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संस्मरण

कवि से कहीं जियादा बड़े मनुष्य थे वीरेन डंगवाल
शैलेन्द्र चौहान


वीरेन डंगवाल को याद करना एक शीतोष्ण ऋतु को याद करना है। नहीं जानता क्या और कैसे कहूँ उनके बारे में। एक अवसाद, एक सूनापन सा मन पर छा जाता है जब उनकी मृत्यु से साक्षात होता है। 28 सितंबर का वह दिन एक गोल गोल घूमते वायु के चक्रवात की तरह लगा था जब सुना था कि वीरेन नहीं रहे। 13 -14 सितंबर 2015 को ही तो कुमार मुकुल को मैं उनके घर ले गया था। अपने जीवन के अंतिम दौर में वीरेन मेरे पड़ोसी थे। गाजियाबाद के इंदिरापुरम में जयपुरिया सनराइज ग्रीन्स सोसाइटी में वह एल टावर के 802 फ्लैट में रह रहे थे और मैं पी टावर के 1703 फ्लैट में। चार-छह दिनों में मिलना हो जाता था। उनसे मिलने बहुत मित्र आते थे, साहित्यकार, पत्रकार, कलाकार आदि। जब तब मुझे भी उन लोगों से भेंट का अवसर मिल जाता था। कुछ पुराने मित्रों से भी भेंट हो जाती थी। एक दिन मनोहर नायक और मंगलेश डबराल वहाँ बैठे थे। मनोहर से मेरी भेंट कोई बत्तीस वर्ष पहले इलाहाबाद में हुई थी, जब मैंने वहाँ एक नौकरी ज्वाइन की थी। मनोहर अमृत प्रभात अखबार में काम करते थे। कलाकार अशोक भौमिक से भी वहीं भेंट हुई लगभग उतने ही अंतराल के बाद। सुप्रसिद्ध कथाकार शेखर जोशी से भी उनके यहाँ मुलाकात हुई। यद्यपि शेखरजी से मैं एक वर्ष पहले उनके बेटे संजय के यहाँ मिल चुका था। तब शेखरजी से भी इलाहाबाद के बाद ही मिला था। इन सभी से मेरा इलाहाबाद से ही परिचय और मित्रता थी। और संयोग यह कि वीरेन से भी मेरी पहली मुलाकात इलाहाबाद में ही हुई थी। वह अक्टूबर या नवंबर का माह था, सन 1983 का। वह जगह कौन सी थी यह मैं विस्मृत कर चुका था लेकिन मुझे वीरेन ने ही याद दिलाया कि वह स्थान दरभंगा कॉलोनी का सी.वाइ. चिंतामणि मार्ग था जहाँ वह अपनी ससुराल से आ रहे थे और यह भी कि मेरे साथ सुधी आलोचक सत्यप्रकाश मिश्र भी थे। फिर इलाहाबाद के कॉफी हाउस में एकाध भेंट हुई। पर वीरेन से मिलकर ऐसा लगा कि हम दशकों के मित्र हैं। निश्छल स्नेही व्यवहार उनका बहुत बड़ा गुण था जिसका हर व्यक्ति कायल था। बहुत कम लोगों में यह गुण पाया जाता है। और यही एक बात थी जिसके कारण उनकी दोस्ती उनकी कविता पर भारी पड़ती थी। मैंने उन्हें एक पारंपरिक कवि के रूप में कभी नहीं देखा। अपनी कविताओं की चर्चा वह बहुत ही कम किया करते थे। मुझे उनकी यही बात भा गई थी। वह एक कवि से जियादा बड़े मनुष्य बने रहे। उनके तीन कविता संग्रहों 'इसी दुनिया में' (1990), दुष्चक्र में सृष्टा (2002) और 'स्याही ताल' (2009) के अतिरिक्त उनकी बहुत सी कविताएँ इधर उधर बिखरी हुई हैं। उनकी 'कवि' नामक एक कविता देना मुझे यहाँ उपयुक्त लग रहा है :

'मैं ग्रीष्म की तेजस्विता हूँ
और गुठली जैसा
छिपा शरद का उष्म ताप
मैं हूँ वसंत में सुखद अकेलापन
जेब में गहरी पड़ी मूँगफली को छाँट कर
चबाता फुरसत से
मैं चेकदार कपड़े की कमीज हूँ

