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कविता

फिलहाल
लाल्टू


जीवन अब आसमान नहीं छूता
सिकुड़ कर रोटी तक आ गया है

रोटी भूख मिटाने के आकार से छोटी है

रोटी के और छोटे होने के आतंक में
खत्म हो रहे
तुम इस तरह आँखें बन्द कर चुके हो
अपनी बीबी अपने बच्चे को देखते
गुज़ारते हो दिन
किसी रात बार बार पेशाब करते हुए तुम्हें घबराना होगा
सुबह उठ किसी के सामने चीख चीख रोना होगा

फिलहाल आसमान बहुत दूर है
देखें अपने बच्चों को ही देखें
नया आकाश लिए
हमारे बच्चे सड़कों पर खड़े होंगे एक दिन.

(जतन - 1990)


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