुंद दुबे, ब्रजभूषण सहाय, कमला प्रसाद आदि उनके बाल सखा भी सपरिवार शरीक हुए। खूब धूमधाम से उनका वह जन्मदिन मनाया गया। उस अवसर पर लोगों ने उन्हें तरह तरह के उपहार भी भेंट किए।

बाबूजी का जीवन संघर्षों से भरा पड़ा है। पर एक अवधूत की तरह उन्होंने अपने जीवन संघर्ष को जिस तरह से अपने विकास के रूप में रूपायित किया वह निश्चित ही काबिले गौर है। मैंने पाया है कि विपरीत परिस्थितियों में उनमें एक गजब तरह की शक्ति उन्हें प्राप्त हो जाती है और एक नई उर्जा के साथ वे अपने काम में लग जाते हैं। बाबूजी जब जब अपने 61वें बसंत में प्रवेश करने का आनंद ले ही रहे थे कि तत्कालीन बिहार सरकार ने अपनी प्रकृति के अनुरूप एक अजब निर्णय के तहत बिहार के सैकड़ों प्राध्यापकों को अपने पिछले नियमों का हवाला देते हुए अचानक सेवा मुक्त कर दिया। उस समय बाबूजी पटना विवि के हिंदी विभाग के अध्यक्ष थे। सरकार के इस निर्णय का उन पर भी असर पड़ा और इस निर्णय के दूसरे दिन से वे भी कार्यमुक्त कर दिए गए। ऐसी विकट परिस्थिति में भी जब चहुँओर त्राहिमाम-त्राहिमाम का स्वर सुनाई पड़ रहा था बाबूजी लौह पुरुष की तरह अडिग रहे और यह कहकर कि चलो सरकार ने पदभार से मुक्त कर कुछ काम करने का अवसर प्रदान किया है न केवल अपने को सँभाले रखा बल्कि दूसरों के लिए भी प्रेरणस्रोत बन गए। बाबूजी ने अवकाश प्राप्त करने के बाद अपनी प्रकृति के अनुरूप ही खूब काम किया। बृहतकायी 'हिंदी उपन्यास का इतिहास' और फिर तीन खंडों में 'हिंदी कहानी का इतिहास' प्रस्तुत कर उन्होंने निश्चित ही अपने को प्रमाणित कर दिया है। ऐसे समय मे जब बड़े नामी-गिरामी आलोचकों ने हताशा और निराशा में 'हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन' की आवश्यकता पर ही प्रश्नचिह्न लगाना शुरू कर दिया था। अपने इक्कीसवें वर्ष में प्रवेश के साथ ही बाबूजी ने 'हिंदी साहित्य के आधुनिक इतिहास' पर अपनी नजरें इनायत कर दीं। चाहत तो शायद पूरा इतिहास लिखने की थी पर उन्हें तब तक लगने लगा था कि अब समय कम है और इतने समय में इससे ज्यादा काम नहीं किया जा सकता। वैसे पचहत्तर वर्ष के बाद बाबूजी से ही ईश्वर से हर पाँच वर्ष के बाद अगले पाँच वर्षों का एक्सटेंशन माँग ही लेते थे और तब तक भगवान भी उसे थोड़े नाज नखरे के साथ ही सही पर उसे स्वीकार करते आए थे। पर अस्सीवें वर्ष में प्रवेश के उपरांत बाबूजी का स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगा। उन्हें लग गया था कि उनकी एक्सटेंशन वाली अर्जी अमान्य होने वाली है। समय की कमी को भाँपते हुए अपने हिंदी साहित्य के इतिहास वाले मिशन को थोड़ा छोटा करते हुए उन्नीसवीं शताब्दी के हिंदी साहित्य पर काम करना शुरू किया। पर लगातार गिरता स्वास्थ अब उनके लिए बोझिल हो चला था। उनके लिए कंप्यूटर पर बैठना कठिन होता जा रहा था। स्मरण शक्ति भी कुछ कुछ कमजोर हो चली थी। पुस्तक अभी अधूरी थी। बाबूजी ने एक दिन मुझे बुलाकर उस अधूरी पुस्तक को पूर्ण करने का आदेश सा दे डाला। मैं अपने सारे कार्य को स्थगित कर उस पुस्तक पर जुट गया। पर बाबूजी जिस तरह से शोध केंद्रित कार्य करते थे वैसा कार्य करना किसी के बूते की बात नहीं थी। खैर मैंने जो कुछ उनसे सीखा था उसके सहारे उस पुस्तक को पूर्ण करने का काम किया और पिछले दिनों वह पुस्तक वाणी प्रकाशन से छपकर भी आ गई है। मैं उस पुस्तक के माध्यम से बाबूजी को प्रणाम कर रहा हूँ यही मेरी उनको श्रद्धांजलि है। सच मानिए इस पुस्तक का जो कमजोर अंश है वह मेरा है और जो तगड़ा है वह बाबूजी का।


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हिंदी समय में सत्यकेतु सांकृत की रचनाएँ