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कविता

कितनी बार क्षमा
लाल्टू


भालू की आँखें मुझे देख रही हैं
तूने उसे जो पानी का सोता दिखाया था
वह ऊपर गुफा तक जाता है
भालू की आँखें कहती हैं
तुझे गुफा तक ले जाऊँ
वहाँ तू भालू को सीने से लगा सोएगी
बीच रात उठ पेड़ों से डर मेरा कन्धा माँगेगी
भालू पड़ा होगा जहाँ तू सोई थी
कीट पतंगों की आवाज़ के बीच बोलेगी चिड़िया
तुझे प्यार करने के लिए
भालू को पुचकारुँगा
तू ले लेगी भालू को फिर देगी अपना नन्हा सीना
बहुत कोशिश कर पूछेगी
बापू भालू
मैं सुनूँगा भालू भालू
गाऊँगा सो जा भालू सो जा भालू
नहीं कह पाऊँगा उस वक्त दिमाग में होगी सुधा
छत्तीसगढ़ में मज़दूर औरत की बाँहों से तुझे लेती
तब तक कहता रहूँगा सो जा भालू सो जा
जब तक तेरी आँखों में फिर से आ जाएगा जंगल
जहाँ वह सोता है
जो ऊपर गुफा तक जाता है..........

किस डर से आया हूँ यहाँ
डरों की लड़ाई में कहाँ रहेगा हमारा डर
तेरा भविष्य बोस्निया से भागते अन्तिम क्षण
हे यीशुः कितनी बार क्षमा
क्या अयोध्या में सब को करेगा ईश्वर मुआफ़
तू क्या जाने ईश्वर बड़ा पाखण्डी
वह देगा और ताकत उन्हें जो हमें डराते
भालू को थामे रख
यह पानी का सोता जंगल में बह निकल जहाँ जाता है
वहाँ पानी नहीं खून बहता है
तब चाँद नहीं दिखता भालू डर जाएगा.........

भालू को थामे रख
वह नहीं हिन्दू मुसलमान
खेल और गा भालू खा ले आलू
कोई मसीहा नहीं जो भालू को बचा पाएगा
कोई नहीं माता पिता बंधुश्चसखा
इस जंगल से बाहर ...

भालू को थामे रख.

(रविवारी जनसत्ता - 1992)


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