उमड़ते हुए बादल जब रगड़ खाते हैं
तब मैं उनका मुखर गुस्सा हूँ

इच्छाएँ आती हैं तरह-तरह के बाने धरे
उनके पास मेरी हर जरूरत दर्ज है
एक फेहरिस्त में मेरी हर कमजोरी
उन्हें यह तक मालूम है
कि कब मैं चुप हो कर गरदन लटका लूँगा
मगर फिर भी मैं जाता रहूँगा ही
हर बार भाषा को रस्से की तरह थामे
साथियों के रास्ते पर

एक कवि और कर ही क्या सकता है
सही बने रहने की कोशिश के सिवा।'

तो वीरेन की वह ग्रीष्म सी तेजस्विता, शरद का ऊष्म ताप और वसंत की उदासीनता मुझसे कभी दूर नहीं हो पाई। यद्यपि मैं उनकी तरह कभी मृदु और सर्वप्रिय नहीं हो सका, लेकिन सही बने रहने की कोशिश मैंने अवश्य की। वीरेन को मेरा यही अवगुण बेहद आत्मीय लगता रहा। सन 1984-85 में मैं अपने जीवन की एक ऐसी घटना से संत्रस्त हुआ जिसके कारण मुझे वीरेन के घर बरेली जाना पड़ा। मेरे ऊपर एक आपराधिक मामला मेरे पैतृक गाँव के प्रधान के बेटे द्वारा पुलिस में दर्ज करा दिया गया जिसके कारण मैं बहुत परेशान था। मैनपुरी जिले का पुलिस अधीक्षक उन दिनों एक पहाड़ी व्यक्ति हुआ करता था। वह एक छद्म साहित्यकार भी था। अव्यावहारिक होने के नाते मैंने उसे कोई महत्व नहीं दिया इससे वह बहुत आहत था। उसे मुझसे अपनी प्रशंसा की अपेक्षा थी जो पूरी न होने पर वह मुझसे नाराज था। इसका पता तब चला जब मैं उस केस के संबंध में उससे मिलने गया। उसने मुझ पर व्यंग्य किया 'बहुत बड़े साहित्यकार बने फिरते हो अब मेरे पास क्यों आए हो। पुलिस अपना काम कर रही है।' उसे ज्ञात था कि यह मामला झूठा है लेकिन वह उस अपराधी के साथ था। बाद को मुझे पता चला कि गाँव का वह लड़का नियमित रूप से उस एस.पी. के यहाँ घी और अनाज पहुँचाता था। वह पुलिस का दलाल था। यहाँ तक कि गाँव की कुछ युवा महिलाएँ और लड़कियाँ भी पुलिस वालों के पास ले जाता था। इस बात से मैं उस एस.पी. के प्रति और असहिष्णु हो गया। मैंने उसकी शिकायत की लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकला। मुझे पता चला कि वीरेन डंगवाल उस एस.पी. के साले के गहरे मित्र हैं और वह एस.पी. भी वीरेन के यहाँ मिलने जाता है। अतः मैंने सोचा कि अपनी स्थिति साफ करने के लिए वीरेन को माध्यम बनाया जाए। तो मैं उनसे मिलने बरेली पहुँचा। उन्होंने पूरी आत्मीयता और गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया। मैंने वीरेन को अपनी समस्या बताई तो वीरेन बोले 'वो व्यक्ति तो बहुत नालायक है इसलिए मैं उसे जियादा घास नहीं डालता। अलबत्ता मैं उसके साले से यह सब कहूँगा।' खैर मैं लौट आया। उनके बड़े भाई जो मध्यप्रदेश में बड़े सरकारी अफसर थे मैंने उनसे सहायता लेने की बात कही तब वीरेन बोले मैं उनसे नहीं कहूँगा और फिर वे दूसरे प्रदेश में हैं। हाँ अगर तुम उनसे मिलकर यह सब समझाओ तो शायद वे कुछ कर सकें लेकिन परेशानी यह है कि वे उस एस.पी. से एक काम कहेंगे तो वह एस.पी. उनके गले पड़ जायेगा अपने फायदे के लिए। 'फिर वह बोले मैं उसके साले से कहूँगा शायद उसकी बात का उस गधे पर कुछ फर्क पड़े।'

