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कहानी

गंदगी का बक्सा
तेजेंद्र शर्मा


लंदन में हिमपात हुए तो एक अर्सा बीत चुका है। लंदनवासी अब बर्फ देखने के लिए स्कॉटलैंड या अन्य उत्तरी शहरों की ओर जाते हैं। सफेद क्रिसमिस तो अब किताबों, कार्डों, या लोगों की यादों में ही दिखाई देता है। किंतु जया और दिलीप के रिश्तों में जो ठंडापन पैठ गया है, वह जमी हुई बर्फ से कहीं अधिक सर्द और भयावह है!

आज लगभग दो वर्ष होने जा रहे हैं। दिलीप ने काम धाम छोड़ रखा है। घर में भी शराब और शाम को 'पब' में भी शराब। नाश्ते और भोजन में केवल शराब ही शराब। ऐसा क्या दुख है दिलीप को? वह क्यों नहीं समझ पा रहा है कि उसके इस व्यवहार से जया को कितना दुख पहुँच रहा है? वह बेचारी दिन भर नौकरी करती है, घर आ कर अपनी बेटी पलक की पढ़ाई में सहायता करती है, और रात को भोजन बना कर दिलीप की प्रतीक्षा करती है। ...अब तो प्रतीक्षा करना भी बंद कर दिया है...।

"मोह माया को त्याग दो! जीवन का एक ध्येय बना लो, कि जानते-बूझते किसी भी प्राणी का दिल नहीं दुखाओगे। बस सत कर्म करते रहो। फल की चिंता में समय व्यर्थ ना करो। काम और वासना के पीछे भागना छोड़ दो। यह शरीर गंदगी का बक्सा है। प्रकृति ने वासना के लिए उपयुक्त अंगों को मलमूत्र बाहर निकलने का रास्ता भी बना दिया है। गंदगी से बचो। अच्छे कर्म कभी व्यर्थ नही जाते।" गुरु जी की बातें, जया के दिमाग को मथती रहती हैं।

आजकल जया स्वाध्याय के सत्संग में चली जाती है। कुछ समय के लिए ही सही, शरीर और उस से जुड़ी समस्याओं से छुटकारा सा मिलता दीखता है। "जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे को होए?" इस बात का जया के पास कोई उत्तर नहीं। जीवन की गति शुरू-शुरू में इतनी तीव्र थी कि उसके पास स्थूल बातों के अतिरिक्त किसी भी विचार के लिए समय नहीं था। भला सूक्ष्म को जानने या समझने के लिए समय ही कहाँ था?

राज ही एक ऐसा व्यक्ति है जिसके साथ हर विषय पर बातचीत कर लेती है। विषय चाहे सूक्ष्म हो या स्थूल, राज के पास जैसे हर प्रश्न का उत्तर मौजूद रहता है। वह कई बार सोचती भी है कि यदि दिलीप और उसके बीच एक खाई सी न बन गई होती तो क्या राज उसकी सोच के दायरे में कदम भी रख सकता था? राज शराब नहीं पीता, माँस नहीं खाता, सिगरेट से भी परहेज, फिर तंबाखू का तो सवाल ही कहाँ उठता है! क्या बस यही कारण है कि जया राजन के साथ समय बिता कर थोड़ा हल्का महसूस कर लेती है। केवल इतना कारण ही तो नहीं हो सकता। जया सदा ही दिलीप में एक मित्र तलाशती रही, किंतु वह मित्र उसे अंततः राज में मिला। पति-पत्नी एक-दूसरे के मित्र क्यों नहीं बने रह पाते? लेकिन ज्योति और दक्षा के भी तो प्रेम विवाह ही हुए थे। जब भी उनसे बात करती है, तो उनके मन में भी यही परेशानी पाती है कि विवाह के बाद उनके पति केवल पति ही बन कर रह गए हैं। मित्र न जाने कहाँ खो गए हैं। परंतु उन दोनों के पति अपने-अपने व्यापार में जुटे होने के कारण अपनी-अपनी पत्नियों के मित्र नहीं बन पाते। दिलीप की तरह समय को शराब में नहीं बहाते रहते।

जया ने राज से ही तो प्रश्न किया था, "राज, क्या वास्तव में जीवित रहते, मोह माया से मुक्ति मिल सकती है? तुमने कैसे इतनी आसानी से अपने जीवन की आवश्यक्ताओं को इतना सीमित कर रखा है? मैं क्यों ऐसा नहीं कर पाती?"

