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कविता

हम जो देखते हैं
लाल्टू


संसार
नभ धरा पाताल.
नभ नील रिक्त धवल सिक्त.
धरा शस्य श्यामला या शुष्क अनुर्वरा.
शस्य में श्यामल पत्ते.
पत्तों में हरित जीवन.
जीवन में जो दिखता
वह सब टुकड़े अपूर्ण.

पूरे पूरे दिखते हैं सपने
भले या बुरे.
पूरा पूरा दिखता है पाताल
जो नहीं दिखता सचमुच.
पूरा पूरा दिखता देश महान
जो नहीं दिखता सचमुच.

(सर्जक - 2003)


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हिंदी समय में लाल्टू की रचनाएँ