बहरहाल वीरेन ने अपनी असमर्थता कुछ इतनी सहजता और साफगोई से जाहिर की कि मुझे निराशा हुई लेकिन बुरा कतई नहीं लगा। मैं बरेली से वापस लौट आया। मुझे यह आभास हो गया कि इस तरह कोई सहायता मिलना मुश्किल है। अब जो भी होगा न्यायालय से ही होगा और वही हुआ भी। उस एस.पी. को बहुत समझाने के बावजूद मेरे खिलाफ पुलिस ने चार्ज शीट दाखिल कर दी। मुकदमा चला और मैं बरी हुआ। इस प्रक्रिया में एक डेढ़ वर्ष बीत गया। मैं तब कानपुर में था। इस प्रकरण के पश्चात वीरेन से दो-एक मुलाकातें साहित्यिक कार्यक्रमों में हुईं। उनका वही निश्छल व्यवहार 'अरे... शैलेंद्र कहाँ हो, क्या कर रहे हो प्यारे, मौज चल रही है।'

मेरा वीरेन से फोन संपर्क हमेशा बना रहा। फिर सन 1989 में मेरा ट्रांसफर मुरादाबाद हो गया। मुरादाबाद से शाहजहाँपुर तक मेरा कार्यक्षेत्र था, बरेली बीच में पड़ता था। मैं अकसर बरेली जाता रहता था और वीरेन से मिलता रहता था। उन दिनों वीरेन अमर उजाला अखबार का साहित्य वाला पृष्ठ देखते थे। अतः मुझसे कहते - 'अरे बेटा कुछ हमारे अखबार को भी दे दिया करो।' मैंने अपने गाँव से संबंधित कुछ संस्मरण उन्हें भेजे जो उन्होंने बहुत अच्छी तरह प्रकाशित किए। मुरादाबाद में एक बार शीलजी आए तो गोष्ठी आयोजित की जिसमें सुपरिचित कवि-गीतकार माहेश्वर तिवारी ने अपना पूरा सहयोग दिया। वे मुरादाबाद में ही रहते थे और मेरे बहुत पुराने परिचित थे। जब मैं विदिशा में इंजीनियरिंग था वह जैन स्नातकोत्तर कॉलेज में हिंदी के प्राध्यापक थे। मूलचंद गौतम जिन्हें वीरेन मजाक में 'मूली' कहते थे भी पास में ही संभल में थे वह भी आए। पारसी थिएटर के जनक मास्टर फिदा हुसैन नरसी ने भी शिरकत की। एक अच्छी गोष्ठी हुई।

वीरेन का बरेली से फोन आया 'प्यारे, मूली ने बताया तुमने शीलजी को बुलाकर अच्छी गोष्ठी कर डाली। मुझे खबर भी नहीं दी। भैया ऐसा मत किया करो। अच्छा अब ऐसा करो कि इस गोष्ठी की अच्छी सी रपट तुरत भेजो। अगले इतवार को छपनी है।' मैंने रिपोर्ट भेजी थोड़ी देर से। वह उस रविवार नहीं पर अगले रविवार अच्छी तरह छपी। एक वर्ष बाद मेरा कोटा ट्रांसफर हो गया फिर जयपुर। वीरेन एक बार जयपुर भी आए 'पहल सम्मान' में। मैं भी कार्यालयीन काम से जयपुर से बरेली गया तो फिर वही संग-साथ हुआ। एक बार मैं कानपुर गया तो वह वहाँ अमर उजाला के संपादक बना दिए गए थे। उन दिनों मैं फरीदाबाद में था। उनसे बात हुई तो मैं उनके ऑफिस पहुँचा। वह मिलकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्हें जब साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला, मैंने उन्हें फोन किया। बोले बस भैया ऐसे ही अनपेक्षित मिल गया। दो लोगों के झगड़े में मेरा फायदा हो गया। इसके बाद पाँच-सात साल मेरी उनसे कोई भेंट नहीं हो सकी। मैं नागपुर चला गया था। फोन से बात होती थी। बाद को कलकत्ता में पहल सम्मान के आयोजन में उनसे मुलाकात हुई। वही पुराण लहजा 'और बेटा मौज कर रहे हो।' पुनः कुछ वर्ष बीत गए। बड़ोदा, बारां होते हुए मैं जम्मू पहुँच गया। इस दौरान कुछ संपर्क कम रहा पर एक दूसरे के समाचार मिलते रहे। जम्मू से जब मैं दिल्ली आ गया और नोएडा में रहने लगा तो पता चला कि वह अपने बड़े बेटे के पास तिमारपुर में रहते हैं। एक दिन फोन से बात हुई तो बोले अरे यार कुछ दिन यहाँ रह लेता हूँ फिर बरेली लौट जाता हूँ। आओ कभी मिलो। फिर मुझे पता चला कि उन्हें मुँह का कैंसर हो गया है और दिल्ली में उनका इलाज चल रहा है। वह अपने बेटे के यहाँ हैं। बात हुई बड़े बिंदास अंदाज में बोले हाँ बेटे नोएडा में ही रह रहे हो। भैया इलाज हो रहा है जो भी होगा इतनी क्या चिंता करनी उसकी। उस वक्त मुझे उनकी एक कविता 'रुग्ण पिताजी' याद आई :

