hindisamay head
डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

कविता

बैठकर नेपथ्य में
राधेश्याम बंधु


बैठकर नेपथ्य में
क्यों स्वयं से लड़ते ?
जो नहीं हमदर्द हैं
वे शब्द क्यों गढ़ते ?

कभी पर्दे  को उठा
आकाश आने दो,
मौलश्री की गंध को
भी गुनगुनाने दो,
कभी पंछी की
चहक से, क्यों नहीं मिलते ?

क्यों नयन की झील में है
एक सन्नाटा ?
हर कुहासे को सुबह की
हँसी    ने  छाँटा,
क्यों सुनहले दिवस की
मुस्कान से डरते ?

प्यार के  किरदार   को
मिलती  सभी  खुशियाँ,
सृजन  के ही  मंच पर,
मिलती सुखद  छवियाँ,
क्यों न बादल  बन
किसी की तपन को हरते ?

 जो कला से  दूर  हैं
वह  जिंदगी  से दूर,
पंखुड़ी के पास जो हैं
गंध  से   भरपूर,
क्यों न चंदन गंध बन
हर  हृदय में बसते ?


End Text   End Text    End Text