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कविता

बाँस
उर्मिला शुक्ल


रिश्ते होते हैं
बाँस की तरह
झुकते हैं तो
रचते हैं इतिहास
तनाव धकेलता है
टूटन की ओर

2.

मैं बाँस की हरी कमची
झुककर गढ़ती रही मैं
जो जो चाहा तुमने
पर तुमने सोख लिया
मेरा सारा हरियरपन अब
शिकायत है तुम्हें कि
मैं चुभती हूँ तुम्हें

3.

बचाना ही होगा
बाँस का हरियरपन
बँचेगा बाँस तो
हरीभरी रहेगी कलाएँ
कला का हरियरपन
जब रंग देगा
आदमी का अंतस
तब आदमी भी
हो जाएगा हरियर
बाँस की तरह            


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