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कविता

रंग तिरंगे के
उर्मिला शुक्ल


थक गए हैं अब
तिरंगे के
तीनों रंग
खो सा गया है
उसके रंगों का
महत्व

हरा अब
रहा नहीं प्रतीक
खुशहाली का
खुशहाली तो अब
कैद है
गोदामों में
और केसरिया तो
निष्कासित ही है
जीवन से
और श्वेत
हाँ उसकी तो हम
करते हैं बात
देते हैं हम
शांति का संदेश
मगर...  ?
और अकुला
उठे हैं
ये तीनों रंग
अपने रंगहीन
हो जाने पर


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