"जया, मैंने एक घटना राजा जनक के बारे में पढ़ी है। वे राजा होते हुए भी एक संन्यासी थे। राजशाही के बावजूद उनके दरबार में काफी हद तक लोकतंत्र मौजूद था। उनके दरबार में किसी ने प्रश्न किया कि, 'ऐ राजन, तुम संसार के सभी सुख भोग रहे हो, राजा हो, चाँदी के बर्तनों में भोजन करते हो, सोने के पलंग पर सोते हो और फिर भी चाहते हो कि हम मान लें कि तुम मूलतः संन्यासी का जीवन जी रहे हो? यह कैसी राजनीति है?'

राजा जनक कुछ देर विचार करते रहे। एकाएक उन्होंने आदेश दिया कि ऐसा प्रश्न करने वाले को दो दिन पश्चात फाँसी पर लटका दिया जाए। भला राजा की आज्ञा का उल्लंघन कैसे हो सकता था। उस व्यक्ति को कारागार में पहुँचा दिया गया। किंतु कारागार में उसे मखमली बिस्तर दिए गए, भोजन के लिए नाना प्रकार के व्यंजन दिए गए, परिचारिकाए उसे उबटन लगाकर स्नान करवाने के लिए आईं। जीवन का हर सुख जो वह व्यक्ति सोच तो सकता था किंतु महसूस नहीं कर सकता था, उसे दिया गया। और दो दिन पश्चात उसे राजा जनक के दरबार में लाया गया। राजा जनक ने उस व्यक्ति से पूछा, 'ऐ महानुभाव तुम्हें फाँसी तो अभी लग ही जाएगी, किंतु तुम से एक प्रश्न करना चाहता हूँ। पिछले दो दिनों में तुमने जीवन का हर सुख भोगा। क्या तुम्हें याद है कि तुम ने भोजन में क्या-क्या व्यंजन खाए? क्या तुम्हें याद है कि उस मखमली चादर का रंग क्या था जिस पर तुम सोए थे। उस परिचारिका का चेहरा या नाम याद है जिस ने उबटन लगा कर तुम्हें स्नान करवाया था।' वह व्यक्ति आँखें नीची किए बोला, 'राजन, मुझ पर तो मृत्यु की तलवार लटक रही थी। भला मैं उन सुखों का आनंद कैसे ले सकता था।'

राजा जनक ने शांत स्वर में उत्तर दिया, 'मेरे मित्र, ठीक उसी तरह मैं भी इन सुखों को भोग नहीं पाता। मैं भी मृत्यु से आतंकित हूँ, मैं जनता के दुखों से पीड़ित हूँ। मेरे लिए इन सुखों का कोई अर्थ नहीं है।' यह कह कर राजा ने उस व्यक्ति की फाँसी की सजा माफ कर दी।"

जया एकटक राज की बातें सुनती जा रही थी। कितने सुंदर ढंग से उसकी हर बात का उत्तर देता है यह इनसान। कितना सरल किंतु कितना कठिन था उसका प्रश्न। और राज ने उस प्रश्न का उत्तर देने के लिए अपनी संस्कृति में से ही कथा खोज ली। वह राज से पूछ बैठती है, "राज, तुम अपना एक आश्रम क्यों नहीं खोल लेते। जितनी अच्छी बातें तुम कर लेते हो, जितना अपने आप पर तुम्हारा नियंत्रण है, उस हिसाब से तो तुम्हें स्वामी जी होना चाहिए। तुम्हें संसार को अपना सारा ज्ञान बाँटना चाहिए।" राज बस मुस्कुरा भर देता।

मुस्कुराहट ही तो जया के जीवन से गायब हो गई है। दिलीप से विवाह अपने आप में उसके जीवन के लिए एक महत्वपूर्ण घटना थी। उसका चार फुट दस इंच का दुबला-पतला शरीर; सपाट सीना, देखने में भी कहीं ग्लैमर का नामोनिशान नहीं। उस पर पढ़ाई-लिखाई के शौक ने बचपन से ही आँखों पर चश्मा चढ़वा दिया था। माँ-बाप को बस एक ही चिंता कि बेटी का विवाह होगा तो कैसे! जया को बार-बार यह याद दिलवाया जाता था कि उसकी साधारण शक्ल और सूरत के कारण ही देखने वाले नापसंद कर जाते हैं। घर की एलबम में से जया के सभी चित्र एक-एक कर लड़के वालों के यहाँ पहुँच चुके थे। अब तो उसे फोटोग्राफर की दुकान पर जाना भी अखरने लगा था। मगर दिलीप ने उसे बिना देखे, बिना मिले ही विवाह कर लिया था। जया ने तो मन ही मन तय कर लिया था कि सारा जीवन ऐसे पति की सेवा करेगी जिसने उसे अपने ही परिवार की चुभती हुई निगाहों के प्रश्नों से बचा लिया। वह अपने दिलीप के साथ ही चित्र खिंचवाया करेगी।

