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कविता

जब बसंत भी गंध न दे
राधेश्याम बंधु


जब बसंत भी गंध न दे तो
किससे  मन  की  बात  कहें ?

बेला, जुही, गुलाब, मोंगरा,
सबके अपने रंग अलग हैं,
बाजारों    की   तितलीपंखी
मुस्कानों के ढंग अलग हैं ।

 टेसू के बदले अब कैसे
नागफनी  के  साथ  रहें ?

अब   बेगनबेलिया  प्यार   की
लिपट-लिपट कर चुभन बढ़ाती,
रोज  अधर  से  संधिपत्र  लिख
अहसासों  की  तपन  बढ़ाती ।

बातूनी आधुनिक रूप का
कब  तक  हम  उपहास सहें ?

अब मिलनों के शयनकक्ष में
विश्वासों की गंध कहाँ ?
अब  कनेर  का सोनजुही से
सिंदूरी   संबंध  कहाँ ?

कैसे चैता गीत भुलाकर
हम डिस्को के साथ बहें ?


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