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कविता

कल चिंताओं से रात भर गुफ़्तगू की।
लाल्टू


कल चिन्ताओं से रातभर गुफ़्तगू की
बड़ी छोटी रंगबिरंगी चिन्ताएँ
गरीब और अमीर चिन्ताएँ
स्वस्थ और बीमार चिन्ताएँ
सही और गलत चिन्ताएँ

चिन्ताओं ने दरकिनार कर दिया प्यार
कुछ और सिकुड़ से गए आने वाले दिन चार
बिस्तर पर लेटा तो साथ लेटीं थीं चिन्ताएँ
करवटें ले रही थीं बार बार चिन्ताएँ

सुबह साथ जगी हैं चिन्ताएँ
न पूरी हुई नींद से थकी हैं चिन्ताएँ.

(वागर्थ - 2008)


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