चित्र भी समय के साथ-साथ धुँधले पड़ जाते हैं। हर समय की एक अपनी सच्चाई होती है। जया को भी शनैः-शनैः मालूम होता गया कि दिलीप ने उससे बिना मिले विवाह क्यों कर लिया था। उस सच्चाई ने उसके शुरुआती सपनों को आहत कर दिया था। दिलीप को विनोदिनी के माता-पिता ने स्वीकार नहीं किया था। विनोदिनी ने घर से भाग कर विवाह करने से इनकार कर दिया था। यदि विनोदिनी नहीं तो कोई भी चलेगी। माँ को प्रसन्न ही तो करना है। इसी कारण दिलीप और जया के संबंधों में कोई कोमल तंतु जुड़ नहीं पाया। उनका मिलन केवल शारीरिक ही था। उनकी आत्माएँ कभी एक नहीं हो पाईं। शरीर मिलने के परिणामस्वरूप पलक का जन्म भी हो गया। किंतु दिलीप को न तो कभी जया में कोई विशेष रुचि थी और न ही पलक में।

पलक अभी एक वर्ष की ही रही होगी कि दिलीप के भाई ने उन्हें लंदन आ कर बसने की दावत दी। दिलीप को इसमें भी कोई रुचि न थी। किंतु जया को लगा शायद लंदन जा कर दिलीप का व्यवहार बदल जाए। ठीक सोचती थी जया। दिलीप का व्यवहार बदल ही तो गया है। न जाने परमात्मा को क्या मंजूर है!

"परम पिता परमात्मा में विश्वास की तीन स्थितियाँ हैं। हर व्यक्ति परमात्मा में विश्वास करता है अपने संस्कारों के हिसाब से। एक ईसाई जब कभी प्रभु के बारे में सोचेगा तो स्वयंमेव ही यीशू का चेहरा उसकी आँखों के सम्मुख आ जाएगा। एक मुसलमान अल्लाह के अतिरिक्त परमात्मा के विषय में सोच ही नहीं सकता। हिंदू भी शंकर, विष्णु, राम और कृष्ण में अपना भगवान खोजता है। यदि आर्य समाजी है तो 'ॐ' में अपना प्रभु ढूँढ़ेगा। किंतु इनमें से कोई विरला ही ऐसा होगा जो अपने परिवेश से आगे बढ़ कर परमात्मा के विषय में सोच पाए। तर्क की दृष्टि से सोचा जाए तो धर्म मनुष्य की सोच को सीमित कर देता है; उसे आध्यात्म की राह पर जाने के अन्य मार्गों से विमुख करता है।"

"किंतु राज इसमें गलत ही क्या है। जो व्यक्ति जिस राह से वाकिफ है वही राह तो चुनेगा।"

"प्रश्न राह चुनने का नहीं है जया। विडंबना यह है कि मनुष्य उस राह का ही पुजारी हो जाता है जो कि उसे परमात्मा तक ले जाती है। परमात्मा को भूल जाता है। धर्म और आध्यात्मवाद दो भिन्न-भिन्न वस्तुएँ हैं। महत्वपूर्ण बात है परमात्मा में विश्वास। रीति रिवाजों या आडंबर परमात्मा से दूर तो ले जा सकते हैं कभी भी परमात्मा को पाने में सहायक नहीं हो सकते।"

"तुम विश्वास की तीन स्थितियों की बात कर रहे थे।" जया को फिर से राज की बातों में वह सुख मिल रहा था जिसके लिए वह दिलीप के साथ बाईस वर्ष रह कर भी तरसती रही थी।