'रात नहीं कटती लंबी यह बेहद लंबी लगती है
इसी रात में दस-दस बारी मरना है जीना है
इसी रात में खोना-पाना-सोना-सीना है।
जख्म इसी में फिर-फिर कितने खुलते जाने हैं
कभी मिले थे औचक जो सुख वे भी तो पाने हैं
पिता डरें मत, डरें नहीं, वरना मैं भी डर जाऊँगा
तीन दवाइयाँ, दो इंजेक्शन अभी मुझे लाने हैं।

बीच बीच में वह बरेली चले जाते थे। भेंट नहीं हो सकी उन दिनों। कुछ समय बाद मैं इंदिरापुरम रहने आ गया। एकाध वर्ष बाद वाचस्पतिजी ने मुझे बताया कि वीरेन डंगवाल आपके पड़ोस में ही रह रहे हैं और वह उनसे मिल कर गए हैं। मुझे आश्चर्य हुआ कि वीरेन इतने पास रहते हैं और मुझे पता ही नहीं। खैर मैं और पत्नी उनसे मिलने उनके फ्लैट पर गए। अपने स्वाभाव के अनुसार वह प्रेम और उत्साह से मिले। अब शारीरिक रूप से वह बहुत कमजोर हो चुके थे। शरीर में कुछ बचा नहीं था। कीमोथैरेपी चल रही थी। मैं उनके पुराने रूप और नए शरीर-रूप में कोई सामंजस्य नहीं बिठा पा रहा था। पर यह वास्तविकता थी और उसे स्वीकार करना था। वीरेन तब भी आत्मविश्वास से पूर्ण थे। गजब की जीवट थी उनमे। बोले जब भी फुरसत हो आ जाया करो। दो-चार दिन बाद मैं उनसे मिलने चला जाता था। रीटा भाभी स्वागत सत्कार में कोई कमी नहीं रहने देती थीं। कुछ समय बाद मुझे सेवानिवृत्त होना था। मेरी पत्नी जयपुर आ गई थी। वीरेन को जब यह पता चला तो बहुत परेशान हो गए। खाना कहाँ खाते, नाश्ता क्या बनाते हो। ऐसा करो यहीं आ जाया करो। शर्माओ मत यार यह भी अपना ही घर है। दोपहर में मैं ऑफिस में खाना खा लेता था शाम को कुछ सलाद या फल खाता था। सुबह नाश्ते में कॉर्नफ्लेक्स, ओट्स वगैरह खाता था। मैं उन्हें समझाता कि मुझे खाने की कोई दिक्कत नहीं है लेकिन वह नहीं मानते और छुट्टी वाले दिन तो दोपहर होने से पहले ही फोन आ जाता यहीं खाना खाओगे। घर पहुँचने के पहले एक बार और याद दिला देते। जियादा छुट्टियाँ जयपुर में कटती थीं, इंदिरापुरम रहना कम ही होता था। समय बीत गया। मैं सेवानिवृत्त हो गया और जयपुर चला आया। दो-चार दिन बाद उनका फोन आ जाता पूछते जयपुर में सब ठीक चल रहा है, इंदिरापुरम कब आ रहे हो। वहाँ लैट में गैस पाइप लाइन लगनी थी सो मुझे इस बार कोई पंद्रह दिनों तक इंदिरापुरम में ही रुकना पड़ा। और इस पूरे समय मुझे वीरेन के घर खाना खाने जाना पड़ा। दोपहर की जगह मैंने शाम का करार कर लिया। शाम होते ही फोन आता फिर एक घंटे बाद और फिर आठ साढ़े आठ बजे तक। यह फाइनल कॉल होता। और मुझे पहुँचना पड़ता। मेरे लिए बिना प्याज की सब्जी अलग से बनती। रीटा भाभी स्नेह से परोसतीं। बहू प्रियंका चाचाजी उर्फ अंकल को याद दिलाती कि पापा अब कल मुझे फोन करने को कहेंगे कि आप समय से आ जाएँ। बेटा प्रफुल्ल भी तीन माह छुटियों में वहाँ होता और सबसे सुखद होता, प्रपौत्र जो अपनी मनोहारी बातों और खेल से मन मोहता। वीरेन कुछ मन से कमजोर हो रहे थे। उन्हें बहुत कष्ट था। कीमोथैरेपी के बाद उनके गले में एक घाव हो गया था जिससे खून रिसता था। एकाध बार वह यह बोले भी। मैंने कहा अब जो है उसे सहन तो करना ही है। बोले हाँ, लेकिन सहन करने वाला ही यह जान सकता है कहने से क्या होता है। मैं चुप हो गया। मैं उनकी बीमारी पर बात नहीं करना चाहता था। उन्हें और कमजोर करना उचित नहीं प्रतीत होता था तब वीरेन खूब कविताएँ भी लिख रहे थे। कविताएँ पत्रिकाओं में छपतीं तो मुझे पत्रिका दे देते। छपाई की ढेरों गलतियाँ रेखांकित कर देते। ये कविताएँ बहुत अलग कविताएँ थीं। हिंदी कवियों से भिन्न। कवि आलोचक विष्णु खरे ने वीरेन की कविताओं के बारे में लिखा - 'वीरेन की जितनी दृष्टि व्यष्टि पर थी, उतनी ही समष्टि पर भी थी। वह न सिर्फ प्रतिबद्ध थे बल्कि वाम-चिंतक और सक्रियतावादी भी थे। अपने इन आखिरी दिनों में भी उन्हें जनमंचों पर सजग हिस्सेदारी करते और अपनी रचनाएँ पढ़ते देखा जा सकता था। पिछले कई वर्षों का गंभीर कैंसर भी उनके मनोबल, जिजीविषा और सृजनशीलता को तोड़ न सका बल्कि हाल की उनकी कविताओं, मसलन दिल्ली मेट्रो पर लिखी गई रचनाओं ने उनके प्रशंसकों और समीक्षकों को चमत्कृत किया था क्योंकि उनमें दैन्य और पलायन तो था ही नहीं, उलटे एक नई भाषा, आविष्कारशीलता, जीवंतता और अन्य सारे कवियों को चुनौतियाँ थीं।'

