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कविता

याद तुम्हारी
माहेश्वर तिवारी


याद तुम्हारी
जैसे कोई कंचन कलश भरे
जैसे कोई किरण अकेली
पर्वत पार करे

लौट रही गायों के
सँग-सँग
याद तुम्हारी आती
और धूल के
सँग-सँग
मेरे माथे को छू जाती
दर्पण में अपनी ही छाया-सी
रह-रह उभरे
जैसे कोई हंस अकेला
आँगन में उतरे

जब इकला कपोत का
जोड़ा
कँगनी पर आ जाए
दूर चिनारों के
वन से
कोई वंशी स्वर आए
सो जाता सूखी टहनी पर
अपने अधर धरे
लगता जैसे रीते घट से
कोई प्यास हरे


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