"देखो जया तुम्हें एक उदाहरण देता हूँ। एक व्यक्ति एक रेस्तराँ में भोजन करने जाता है। वह एक परिवेश में जा कर बैठता है। सबसे पहले बेयरा उसके पास आ कर मीनू कार्ड रख जाता है। वह उस मीनू कार्ड को पढ़ता है और व्यंजनों के नाम पढ़ कर ही उसे महसूस होता है कि उसे स्वादिष्ट भोजन मिलने वाला है। उसके मुँह में पानी आने लगता है। उसकी स्थिति ठीक उस व्यक्ति जैसी है जिसे केवल बताया गया है कि भगवान में विश्वास करो। यदि उसमें विश्वास करोगे तो स्वर्ग मिलेगा अन्यथा नरक में वास करना होगा। वह व्यक्ति या तो डर के कारण भगवान में विश्वास करता है या फिर लालच के कारण। उसने स्वयं भगवान के अस्तित्व को महसूस नहीं किया है। दूसरी स्थिति है उस व्यक्ति की जो कि रेस्तराँ में बैठे दूसरे ग्राहकों को भोजन करते देखता है और उनके चेहरे के हाव भाव देख कर अंदाजा लगाता है कि भोजन कितना स्वादिष्ट होगा। यानि के वह अपने आसपास के लोगों को परमात्मा की पूजा कर उन्हें आत्मिक आनंद लेते देखता है। अभी भी उसे स्वयं यह ज्ञात नहीं है कि भोजन का असली स्वाद क्या है। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण स्थिति उस मनुष्य की है जो कि भोजन को स्वयं खा कर भोजन के स्वाद को महसूस करता है। यानि कि वह स्वयं परमात्मा से आत्मसात हो कर प्रभू के अस्तित्व का ज्ञान प्राप्त करता है और उसे जो सुख प्राप्त होता है वह नैसर्गिक सुख है। उस सुख को शब्दों में व्यक्त कर पाना लगभग असंभव है।'

'राज, तुम अपने ज्ञान को लोगों में बाँटते क्यों नहीं? संसार को हक है कि सब तुम्हारी बुद्धि, तुम्हारे ज्ञान का लाभ उठा सकें।'

'अभी तो मैं स्वयं ही अज्ञान के अँधेरे में भटक रहा हूँ। मैं स्वयं परमात्मा के साथ अपना तारतम्य नहीं बना पाया हूँ। भला, मैं कैसे किसी को जीवन की राह दिखा सकता हूँ?'

राह से तो भटक रही थी जया की पलक। दिलीप के असंतुलित व्यवहार के चलते, एक पलक ही तो थी जिसके होते जया को जीने का कारण मिल जाता था। आज वही जया को दुख देने पर उतारू थी। कम से कम जया तो यही सोचती थी। पलक एक मुसलमान लड़के से प्रेम कर बैठी थी। जया का तो समस्त संसार डगमगा सा गया था। जया के दिमाग में मुसलमानों को लेकर बहुत सी गाँठें थीं। लंदन के सनराइज रेडियो पर भी जब कभी अपराध के समाचार आते तो अधिकतर उनमें मुसलमान लड़कों के ही नाम सुनाई देते थे। जया की अपनी ममेरी बहन मुंबई में एक मुसलमान लड़के से विवाह कर घर से भाग गई थी। सारा परिवार सकते में आ गया था। उनके क्षेत्र में दंगा होते-होते बचा था। शिवसेना और मुस्लिम संस्थाओं के बीच ठन गई थी। राजनीतिज्ञों के बीच बचाव से ही दंगा रुक पाया था। मामा जी तो यह सदमा सह नहीं पाए थे। मामी ने 'अपने पति की हत्यारिन' से आज तक बात नहीं की थी। माफ करने जैसी स्थिति तो आई ही नहीं।

दिलीप से बात करे या न करे। कहीं शराब के नशे में कोई बेवकूफी न कर बैठे। जवान लड़की का मामला है। किस से सलाह करे? पलक को समझाया भी; परंतु जवानी कब समझदारी का परिचय देती है? जब रक्त में गर्मी होती है तो तर्क ठंडे पड़ जाते हैं। पलक को तो यह भी समझ नहीं आ रहा था कि इमरान में कमी किस बात की है। उसके पिता डाक्टर हैं; उसकी माँ बैंक में काम करती है; और इमरान स्वयं अपने कालेज का श्रेष्ठ छात्र है। फिर समस्या क्या है ?