वीरेन नया पढ़ना चाहते थे। पत्रिकाएँ किताबें। मेरी पुस्तकें लेकर पढ़ते और अपनी राय देते। मेरा संस्मरणात्मक उपन्यास 'पाँव जमीन पर' पढ़ने के बाद एक दिन वह बोले। तुम संस्मरण लिखो अपने समकालीनों पर। यह एक अच्छा काम होगा। एकाध बार फिर उन्होंने यह दोहराया। मैं मन बना रहा था कि क्यों न उनसे ही शुरुआत की जाए। वह अब बरेली वापस जाने का मन बना चुके थे। बरेली वाले घर में कुछ काम भी प्रफुल्ल ने करा दिया था। वह अगस्त में ही शिफ्ट हो जाना चाहते थे पर जाते जाते 19-20 सितंबर हो गया। मैं जयपुर में था। हाल चाल लेता रहता था। बरेली जाने से ठीक पहले और बाद में कोई बात नहीं हो सकी और फिर वीरेन हमें अलविदा कह गए। यह कतई भरोसा नहीं था कि इतनी जल्दी यह सब हो जाएगा। शायद वह बरेली जाने के लिए ही रुके हुए थे। उनकी कविता 'खुद को ढूँढ़ना' यहाँ उनकी श्रद्धांजलि स्वरूप उद्धृत कर रहा हूँ। उनकी शीतोष्ण परछाईं जब तब दिख जाती है।

एक शीतोष्ण हँसी में
जो आती गोया
पहाड़ों के पार से
सीधे कानों फिर इन शब्दों में

ढूँढ़ना खुद को
खुद की परछाईं में
एक न लिए गए चुंबन में
अपराध की तरह ढूँढ़ना

चुपचाप गुजरो इधर से
यहाँ आँखों में मोटा काजल
और बेंदी पहनी सधवाएँ
धो रही हैं
रेत से अपने गाढ़े चिपचिपे केश
वर्षा की प्रतीक्षा में।


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