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कविता

हम इतने आधुनिक हो गए
राधेश्याम बंधु


हम इतने आधुनिक हो गए
अपना  ही  घर भूल  गए ।
'मोनालिसा’ के आलिंगन  में
ढार्इ   आखर  भूल  गए ।
शहरी राधा को गाँवों की
मुरली नहीं  सुहाती अब,
पीतांबर की जगह 'जीन्स’  की
चंचल चाल लुभाती अब,
बोतल पानी पीनेवाले
घर की गागर भूल गए ।

विश्वहाट  की  मंडी  में  अब
खोटे सिक्कों का शासन,
रूप  नुमाइश  में  जिस्मों  का
सौदा  करता   दु:शासन,
सोने  के तस्कर  बनकर  हम
सच   का   तेवर  भूल  गए ।

अर्धनग्न तन के उत्सव  में
देखे कौन पिता की प्यास ?
नवकुबेर  बेटों  की  दादी
घर में काट  रही बनवास,
नकली हीरों के  सौदे में हम
माँ  का  जेवर  भूल  गए ।


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