वह नहीं समझती कि इमरान मुसलमान तो है ही उस पर पाकिस्तानी भी है। 'पर ममी, इमरान पाकिस्तानी कैसे हो सकता है? वह तो यहीं लंदन मे पैदा हुआ था। जैसे... मैं कैसे इंडियन हो सकती हूँ। मैं भी ब्रिटिश हूँ और इमरान भी ब्रिटिश है। तो जब दो ब्रिटिश शादी करना चाहते हैं तो प्रॉब्लम क्या है? आई डोंट केयर कि इमरान किस धर्म को मानता है। ही इज नॉट आस्किंग मी टू चेंज माई रिलिजन। और फिर मैं और इमरान कौन सा उसके ममी-पापा के साथ रहने वाले हैं। हम लोग अपने घर में रहेंगे।'

कितना आसान है पलक के लिए पलकें झपकाते हुए कह देना कि दे आर ब्रिटिशर्स! बेवकूफ! इतना भी नहीं समझ पाती कि बड़े-बड़े युद्ध जीत लेना कहीं आसान बात है। किंतु छोटे-छोटे महायुद्ध लड़ना एक अलग ही समस्या है। प्रेमी युगल कितने कम समय में हिंदू या मुसलमान में परिवर्तित हो जाते हैं, इस का तो पता ही नहीं चलता। कोई भी इनसान अपने परिवेश से बड़ा नहीं हो पाता। धर्म हमारी शिराओं में हमारे रक्त का एक अटूट भाग बन उसके साथ बहता रहता है। हमारे सोचने समझने का ढंग हमारे धर्म से कब संचालित होना शुरू हो जाता है इसका तो हमें पता ही नहीं चलता। अजान की आवाज सुनते ही एक मुसलमान मन ही मन नमाज पढ़ने लगता है तो कहीं दूर किसी मंदिर से आती आरती की आवाज किसी भी हिंदू का दिल श्रद्धा से भर देती है। हमारे सोचने, जीने, खाने-पीने और मरने के ढंग भी जुदा-जुदा हैं। खाली पलक के कह देने मात्र से कोई मुसलमान ब्रिटिशर्स नहीं बन जाएगा।

हर समस्या न जाने राज पर जा कर ही कैसे दम लेती है। एक बार फिर जया राज के सामने है। यदि दिलीप उसके अपने पास होता तो क्या वह राज के पास कभी भी जाती? शायद उसके बारे में सोचती भी नहीं। लेकिन वर्षा की बेटी ने भी तो ईरानी मुसलमान से विवाह किया है। तो फिर उसकी अपनी पलक भला ऐसा क्यों नहीं कर सकती? किंतु ईरान और पाकिस्तान के मुसलमान में भी तो अंतर होता है न! जहाँ भारत और पाकिस्तान के संबंधों में तनाव उत्पन्न होता है वहीं पति पत्नी के संबंधों में भी कड़वाहट शुरू हो जाती है।

लेकिन वर्षा की बेटी भी आजकल हर पार्टी में अकेली ही दिखाई देती है। उसका ईरानी पति न जाने अचानक कहाँ गायब हो गया है। 'यह पाकिस्तानी भी न जाने कब तक हमारी जिंदगी में कड़वाहट घोलते रहेंगे। भगवान में विश्वास रखने वाले परिवार की बेटी को नमाज पढ़ना सिखा देंगे! भारत के टुकड़े करवा कर भी यह कहाँ चुप बैठने वाले हैं। हमारी बेटियों पर नजरें गड़ाए बैठे हैं।' जया के दिमाग में मंथन जारी है। उसे डर है कि भारतीय सभ्यता नहीं बचने वाली। यहाँ पैदा हुए बच्चे भला कहाँ भारतीय संस्कृति का बोझ ढो पाएँगे।

'मुझे समझ नहीं आता कि तुम्हारी संस्कृति इतनी जल्दी खतरे में कैसे आ जाती है। तुम्हारी परेशानी यह है कि तुम जीवन को व्यापक रूप में नहीं देख पाती हो। यदि दुनिया के सभी लोग मुसलमान हो जाएँ या फिर ईसाई हो जाएँ उससे अंतर क्या होगा। यह अस्मिता, यह पहचान, यह संस्कृति कोई जड़ वस्तु नहीं हैं। यह परिवर्तनशील है। इस पृथ्वी पर कुछ भी स्थायी नहीं है। अब तुम सोचो क्या सभी मुसलमान एक हैं? कोई शिया है तो कोई सुन्नी, कोई अहमदिया है तो कोई बोरी, फिर आगाखानी भी हैं और न जाने कितने अन्य। तुम्हें केवल इसी बात से प्रसन्न होना चाहिेए कि दो इनसान आपस में प्यार करते हैं और बाकी का जीवन इकठ्ठे बिताना चाहते हैं। अरे जब यह जीवन ही चिरस्थायी नहीं हैं तो मनुष्य द्वारा बनाई गई विवाह जैसी संस्था कैसे स्थायी हो सकती है?' राज पलक की वकालत करता दिखाई दे रहा था और जया की परेशानी का कोई हल मिलता नहीं दिखाई दे रहा था।

जया टूटने लगी है। दिलीप में कोई बदलाव आता नहीं दिखाई नहीं दे रहा। शराब, शराब और बस और शराब। अब तो जया को मारने भी लगा है। बैंक अकाउंट में से पैसे गायब हो जाते हैं। मकान की मॉरगेज की किश्त भी जानी बंद हो गई है। बिल्डिंग सोसाइटी की चिट्ठी भी आ गई है कि किश्त न दिए जाने पर कुर्की करवा देंगे। जया का रक्तचाप बढ़ गया है। दिलीप के भाई ने भी पल्ला झाड़ लिया है। वह बेचारा भी क्या करे?

जया ने हिम्मत जुटा कर दिलीप से बात शुरू की है, "मार्गेज के पैसे कहाँ गए? "

"इस बार जरा हाथ तंग हो गया था।"

"बार में देने के लिए पैसे हैं और मार्गेज के लिए हाथ तंग था। अगर घर हाथ से निकल गया तो जवान बेटी के साथ सड़क पर रहना पड़ेगा।"

"बोला न हाथ तंग हो गया था।"

"शराब पीने के लिए पैसे होते हैं और घर के लिए हाथ तंग हो जाता है!"

"शट अप यू बिच! और शराब के नशे में धुत दिलीप के हाथ का गिलास चार फुट की जया के कंधे से टकराया।"

न जाने अचानक जया में कैसे इतनी शक्ति आ गई कि उसने पास रखा कॉर्डलेस टेलिफोन उठा कर दिलीप पर दे मारा। और दिलीप ने जया को बालों से खींच कर सोफे पर पटक दिया। उसके बाद तो जया पर घूँसे और लातों की बरसात सी शुरू हो गई। शोर सुन कर पलक कमरे में चली आई। माँ को पिटते देख घबरा गई। सीधे पुलिस को फोन किया। और पुलिस आकर दिलीप को अपने साथ ले गई। माँ छोटे बच्चे की तरह सिसक रही थी और पलक एकाएक माँ बन गई थी। जया के बालों में हाथ फिरा रही थी; उसके दुखते बदन सहला रही थी। सुबह को होना था, हो गई। नशा उतरने के बाद पुलिस ने दिलीप को छोड़ दिया।

"इतना सब हो गया, और तुमने मुझे फोन तक नहीं किया?" राज जया के विषय में चिंतित था।

पचासवें जन्मदिन पर जया खुशी की जगह सुबक रही थी। मुंबई का जीवन बस एक फिल्म की तरह उसकी आँखों के सामने घूम रहा था। माँ-बाप के प्यार से लेकर दिलीप की मार तक के जीवन के बारे में सोच रही थी। राज ने जया का चेहरा अपने हाथों में लेकर उसकी आँखों में देखा। जया उसके कंधों पर सिर रख राज से लिपट गई।

"यह शरीर गंदगी का बक्सा है। वासना को त्याग दो।" ...गुरुजी के सभी शब्द जैसे किसी कुएँ की गहराई में से आते प्रतीत हो रहे थे। गहराई...! हाँ वह पूरी गहराई तक राज के साथ उतर जाना चाहती है। जीवन ने उसे सिवाय दर्द के कुछ और नहीं दिया है। आज राज उसके हर दुख को सोख कर अपने भीतर उतार लेगा। आज दोनों दिमाग से बात नहीं कर रहे। आज राज और जया के दिल एक हो रहे हैं।

शरीर का सुख क्या होता है, यह जया को जीवन में पहली बार अपने पचासवें जन्मदिन पर महसूस हुआ!


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